20 फ़रवरी 2023 | लोग जब भी जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के नकारात्मक असर के बारे में सोचते हैं तो वे उन प्रजातियों (Species) और पौधों के बारे में सोचते हैं जो पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं. वैसे तो यह अपने आप में एक बड़ी समस्या है , लेकिन बहुत से पेड़ पौधे (Plants) अपने आसपास गर्म होते तापमान के अनुकूल ढलने का प्रयास कर रहे हैं. बर्ताव में यह बदलाव इस बात का संकेत है कि वे अपने खुद को कायम करने के लिए संघर्षरत हैं. फिर भी वे शोधकर्ताओं को यह जानकारी देने में मदद भी कर सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन की गति क्या है और साथ ही संरक्षण नियोजन में सहायता भी कर सकते हैं.
रोड स्थित प्रोविडेंस की ब्राउन यूनिवर्सिटी के नए अध्ययन में इसी अवधारणा को खंगाला गया है जिसमें शोधकर्ताओं ने पश्चिमी उत्तर अमेरिका (USA) की वनस्पति (vegetation) का अध्ययन किया और जानने का प्रयास किया कि प्रजातियां (Species) किस तरह से जवलायु परिवर्तन के लिए खुद को अनुकूल कर रही हैं. इस अध्यनय के प्रमुख लेखक जेम्स आर केलर और उनके सहयोगियों ने मत दिया है कि प्रजातियां अपना वितरण उत्तर की और ऊचाइयों में खिसका रही हैं जिससे वे अपने सामान्य तापमान के दायरे में पहुंच सकें.
इस अनुकूलन क्षमता का अच्छे से दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है, लेकिन उसे बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 9 उत्तरी अमेरिका के पर्वतीय क्षेत्रों के,1984 से लेकर 2011 तक के, 27 साल के उच्च विभेदन सैटेलाइट (Satellite) आंकड़ों का विशलेषण किया. इन तस्वीरों के आधार पर विशेषज्ञ विभिन्न ऊंचाइयों में अलग अलग तरह के कटिबंधीय, उपआर्कटिक, तटीय, और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्रों (Ecosystem) के वनस्पति (Vegetation) के विस्तार की मात्रा में आए बदलाव को सुनिश्चित कर सके.
आंकड़ों ने साफ तौर पर दर्शाया कि अध्ययन किए सभी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में वनस्पति (Vegetation) ऊपर की ओर ऊंचाइयों में तेजी से खिसकर रही है. इन गतियों को जानवरों की गर्म होते तापामान के प्रति अनुक्रिया से बहुत ही तेज पाया गया है. लेकिन ज्यादा ताजा आंकड़ों का अध्ययन में शामिल कर और ज्यादा शोध की जरूरत है क्योंकि पिछले 12 साल से जमाकिए जा रहे सैटेलाइट (Satellite) के आंकड़े अभी शामिल नहीं किए गए है.
इसके अलावा 1984 से पहले के आंकड़ों की अनुपस्थिति उनके अध्ययन को सीमित करने का काम करता है जिससे व शोधकर्ता वनस्पति (Vegetation) वितरण का जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से सीधे संबंध की पुष्टि नहीं कर सके. शोधकर्ताओं ने लिखा कि उनकी पड़ताल उपकटिबंधीय से उपआर्कटिक के बीच पर्वतों की ऊंचाइयों में वनस्पति की स्वरूपों की सुनिश्चित करने में मदद करती है. इसे यदि मजबूत किया गया तो यह पड़ताल संरक्षण (Conservation) के नियोजन को फिर से निरूपित करने के लिए प्रेरित कर सकती है.
शोधकर्ताओं ने बताया कि हम जो वनस्पति (Vegetation) में बदलाव देख रहे हैं उसे बेहतर तरह से परिभाषित करने के लिए और ज्यादा कार्य करने की जरूरत है. जिससे हरी वनस्पति, प्रजातियों की गतिविधि, व्यापक पारिस्थिति (Ecosystem) की बदलाव का मापन किया जा सके. इससे जलवायु (Climate) के बदलाव और उसकी दिशा की बेहतर और सटीक जानकारी मिल सकेगी.
शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका अध्ययन आधुनिक सैटेलाइट (Satellite) इमेजिंग के आंकड़ें के संभव नहीं हो सका जिसमें नासा के सैटेलाइट के साथ शक्तिशाली कम्प्यूटिंग के हमारे ग्रह की अभूतपूर्व तस्वीर देखी जा सकी और महें यह समझने की क्षमता मिली कि कैसे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर्यावरण (Environment) में बदलाव के प्रति अनुक्रिया कर रहे हैं. शोध के नतीजे PLOS क्लाइमेट में प्रकाशित हुए हैं.
सोर्स :- “दैनिक भास्कर”
