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जिन प्रेम कीयो तिन ही प्रभु पायो

ByPrompt Times

Aug 7, 2020
जिन प्रेम कीयो तिन ही प्रभु पायो
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(श्रीकृष्ण जन्म ११ अगस्त मंगलवार पर विशेष)

श्रीकृष्ण जीवन चरित्र का उल्लेख अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है इनमें से एक ग्रंथ है ‘श्री दसम ग्रंथ‘ जिसकी रचना सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने की है। यह ग्रंथ श्री नांदेड़ के सचखंड साहिब, श्री पटना साहिब व भारत के कई अन्य प्रमुख गुरुद्वारों में स्थित है। श्री गुरु गोबिंदसिंघ ने श्री दसम ग्रंथ में परमात्मा के 24 अवतारों का वर्णन किया है और श्रीकृष्ण अवतार को 21 वां अवतार बताया है। इसमें श्रीकृष्ण अवतार से संबंधित प्रसंगों का वर्णन काव्य रुप में ग्यारह हजार ब्यानवे छंदों में बड़े सुंदर रुप से है।

गुरू गोबिंदसिंघ महाराज अपनी वाणी में फरमाते है कि “साच कहो सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीयो तिन ही प्रभु पायो” अर्थात यह सत्य है कि जिन्होंने परमात्मा से प्रेम किया है उन्होंने ही परमात्मा को पाया है। इस संदर्भ में श्री गुरू गोबिंदसिंघ महाराज द्वारा रचित दसम ग्रंथ में श्रीकृष्ण के एक प्रसंग का उल्लेख इस प्रकार है कि एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर शिकार खेलने के लिये निकले। जिस भी प्राणी पर उन्होंने वार किया वह वार सहन न कर सका

और मृत होकर गिर पड़ा तथा इस प्रकार श्रीकृष्णजी से भागता हुआ कोई भी बच नहीं पाया। शिकार के दौरान उन्हें प्यास लगी अतः वे शिकार छोडकर पानी पीने के लिए यमना नदी के तट पर आये, वहां उन्होंने एक तपस्विनी सुन्दर स्त्री को देखा। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उस स्त्री के बारे में पूछने को कहा। श्रीकृष्णजी की आज्ञा मानकर अर्जुन ने उससे पूछा कि सुन्दरी तुम किसकी पुत्री हो, तुम्हारा कौनसा देश है, तुम किसकी बहन हो तथा किसकी पत्नी हो ? वास्तव में वह यमुना थी तब अर्जुन से यमुना ने कहा कि हे श्रीकृष्ण भक्त मेरे हृदय में श्रीकृष्ण के वरण की इच्छा थी इसलिए मैंने यहां पर तपस्या की है। तब अर्जुन ने सिर झुकाकर श्रीकृष्णजी से निवेदन किया कि हे प्रभु, यह सूर्य की पुत्री यमुना है और इसे सारा संसार जानता है। तब श्रीकृष्णजी ने कहा कि इसने कामकाज छोड़कर तपस्विनी का वेश क्यों धारण किया है ? अर्जुन ने उत्तर दिया कि ऐसा उसने आपको वर रूप में प्राप्त करने के लिये किया है। अर्जुन की बात सुनकर श्रीकृष्णजी ने यमुना का प्रेम व भावना देखकर बांह पकड़कर उसे रथ पर चढ़ा लिया। यमुना का मुख चन्द्रमा के समान था और उसके गालों की ज्योति जगमगा रही थी। श्रीकृष्ण ने उस पर इतनी कृपा की जितनी अन्य किसी पर नहीं की और उसको घर ले जाने की कथा भी जग प्रसिद्ध है यमुना जी को रथ पर बिठाकर श्रीकृष्ण अपने महल पर ले आये।

इस प्रकार परमात्मा प्रेम के वश है क्योंकि भक्तों ने जब-जब परमात्मा की आराधना सच्चे हृदय व श्रद्धा-प्रेम भाव से की है तब परमात्मा ने उनकी मनोकामनाएं पूर्ण की हैं। जिस प्रकार भीलणी के प्रेम वश श्री रामजी ने झूठे बेर खाए, भगत नामदेवजी का झोपड़ा बनाया, धने भगत की गायों को चराया व लस्सी-रोटी खाई, दासी पुत्र बिदर के घर श्रीकृष्ण ने साग खाया इत्यादि इत्यादि। इसी प्रकार दसम ग्रंथ में श्री गुरु गोबिंदसिंघ महाराज ने बताया है कि तपिस्विनी यमुना ने प्रेम पूर्वक तपस्या कर श्रीकृष्ण को पाया। क्यों न हम भी सच्ची भावना से प्रेमपूर्वक परमेश्वर की भक्ती करें।

अधि. माधवदास ममतानी
(संयोजक)
श्री कलगीधर सत्संग मंडल जरीपटका,
नागपुर-14


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