अमरीका में कोरोना वायरस ने कैसे तबाह कर दी है बच्चों की ज़िंदगी
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अमरीका में कोरोना वायरस ने कैसे तबाह कर दी है बच्चों की ज़िंदगी

वो शुक्रवार का दिन था और 12 जून की तारीख़.

वर्जिनिया की रहने वाली कैथरीन स्मार्ट का बड़ा लड़का साउथ कैरोलाइना में दोस्तों के साथ एक छोटे से ट्रिप से वापस घर लौटा ही था.

परिवार ने लिविंग रूम में थोड़ा वक़्त साथ गुज़ारा. कैथरीन ने बेटे को गले लगाया और फिर वो अपने कमरे में चला गया.

सोमवार को चार सदस्यों वाले इस परिवार को पता चला कि साउथ कैरोलाइना में बेटा जिन दोस्तों के साथ ट्रिप पर था, उनमें से एक कोरोना के लिए पॉज़िटिव पाया गया है.

बेटे का भी कोरोना टेस्ट करवाया गया. अगले दिन कैथरीन के छोटे लड़के को उठते ही उल्टियां शुरू हो गई.

जर्मन भाषा सिखाने वाली कैथरीन कहती हैं, “वो खड़ा नहीं हो पा रहा था और उसे चक्कर आ रहे थे.”

परिवार को पता चला कि घर में हर आदमी कोरोना वायरस से संक्रमित है.

कैथरीन बताती हैं कि अगले क़रीब तीस दिन इतनी ‘तकलीफ़ में गुज़रे’ कि वो ‘ज़िंदगी का सबसे ख़राब महीना’ था.

इससे पहले तक कैथरीन स्कूलों के फिर से खोले जाने की पैरोकार थीं लेकिन उनका नज़रिया बदल गया.

वो कहती हैं, “एक मां और एक टीचर के रूप में मैंने स्कूल वापस जाने के विचार को एक डर की तरह देखा.”

कैथरीन बताती हैं, “जो कुछ हुआ, मैंने उसे स्वीकार कर लिया था. मैंने सोचना शुरू कर दिया था, क्या हो अगर मेरे दिमाग़ में सूजन या मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुक़सान पहुंच जाए, जैसा कि आपने कई कोरोना पेशेंट्स में देखा होगा. मुझे लगा कि क्लासरूम वापस जाने से मेरे बच्चों के बिना मां के रह जाने का ख़तरा है और मेरे पति को मेरे क़र्ज़े भी चुकाने होंगे.”

अमरीका में इस महामारी ने अब तक तक़रीबन 147,000 लोगों की जान ले ली है. देश में कोरोना से संक्रमितों की संख्या 42 लाख से ज़्यादा हो गई है.

स्कूल खोलने पर बहस तेज़

ऐसे समय में जब देश में पिछले कुछ दिनों से हर रोज़ संक्रमण के तक़रीबन 60,000 मामले रिपोर्ट किए जा रहे हैं तो अमरीका में इस बात पर ज़बर्दस्त बहस हो रही है कि स्कूलों को पूरी तरह से खोला जाए या आंशिक रूप से या फिर अगस्त या सितंबर में जब नया अकादमिक सत्र शुरू होगा तो पूरी व्यवस्था ही वर्चुअल एजुकेशन (ऑनलाइन क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई) में शिफ्ट कर दी जाए.

कोरोना महामारी से निपटने के तौर-तरीक़ों को लेकर आलोचना का सामना कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है, “हम स्कूल खोलने के लिए गवर्नरों और बाक़ी लोगों पर निश्चित रूप से दबाव बनाने जा रहे हैं.”

स्कूल फिर से खोलने की पैरवी कर रहे लोगों की दलील है कि बच्चों को ज़्यादा दिन तक घरों में रखने से उन्हें नुक़सान पहुंचता है.

टेक्सस राज्य में रहने वाली केसी टर्नमायर कहती हैं, “मेरे दो स्वस्थ बच्चे हैं. मुझे उनके बीमार होने का डर नहीं है.”

केसी का एक बच्चा ग्रेड-2 में पढ़ता है जबकि दूसरा ग्रेड-8 में.

वो कहती हैं, “अगर उन्हें संक्रमण हो जाता है तो हम उससे निपट लेंगे. मुझे यीशु मसीह पर पूरा यक़ीन है. मैं जानती हूँ कि उनके पास हर सवाल का जवाब है. उनकी जो भी मर्ज़ी होगी, होकर रहेगा.”

लेकिन बच्चों के संक्रमित होने और कोरोना वायरस को घर लाने के डर का क्या?

केसी कहती हैं, “मैं जानती हूँ कि इसकी आशंका है. लेकिन साथ ही मैं ये भी मानती हूं कि हर कोई इससे संक्रमित होने जा रहा है, जब तक कि इसकी वैक्सीन तैयार नहीं कर ली जाती. सवाल ये नहीं कि ये होगा या नहीं, सवाल ये है कि ये कब होगा.”

स्कूल खोले जाने का समर्थन कर रहे लोगों का कहना है कि लंबे समय तक ऑनलाइन पर पढ़ाई से बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर असर पड़ेगा.

बंद कमरों के पीछे बच्चों के शोषण की आशंकाएं भी ज़ाहिर की जा रही हैं.

कई बार वो शिक्षक ही होते हैं जो इस तरह की घटनाओं का अंदाज़ा लगा लेते हैं और मामले की रिपोर्ट करते हैं.

स्कूल खोलने के पक्ष में दूसरी दलील ये भी दी जा रही है कि बच्चों पर कोरोना संक्रमण का ख़तरा तुलनात्मक रूप से कम है.

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता केली मैकेनेनी एक स्टडी का हवाला देते हुए कहती हैं, “बच्चों पर मौमसी फ़्लू की तुलना में कोरोना संक्रमण से गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा बहुत कम है.”

लेकिन फिर फ्लोरिडा में कोरोना संक्रमण के कारण एक मां के दो बच्चों की मौत और टेक्सस में एक नवजात बच्चे की मौत की रिपोर्टें सामने आती हैं.

नेवाडा से एमिली ऑयर्स वीडियो कॉल पर कहती हैं, “हर साल फ्लू के कारण मरने वाले नवजात बच्चों की रिपोर्टें आपको मिल जाएंगी.”

एमिली के बगल में उनके पति और बेटी हैं. ये बच्ची जल्द ही अपनी प्री-स्कूल क्लास शुरू करने वाली है.

वो कहती हैं, “ये दुखद है लेकिन किसी नवजात बच्चे का कोरोना संक्रमण के कारण मर जाना सामान्य बात नहीं है. हालांकि हमेशा ही अपवाद भी होते हैं पर ये दुखद है. अपवाद तो हमेशा ही होते हैं.”

अमरीका के मिल्वॉकी के मार्टी मेरिक का कहना है, “हम अपने बच्चों को गाड़ी चलाने की इजाज़त देते हैं. हम उन्हें स्वीमिंग पूल में जाने देते हैं. हम उन्हें बाइक ड्राइव करने के लिए देते हैं…. हमें ये ज़िंदगी जीनी है.”

एक और दलील जो फिर से दोहराई जा रही है कि स्कूलों को बंद रखने से कामकाजी माता-पिताओं को बच्चों की देखभाल करने के लिए घर में रहना होगा. इससे कोरोना संकट के बुरे दौर में लोगों की आमदनी में कमी आएगी.

अमरीका में तक़रीबन तीन करोड़ बच्चों को हर दिन स्कूलों में सस्ती दरों पर और मुफ़्त में खाना खिलाया जाता है. स्कूलों के बंद रहने से बच्चे इन सुविधाओं से महरूम रह जाएंगे. इनमें से कई बच्चों के अभिभावक या तो अल्पसंख्यक समुदायों से हैं या फिर वो कम आमदनी वाले तबक़े से आते हैं.

अल्पसंख्यक और अफ्रीकी अमरीकी समुदाय के लोगों पर कोरोना महामारी का सबसे ख़राब असर पड़ा है.

‘पढ़ाई से पहले ज़िंदगी’

स्कूल फिर से खोले जाने का विरोध कर रहे लोग ये मानते हैं कि ऑनलाइन एजुकेशन स्कूल में दी जाने वाली तालीम का कोई विकल्प नहीं हो सकता है.

लेकिन साथ ही वे ये भी कहते हैं कि ज़िंदगी पढ़ाई-लिखाई से पहले आती है.

टेक्सस की जेनीफ़र हार्टलाइन पेशे से टीचर हैं और उन्हें इसकी फ़िक्र सताती है.

वो कहती हैं, “हमें इस बात को लेकर चिंता हो रही है कि बच्चों का एक छोटा सा तबक़ा कोरोना संक्रमण से उबर नहीं पाएगा और मुमकिन है कि इस बीमारी से उसकी मौत भी हो जाए.”

ऐसी आशंकाएं भी हैं कि बच्चों से शिक्षकों और स्कूल स्टाफ़ भी संक्रमित हो सकते हैं.

जेनीफ़र कहती हैं, “टीचर इस बात को लेकर डरे हुए हैं कि उन्हें अपनी नौकरी या ज़िंदगी में से किसी एक चुनना है… कुछ लोगों ने इस्तीफ़ा देने का रास्ता चुना है.”

“कुछ छोटे-छोटे ज़िलों ने स्कूल फिर से खोले जाने का फ़ैसला किया है. उनके यहां मास्क या सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर कोई गाइडलाइंस नहीं दी गई है. उन्होंने 15 अगस्त के आस-पास स्कूल खोले जाने की आख़िरी तारीख़ तय कर ली है.”

लाखों शिक्षक और बच्चे प्रभावित

ये वो बहस है जिसका असर अमरीका के तक़रीबन 37 लाख शिक्षकों, पाँच करोड़ 60 लाख स्कूली बच्चों और लाखों स्कूल स्टाफ़ पर पड़ेगा.

इन बच्चों में प्राइमरी से लेकर हाई स्कूल तक के छात्र हैं.

स्कूल खोले जाने के समर्थकों और विरोधियों, दोनों ही पक्षों ने अपनी बात रखने के लिए विरोध प्रदर्शन किए हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़ सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के दस लाख से ज़्यादा शिक्षक उस आयु वर्ग से आते हैं जिस पर कोरोना संक्रमण का सबसे ज़्यादा ख़तरा है.

अमरीकी स्कूल कई विकल्पों पर ग़ौर कर रहे हैं कि कब से पढ़ाई फिर से शुरू की जा सकती है.

इन विकल्पों में ऑनलाइन क्लासरूम, स्कूल में पढ़ाई और एक हाइब्रिड मॉडल पर भी विचार किया जा रहा है जिसमें बच्चे वास्तविक और वर्चुअल (आभासी) क्लासरूम में अपना वक़्त बाँट सकें.

स्कूल आउटडोर क्लासरूम्स, सुबह और दोपहर की क्लासेज़, एक दिन छोड़ कर दूसरे दिन कक्षा लगाने जैसे विकल्पों के बारे में सोच रहे हैं ताकि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सके.

ये माना जाता है कि अगर बच्चों को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं है तो संक्रमण की सूरत में उनकी हालत बहुत ज़्यादा ख़राब नहीं होती है.

बच्चों के अस्पताल में भर्ती किए जाने के मामले भी बहुत कम हैं. लेकिन कुछ बच्चे गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं और वे दूसरों को भी संक्रमित करते हैं.

व्हॉइट हाउस के कोरोना वायरस टास्क फ़ोर्स के डॉक्टर डिबोरा बर्क्स कहती हैं, “कुछ दूसरी स्टडीज़ से हम ये बात निश्चित तौर पर जानते हैं कि दस साल से कम उम्र के बच्चे कोरोना संक्रमित होते हैं. ये स्पष्ट नहीं है कि वे कितनी तेज़ी से दूसरों को संक्रमित करते हैं.”

क्या स्कूल तैयार हैं?

इस बात को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए स्कूल कितने तैयार हैं?

विस्कन्सीन लुथेरान हाई स्कूल के प्रिंसिपल फिल रेयरर कहते हैं, “हाल ही में किए गए सर्वे में 70 फ़ीसद से ज़्यादा अभिभावक ये चाहते थे कि उनके बच्चे क्लासरूम एजुकेशन के लिए वापस लौटें. संक्रमण की रोकथाम को लेकर हमने जितने इंतज़ाम किए हैं, उस पर इतने ही अभिभावक आश्वस्त या संतुष्ट थे.”

मिल्वॉकी के इस स्कूल के प्रिंसिपल फिल चाहते हैं कि उनका स्कूल क्लासरूम एजुकेशन के लिए खोल दिया जाए.

फिल ज़ोर देकर कहते हैं, “हम विज्ञान के सिद्धांतों पर चल रहे हैं.”

लेकिन टीचर जेनीफ़र हार्टलाइन इसके उलट दूसरा पक्ष रखती हैं, “कुछ स्कूलों ने अपने शिक्षकों से कहा है कि उन्हें पूरी महामारी के दौरान दो मास्क मुहैया कराए जाएंगे. इसके अलावा कुछ ज़रूरी हुआ तो इसका इंतज़ाम उन्हें ख़ुद ही करना होगा.”

“हमारे कई शिक्षक ऐसे क्लासरूम में पढ़ाते हैं जहां खिड़कियां तक नहीं है. और हमें ये कहा गया है कि एयर प्यूराफ़ायर (हवा साफ़ करने वाली मशीन) मुहैया नहीं कराई जाएगी…. हम लायज़ोल, हैंड सैनीटाइज़र जैसी चीज़ों की माँग कर रहे हैं….”

सवाल और भी हैं. अगर कोई छात्र संक्रमित हो गया तो क्या होगा? क्या पूरा स्कूल बंद कर दिया जाएगा और कितने दिनों तक? क्या स्टूडेंट्स, शिक्षक और दूसरे स्टाफ़ का नियमित तौर पर टेस्ट किया जाएगा? अगर किसी बच्चे को कुछ हो गया तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी? क्या क्लासरूम में आने वाले बच्चों को शिफ्ट में बुलाया जाएगा और इस सब की क़ीमत कौन अदा करेगा?

क्लासरूम में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसा किया जाएगा?

एक दूसरी चुनौती क्लासरूम में सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को लागू किए जाने की है.

जेनीफ़र कहती हैं, “बहुत से शिक्षक, ख़ासकर हाई स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर एक दिन में सैकड़ों बच्चों के संपर्क में आते हैं. बच्चों को ड्रेस कोड, क्लासरूम में पेंसिल लाने के लिए कहना तक मुश्किल है.”

जेनीफ़र ने हाल ही में ‘टेक्सस टीचर्स सेफ्टी इनिशिएटिव’ नाम से एक फेसबुक ग्रुप शुरू किया है जिसमें क़रीब नौ हज़ार लोग जुड़े हुए हैं.

इतना ही नहीं स्कूल फिर से खोले जाने के मुद्दे पर राजनीति भी चल रही है.

अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव महज़ तीन महीने दूर हैं और कई चुनावी सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति ट्रंप अपने प्रतिस्पर्धी और डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन से पीछे चल रहे हैं.

और इन सब के बीच स्वास्थ्य के मुद्दे का राजनीतिकरण हो गया है.

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले ग़ैर-सरकारी संगठन ‘बेलवेदर एजुकेशन’ के को-फ़ाउंडर और पार्टनर एंडी रॉदरहैम कहते हैं, “लोग अर्थव्यवस्था को चालू रहते देखना चाहते हैं. और अगर बच्चे स्कूल नहीं गए तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना वाक़ई बहुत मुश्किल होगा.”

वो कहते हैं, “स्कूल वो जगह होती है जहां मां-बाप बच्चों को दिन के समय भेजते हैं. जहां इन बच्चों की देखभाल योग्य और वयस्क लोग करते हैं. और अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपका काम पर जाना मुश्किल हो जाएगा.”

इससे अंदाज़ा लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप क्यों स्कूल फिर से खोले जाने के लिए इच्छुक हैं. यहां तक कि उन्होंने शिक्षा के लिए दिए जाने वाले संघीय आवंटन में कटौती तक की धमकी दे रखी है.

हालांकि जानकारों का कहना है कि इसकी संभावना कम ही है.

लेकिन अमरीका में जिस तरह से कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि स्कूल खोलने की ट्रंप प्रशासन की कोशिशों को चुनौतियों का सामना है.

इस बीच एक महीने से भी ज़्यादा वक़्त बीत गया है और कैथरीन स्मार्ट का परिवार अभी भी कोरोना से उबर रहा है.

वो कहती हैं, “अगर हमारे बच्चे छोटे होते या हम ग्रामीण इलाक़ों में रह रहे होते तो मैं नहीं जानती कि हम कैसे बच पाते.”















BBC

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