नेशनल अवार्ड की रेस में सबसे आगे चल रही मिथिला पेंटिग कलाकार दुलारी देवी
बिहार

नेशनल अवार्ड की रेस में सबसे आगे चल रही मिथिला पेंटिग कलाकार दुलारी देवी

मधुबनी। दीवारों से चली मिथिला पेटिग को कागज, कपड़े पर उतारने के साथ दुलारी देवी ने अपने संघर्ष के बूते अपनी अलग पहचान बना चुकी है। महज अपना हस्ताक्षर और अपने गांव का नाम लिख पाने वाली दुलारी की सफलता मिथिला पेंटिग कलाकारों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। आज दुलारी की पेंटिग की पूरी दुनिया मुरीद है। देश-दुनिया की कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में दुलारी का बखान है। इग्नू के मैथिली भाषा के अध्ययन सामग्री के मुखपृष्ठ पर दुलारी अपनी जगह बना चुकी है। जीवन में संघर्षों की आंधी को झेलते हुए दुलारी ने अपने हौसले से मिथिला पेंटिग कला में ना केवल महारत हासिल की, बल्कि इसके सहारे खुद को सफलता की बुलंदियों तक पहुंचाया। आज दुलारी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए मिसाल बन चुकी है। राज्य पुरस्कार से सम्मानित यह कलाकार अब नेशनल अवार्ड की रेस में सबसे आगे चल रही है।

  • 2012-13 में राज्य पुरस्कार से हुई सम्मानित :

जिले के राजनगर प्रखंड के रांटी गांव की 53 वर्षीय दुलारी देवी अब तक तकरीबन आठ हजार पेंटिग्स बना चुकी हैं। वर्ष 2012-13 में दुलारी राज्य पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं। गीता वुल्फ की पुस्तक फॉलोइंग माइ पेंट ब्रश और मार्टिन लि कॉज की फ्रेंच में लिखी पुस्तक मिथिला में दुलारी की जीवन गाथा व कलाकृतियां सुसज्जित हैं। सतरंगी नामक पुस्तक में भी इनकी पेंटिग ने जगह पाई है। इग्नू के लिए मैथिली में तैयार किए गए आधार पाठ्यक्रम के मुखपृष्ठ के लिए इनकी पेंटिग चुनी गई। देश के अनेक शैक्षणिक व अन्य संस्थानों की दीवारों पर इनकी पेंटिग्स शोभा बढ़ा रही हैं। पटना में बिहार संग्रहालय के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुलारी देवी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। वहां कमला नदी की पूजा पर इनकी बनाई एक पेंटिग को जगह दी गई।

  • देश-दुनिया में छटा बिखेर रही दुलारी की पेटिग :

देश-दुनिया के अलावा मधुबनी के थाना चौक स्थित विद्यापति टावर पर दुलारी देवी की पेटिग छटा बिखेर रही है। एक दशक पूर्व केरल में पेंटिग प्रदर्शनी में दुलारी देवी की पेंटिग को फिल्म कलाकार वैजयंती माला ने सराहा था। लॉकडाउन के दौरान देवी जिले के कोठिया, पेटघाट, लोहना, रुपौली, खड़क गांव के सरकारी विद्यालयों को संवार दिया। लॉकडाउन के दौरान दुलारी की बनाई एक पेटिग की बिक्री अमेरिका में 50 हजार रुपये में हुई। यह पेंटिग अमेरिका डाक के माध्यम से भेजी गई।

  • कर्पूरी देवी की संगत ने बदली तकदीर :

दुलारी देवी के जीवन के शुरूआती दिन बेहद कठिन रहे। लेकिन, हालातों का डट कर मुकाबला करने वाली दुलारी को जब मिथिला पेंटिग कलाकार कर्पूरी देवी की संगत मिली तो उसकी तकदीर बदल गई। दुलारी का जन्म मल्लाह जाति के एक निर्धन परिवार में हुआ। पिता मुसहर मुखिया, भाई परीक्षण मुखिया मछलियां पकड़ने का काम करते थे। मां धनेसरी देवी के साथ वह भी दूसरों के घरों व खेतों में काम करने जाती थीं। कम उम्र में शादी हो गई। दो साल ससुराल बेनीपट्टी प्रखंड के बलाइन कुसमौल गांव में गुजारने के बीच छह माह की पुत्री की मौत के बाद वह मायके चली आई। किस्मत ने ऐसा रंग दिखाया कि वह मायके में रहने को विवश हो गई। फिर कभी ससुराल नहीं गई। मायका रांटी गांव में दुलारी जीवन-यापन के लिए मधुबनी पेंटिग की कलाकार राज्य पुरस्कार से सम्मानित कर्पूरी देवी (अब स्व.) के घर झाड़ू-पोंछा कर जीविका चलाने लगी। इस दौरान दुलारी देवी ने कर्पूरी देवी की बनाई जाने वाली मिथिला पेटिग को देखकर खुद भी पेटिग बनाना शुरू कर दिया। शुरू-शुरू में दुलारी अपने घर-आंगन को माटी से पोतकर, लकड़ी की कूची बना अपनी कल्पनाओं को आकृति देने लगीं। बाद में कर्पूरी देवी के सहयोग से मिथिला पेटिग के क्षेत्र में नाम कमाने लगी। दुलारी देवी कहतीं है कि इच्छुक लड़कियों को पेंटिग के क्षेत्र में बढावा देना उन्होंने अपने जीवन से सीखा है।

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