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कोरोना वायरस: भारत दुनिया का अगला हॉटस्पॉट बनने जा रहा है?

ByPrompt Times

Jul 10, 2020
कोरोना वायरस: भारत दुनिया का अगला हॉटस्पॉट बनने जा रहा है?
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कोरोना महामारी ने भारत में आहिस्ता-आहिस्ता पाँव पसारना शुरू किया था. लेकिन संक्रमण का पहला पुष्ट मामला दर्ज होने के छह महीने बाद वो रूस को पीछे छोड़कर संक्रमितों के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे अधिक कोरोना प्रभावित देश बन गया है.

भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है. यहाँ शहरों में घनी आबादी रहती है. ऐसे में शायद इसकी आशंका अधिक है कि भारत कोरोना वायरस महामारी का ग्लोबल हॉटस्पॉट बन जाये.

लेकिन कोरोना संक्रमण और इस महामारी से मरने वालों के जो आंकड़े दिये जा रहे हैं, उस पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि भारत में कोविड टेस्टिंग उस पैमाने पर नहीं हो रही और महामारी से जितनी कम संख्या में लोगों की मौतें हुई हैं, उससे भी वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हैं.

हम आगे उन पाँच चीज़ों के बारे में बता रहे हैं जो भारत में कोरोना महामारी फैलने के बारे में हम जानते हैं.

1. भारत में कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे

हाल के दिनों में भारत में कई बार रिकॉर्ड संख्या में कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किये गए हैं. दसियों हज़ार मामले रोज़ाना के हिसाब से रिपोर्ट किये जा रहे हैं और ऐसा कई दिनों से हो रहा है.

भारत में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक पुष्ट मामले जून में दर्ज किये गए. बेहद सख्ती से लागू किये गए लॉकडाउन को खोलने के कुछ ही हफ़्तों के भीतर ये हुआ. जुलाई में तो ये बढ़कर रोज़ाना 20 हज़ार से भी ज़्यादा हो गए.

नौ जुलाई तक भारत में कोरोना संक्रमण के कुल 7 लाख 67 हज़ार 296 मामले दर्ज किये गए हैं.

लेकिन विषाणु विशेषज्ञ शाहिद जमील का कहना है कि ‘भारत में संक्रमण किस पैमाने पर हुआ है, उसकी वास्तविक तस्वीर बहुत धुंधली है.’

सरकार ने मई के महीने में बेतरतीब तरीक़े से छांटे गए 26 हज़ार लोगों का कोरोना टेस्ट कराया था जिससे पता चला कि 0.73 फ़ीसदी लोग संक्रमित थे.

कुछ विशेषज्ञों ने टेस्टिंग के लिए छांटे गए लोगों की संख्या पर सवाल उठाया लेकिन डॉक्टर शाहिद जमील जैसे जानकारों का कहना है कि ‘केवल यही वो आंकड़े थे जो देश भर की तस्वीर पेश करते हैं और उन्हें इन्हीं आंकड़ों के साथ काम करना है.’

डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं, “अगर हम इन आंकड़ों का विस्तार पूरी आबादी के हिसाब से कर दें तो हम पाएंगे कि मई महीने के मध्य में इस देश के भीतर संक्रमण के क़रीब एक करोड़ मामले थे.”

भारत में हर 20 दिन में कोरोना संक्रमण के मामले दोगुने होते जा रहे हैं. इस हिसाब से देखें तो इस समय भारत में कोरोना संक्रमण के पुष्ट मामलों की संख्या तीन से चार करोड़ के बीच होती.

किसी भी देश में कोरोना संक्रमण के जितने मामले आधिकारिक रूप से रिपोर्ट हुए हैं और असल में वहाँ संक्रमण के कितने मामले हैं, इसे लेकर हरेक जगह पर फ़र्क़ देखा जा सकता है, लेकिन इसके पैमाने में अंतर है.

टेस्टिंग ही केवल वो तरीक़ा है जिससे इस फ़ासले को पाटा जा सकता है.

डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं, “अगर आप ज़्यादा टेस्टिंग करेंगे तो आपको संक्रमण के ज़्यादा मामले मिलेंगे.”

भारत में हाल के हफ़्तों में यही देखा गया. जैसे ही सरकार ने टेस्टिंग सुविधा का विस्तार किया, संक्रमण के मामले अचानक तेज़ी से बढ़े.

भारत में 13 मार्च के बाद एक करोड़ से ज़्यादा सैंपल का कोरोना टेस्ट किया गया लेकिन इनमें से आधे से अधिक टेस्टिंग एक जून के बाद की गई.

2. भारत में टेस्टिंग पर्याप्त रूप से नहीं हो रही

संख्या के लिहाज़ से भारत में कोरोना संक्रमण के मामले अधिक हैं. लेकिन आबादी के अनुपात से संक्रमण के मामलों को देखें तो ये तुलनात्मक रूप से कम है.

दुनिया भर में कोरोना संक्रमण के मामले भारत के औसत से तीन गुना ज़्यादा हैं. सरकार ने हाल ही में इस तथ्य की ओर लोगों को ध्यान आकर्षित किया था.

लेकिन डॉक्टर जमील कहते हैं कि भारत में प्रति व्यक्ति कोरोना संक्रमण के मामले इसलिए कम हैं क्योंकि यहाँ टेस्टिंग ही बहुत कम हुई है.

प्रति व्यक्ति संक्रमण के अधिक मामले वाले देशों से जब आप भारत की तुलना करेंगे तो पाएंगे कि उन देशों में टेस्टिंग काफ़ी बड़े पैमाने पर हुई है.

भारत में इस पैमाने पर देखें तो कोरोना संक्रमण के मामले कुछ नहीं के बराबर ही कहे जा सकते हैं क्योंकि यहाँ टेस्टिंग रेट ही कम है.

लेकिन केवल इसी बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कितने लोगों की टेस्टिंग की जा रही है. फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि किनकी टेस्टिंग की जा रही है.

भारत का शुरू में इस बात पर ज़्यादा ज़ोर रहा कि ज़्यादा जोखिम वाले मामलों और उनके संपर्क में आए लोगों की टेस्टिंग और ट्रेसिंग की जाए ताकि बड़ी आबादी तक संक्रमण को पहुंचने से रोका जा सके.

गणितज्ञ हिमांशु त्यागी और आदित्य गोपालन ने कोविड-19 की महामारी को रोकने के लिए बनाई गई रणनीति का अध्ययन किया है.

उनका कहना है कि एक बार जब संक्रमण तेज़ी से फैलने लगता है तो टेस्टिंग और ट्रेसिंग नाकाफ़ी हो जाते हैं.

हिमांशु त्यागी और आदित्य गोपालन ने बताया कि इससे रोकथाम में मदद तो मिलती है लेकिन किसी समुदाय में फैल रहे संक्रमण के उन मामलों का पता नहीं चल पाता जो दिखाई नहीं देते हैं. इसका पता लगाने के लिए भारत को बड़े पैमाने पर टेस्टिंग करनी होगी.

और सवाल ये भी है कि हम इस बात का पता कैसे लगा पाएंगे कि भारत किन लोगों की टेस्टिंग कर रहा है?

दुनिया के दूसरे देशों में टेस्टिंग का पैमाना क्या है और भारत की स्थिति से उसकी तुलना थोड़ा जटिल है.

वे किस आधार पर कितने लोगों की टेस्टिंग कर रहे हैं? और बाक़ी आधार पर कितने लोगों की टेस्टिंग कर रहे हैं.

भारत में टेस्टिंग के जो आंकड़ें हैं, वो कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं क्योंकि बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी एक बार से ज़्यादा टेस्टिंग की गई है.

इसलिए वैज्ञानिक ये जानने के लिए ज़्यादा इच्छुक हैं कि कितने टेस्ट किए जाने के बाद संक्रमण के एक मामले की पुष्टि होती है.

जितने ज़्यादा लोगों के टेस्ट किए जाएंगे, इसका दायरा उतना बड़ा होता चला जाएगा.

दुनिया के जिन देशों ने कोरोना महामारी पर क़ाबू पाने में कामयाबी पाई है, भारत का प्रदर्शन उनकी तुलना में बेहद ख़राब कहा जा सकता है.

और टेस्टिंग का दायरा जितना विस्तृत होगा, संक्रमण की दर उतनी कम होगी. यही वजह है कि न्यूज़ीलैंड और ताइवान में कोरोना संक्रमण की दर एक फ़ीसदी से कम थी.

भारत में कोरोना संक्रमण की दर अप्रैल में 3.8 फ़ीसद थी जो जुलाई में बढ़कर 6.4 फ़ीसद हो गई.

अगर इसका बढ़ना जारी रहता है तो इसकी वजह यही होगी कि भारत में टेस्टिंग अभी भी ज़्यादा जोखिम वाले लोगों और उनसे संपर्क में आने वाले लोगों के एक छोटे से तबक़े में ही की जा रही है.

3. भारत में ठीक होने वाले लोगों की संख्या उम्मीद बढ़ाने वाली

आंकड़ें बताते हैं कि भारत में जितने लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं या फिर इस महामारी के कारण मर रहे हैं, उससे ज़्यादा लोग संक्रमित होने के बाद ठीक हो रहे हैं.

भारत में इस महामारी के बारे में अनुमान लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों को उपयोगी पाया.

इस आधार पर ये बताया जा सकता है कि पुष्ट मामले, ठीक होने वाले केस और मरने वालों की संख्या कितने दिनों में दोगुने हो जाते हैं.

इसमें जितना ज़्यादा वक़्त लगे, उतना बेहतर है.

लेकिन ये उतना भी सरल नहीं है. भारत में पुष्ट मामले, ठीक होने वाले केस और मरने वालों की संख्या के दोगुनी होने की दर को लेकर वैज्ञानिक सशंकित हैं.

कम टेस्टिंग किए जाने का मतलब है कि नए मामलों की संख्या कम होगी और वो भी धीमी गति से दर्ज किए जाएंगे. इससे पुष्ट मामलों की तुलना में रिकवरी रेट तेज़ हो जाएगी.

डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं, “भारत में इस समय 26 दिनों में मरने वालों की संख्या दोगुनी हो जा रही है. अगर ये और तेज़ होती है तो इससे अस्पतालों पर दबाव बढ़ेगा और मुमकिन है कि मरने वालों की संख्या भी बढ़े.”

कोरोना महामारी से बुरी तरह से प्रभावित देशों की तुलना में भारत में ठीक होने वाले लोगों का अनुपात बेहतर है. ये अनुपात बेहतर होना अच्छी बात है क्योंकि इसका मतलब ये हुआ कि भारत में कोरोना संक्रमित लोग अमरीका और ब्राज़ील की तुलना में जल्दी ठीक हो रहे हैं.

कुल पुष्ट मामलों की तुलना में ठीक होने वाले लोगों का भारत में अनुपात 60 फ़ीसद का है. इस मामले में भारत अमरीका से कहीं आगे है, जहां ये अनुपात 27 फ़ीसद का है.

हालांकि जब रिकवरी रेट की बात की जाती है तो इससे जुड़े आंकड़ों में कमियां हैं और इसकी परिभाषाएं भी अलग-अलग हैं.

भारत में उस आदमी को ‘ठीक हो गया’ माना जाता है जिसका कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव पाए जाने के कुछ हफ़्तों बाद टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आता है.

कुछ देशों में रिकवरी रेट के लिए उन्हीं लोगों के आंकड़ें लिए जाते हैं जो इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होते हैं और वहां पूरी तरह से ठीक होते हैं.

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ब्रिटेन में रिकवरी रेट तुलनात्मक रूप से कम क्यों है.

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भले ही कितने लोग अलग-अलग देशों में संक्रमण के बाद ठीक हो रहे हों लेकिन भारत में इनका अनुपात दूसरे देशों से ज़्यादा है.

और ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में रिपोर्ट किए गए मृत्यु के आंकड़ें कम हैं.

4. भारत में मृत्यु दर बहुत कम है

भारत में कोरोना महामारी से अब तक 20,160 लोगों की जान जा चुकी है. मरने वालों की संख्या के लिहाज़ से देखें तो भारत दुनिया का आठवां सबसे ज़्यादा प्रभावित देश है.

लेकिन अगर मौत के इन्हीं आंकड़ों को प्रति दस लाख की आबादी के अनुपात में देखा जाएगा तो ये आंकड़ें बहुत छोटे लगेंगे.

अर्थशास्त्री और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में सीनियर फ़ेलो शामिका रवि कहती हैं, “पश्चिमी यूरोप में जो आप देख रहे हैं, ये उसका बहुत छोटा सा हिस्सा है.”

लेकिन डॉक्टर शामिका रवि का कहना है कि भारत में मौत के सभी मामले रिपोर्ट नहीं हुए होंगे, इसकी पूरी संभावना है और इससे भारत और यूरोप के मृत्यु दर के आंकड़ों में जो फ़ासला है, उसकी वजह पता नहीं चलती.

डॉक्टर शामिका रवि कहती हैं, “अगर वाक़ई में हमारे यहां मृत्यु दर अधिक रहता तो कोई भी आंकड़ा इसे छुपा नहीं सकता था.”

भारत के मृत्यु दर के कम आंकड़ों की तरह ही इस क्षेत्र के दूसरे देश जैसे पाकिस्तान या इंडोनेशिया की भी कमोबेश यही हालात हैं.

इस इलाक़े में कोरोना संक्रमण के स्तर को लेकर भी कई तरह के सिद्धांत गढ़े गए.

कुछ लोगों का कहना है कि इस इलाक़े में संक्रमण की बेहद ख़राब स्थिति है तो कुछ ने कहा कि इस इलाक़े में कोरोना वायरस कम घातक है. ये भी कहा गया कि पश्चिमी देशों की तुलना में इन देशों की नौजवान आबादी पर वायरस का कम असर हुआ और ये वायरस बुज़ुर्गों के लिए ज़्यादा जानलेवा है.

डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं, “सभी देश अपने आंकड़ों में हेरफेर नहीं कर सकते हैं. मुमकिन है कि इन देशों में लोगों में किसी संक्रामक रोग से लड़ने के लिए जन्मजात प्रतिरोधक क्षमता हो. लेकिन हम ये बात वाक़ई नहीं जानते हैं कि इन देशों में मृत्यु दर के आंकड़ें इतने कम क्यों हैं.”

5. भारत के हर एक राज्य की अलग कहानी है

अमरीका और यूरोपीय संघ में कोरोना वायरस से जुड़े आंकड़ों में जितनी विविधता है, कमोबेश भारतीय राज्यों का भी वही हाल है.

इस समय दिल्ली, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भारत के कोरोना संक्रमण से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्यों में से हैं.

संक्रमण के कुल मामलों का 60 फ़ीसद इन्हीं तीन राज्यों में है.

जैसा कि हम देख सकते हैं कि कुछ इलाक़ों में कोरोना संक्रमण के मामले कम हुए हैं तो कुछ राज्यों में बढ़े हैं.

दक्षिण भारत में कर्नाटक और तेलंगाना में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़े हैं तो आंध्र प्रदेश में कोरोना संक्रमण के मामले रिकॉर्ड दर से बढ़ रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए अब तक केंद्र के स्तर पर क़दम उठाये जाते रहे हैं जिसे बदलने की ज़रूरत है.

डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं कि कोरोना महामारी पर क़ाबू पाने की सफल रणनीति को भारत में ज़िलावार तरीक़े से लागू किया जाना चाहिए. क्योंकि अगर राष्ट्रीय स्तर पर एक और लॉकडाउन लगाया गया तो वो पिछले वाले की तुलना में कम प्रभावशाली होगा.

डॉक्टर शामिका रवि की राय में राज्यों के हिसाब से रणनीति बनाने के बजाय प्रशासन को स्थानीय आंकड़ों की ज़रूरत होगी. हरेक ब्लॉक में अगर किसी में संक्रमण के लक्षण होंगे तो इसकी जानकारी हमें होगी.
















BBC


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