पुरातत्व संग्रहालय बना रहा है ढोलकल गणेश की प्रतिमा, समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर विराजे हैं भगवान गणेश जगदलपुर। जिला पुरातत्व संग्रहालय में खैरागढ़ के कलाकारों द्वारा चार साल पहले ढोलकल की पहाड़ी के शिखर से जिस गणेश प्रतिमा को नक्सलियों ने गिरा दिया गया था, ढोलकल की उस सुंदर गणेश प्रतिमा ललितासन मुद्रा वाली की प्रतिकृति कांक्रीट से गढ़ी जा रही है। पुरातत्व संग्रहालय में स्थापित किए जाने के बाद लोग सहजता से यह जान पाएंगे कि छिंदक नागवंशी राजाओ द्वारा बैलाडीला की एक चोटी पर स्थापित की गई यह गणेश प्रतिमा कितनीसुंदर और विलक्षण थी। उल्लेखनीय है कि दंतेवाड़ा से 24 किलोमीटर दूर व समुद्रतल से 2994 फीट की ऊंचाई पर यह गणेश प्रतिमा स्थापित की गई थी। ब्लेक ग्रेनाइट से तैयार की गई ललितासन मुद्रा वाली यह प्रतिमा तीन फीट ऊंची थी। ग्रामीणों की मदद से प्रतिमा के टूटे हुए हिस्सों को संग्रहित कर फिर से जोड़ा तो गया है पर इस कार्य में छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग ने पत्थर चूरा और एरलडाईड से मूर्ति के टुकडो को जोड़ने का प्रयास तो किया परंतु उसकी खूबसूरती को लौटाने की जरा भी कोशिश नहीं की, इसलिए तब और अब की मूर्ति में जमीन आसमान का अंतर है। ढोलकल के दो मतलब निकाले जाते हैं। एक तो ये कि ढोलकल पहाड़ी की वह चोटी जहां गणपति प्रतिमा है वह बिलकुल बेलनाकार ढोल की तरह खड़ी है और दूसरा, वहां से ढोल बजाने से दूर तक उसकी आवाज सुनाई देती है। पौराणिक कथाओं में परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडियों पर हुआ था। समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है। तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था। गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है। इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी। यह प्रतिमा ललितासन में है। दंतेवाड़ा से 22 किमी दूर ढोलकल शिखर तक पहुंचने के लिए दंतेवाड़ा से करीब 18 किलोमीटर दूर फरसपाल जाना पड़ता है। यहां से कोतवाल पारा होकर जामपारा तक पहुंच मार्ग है। जामपारा में वाहन खड़ी कर तथा ग्रामीणों के सहयोग से शिखर तक पहुंचा जा सकता है। जामपारा पहाड़के नीचे है। यहां से करीब तीन घंटे पैदल चलकर तक पहाड़ी पगडंडियों से होकर ऊपर पहुंचना पड़ता है।
छत्तीसगढ़

पुरातत्व संग्रहालय बना रहा है ढोलकल गणेश की प्रतिमा समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर विराजे हैं भगवान गणेश

जगदलपुर। जिला पुरातत्व संग्रहालय में खैरागढ़ के कलाकारों द्वारा चार साल पहले ढोलकल की पहाड़ी के शिखर से जिस गणेश प्रतिमा को नक्सलियों ने गिरा दिया था, ढोलकल की उस सुंदर गणेश प्रतिमा ललितासन मुद्रा वाली की प्रतिकृति कांक्रीट से गढ़ी जा रही है।

पुरातत्व संग्रहालय में स्थापित किए जाने के बाद लोग सहजता से यह जान पाएंगे कि छिंदक नागवंशी राजाओ द्वारा बैलाडीला की एक चोटी पर स्थापित की गई यह गणेश प्रतिमा कितनीसुंदर और विलक्षण थी। उल्लेखनीय है कि दंतेवाड़ा से 24 किलोमीटर दूर व समुद्रतल से 2994 फीट की ऊंचाई पर यह गणेश प्रतिमा स्थापित की गई थी। ब्लेक ग्रेनाइट से तैयार की गई ललितासन मुद्रा वाली यह प्रतिमा तीन फीट ऊंची थी। ग्रामीणों की मदद से प्रतिमा के टूटे हुए हिस्सों को संग्रहित कर फिर से जोड़ा तो गया है पर इस कार्य में छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग ने पत्थर चूरा और एरलडाईड से मूर्ति के टुकडो को जोड़ने का प्रयास तो किया परंतु उसकी खूबसूरती को लौटाने की जरा भी कोशिश नहीं की, इसलिए तब और अब की मूर्ति में जमीन आसमान का अंतर है।

ढोलकल के दो मतलब निकाले जाते हैं। एक तो ये कि ढोलकल पहाड़ी की वह चोटी जहां गणपति प्रतिमा है वह बिलकुल बेलनाकार ढोल की तरह खड़ी है और दूसरा, वहां से ढोल बजाने से दूर तक उसकी आवाज सुनाई देती है। पौराणिक कथाओं में परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडियों पर हुआ था। समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है। तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था। गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है। इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी। यह प्रतिमा ललितासन में है।

दंतेवाड़ा से 22 किमी दूर ढोलकल शिखर तक पहुंचने के लिए दंतेवाड़ा से करीब 18 किलोमीटर दूर फरसपाल जाना पड़ता है। यहां से कोतवाल पारा होकर जामपारा तक पहुंच मार्ग है। जामपारा में वाहन खड़ी कर तथा ग्रामीणों के सहयोग से शिखर तक पहुंचा जा सकता है। जामपारा पहाड़के नीचे है। यहां से करीब तीन घंटे पैदल चलकर तक पहाड़ी पगडंडियों से होकर ऊपर पहुंचना पड़ता है।

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