22 मार्च 2022 |
सार
जुलाई में कूड़ाघाट के डाककर्मी शैलेंद्र के पकड़े जाने पर पूरा मामला खुलकर सामने आया था। 10 करोड़ रुपये से अधिक के हेरफेर की आशंका है, जांच रिपोर्ट के बाद कुल रकम खुलेगी।

गोरखपुर मुख्य डाकघर।
विस्तार
गोरखपुर जिले के डाकघर में बंद पड़े खातों को सक्रिय कर 50 लाख रुपये से अधिक के हेरफेर मामले में जांच का दायरा बढ़ गया है। फिलहाल, तीन हजार खातों की जांच हो रही है। ये सभी खाते शहरी क्षेत्र के पांच से अधिक डाकघर में संचालित होते थे।
जांच टीम के रडार पर छह डाककर्मी भी हैं। आशंका जताई जा रही है कि ये सब भी इस हेरफेर में शामिल रहे हैं या अपने स्तर से वित्तीय अनियमितता की है। उधर, आरोपी बनाए गए दोनों डाक कर्मियों ने तीन लाख रुपये और जमा करवाए हैं। मामला सामने आने पर बीते शुक्रवार को दोनों आरोपी डाक कर्मियों ने 40 लाख रुपये पहले ही जमा करवा दिया था।
दरअसल, पूरा मामला जुलाई में कूड़ाघाट डाकघर में शैलेंद्र नाम के डाक कर्मी के पकड़े जाने पर सामने आया। जांच में सामने आया था कि शैलेंद्र ने अपने पद का दुरुपयोग कर कूड़ाघाट डाकघर में 10 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता की थी। मामले प्रकाश में आने पर शैलेंद्र को निलंबित कर पूरे मामले की जांच शुरू की गई। सूत्रों ने बताया कि इस दौरान ही शैलेंद्र ने जांच टीम को डाककर्मी शैलेष के बारे में जानकारी दी। सूत्रों ने बताया कि उसने शैलेष का नाम बताने के साथ दो अन्य डाक कर्मियों के नाम भी जांच दल को लिखित में दिया था।
अपने दिए पत्र में उसने बताया कि दोनों डाककर्मी शैलेंद्र के बेहद खास हैं। इसके बाद पूरे मामले की जांच आगे बढ़ी। इसमें विश्वविद्यालय डाकघर व प्रधान डाकघर के दो कर्मियों की वित्तीय अनियमितता सामने आई। पता चला कि प्रधान डाकघर के सिस्टम मैनेजर शैलेश सिंह ने 23 लाख रुपये और विश्वविद्यालय डाकघर के लिपिक वितेश पांडेय ने 22 लाख रुपये का हेरफेर किया था। जांच टीम की रिपोर्ट पर दोनों डाक कर्मियों के निलंबित कर जांच आगे बढ़ा दी। रुपयों के हेरफेर करने में डाक विभाग दोनों आरोपियों पर मुकदमा भी दर्ज करवाएगा।
ये था पूरा मामला, ऐसे किया हेरफेर
आरोपी डाक कर्मियों ने वर्षों से बंद पड़े खातों की लिस्ट बनाई थी। उन सभी खातों में रुपये थे, लेकिन खाते बंद हो गए थे। मतलब सक्रिय नहीं थे। इसके बाद इन खातों से दूसरे फर्जी या डाक कर्मियों ने अपने जानने वाले ग्राहकों के खातों में रुपये भेज दिए। ये सभी नए खाते 2018 से लेकर अभी के बीच हैं।
सूत्रों ने बताया कि शैलेश के पास डाकघर के सभी शाखाओं के जिम्मेदारों की आईडी और पासवर्ड था। मृत पड़े खातों से जीवित खातों में रुपये ट्रांसफर करने के अलावा पेंशन व ब्याज की रकम भी उसी खाते से निकाल ली थी। जांच में सामने आया है कि कई अन्य डाकघरों के कर्मियों ने सूची तैयार करने में मदद की थी। इसके बदले उन्हें भी उनका हिस्सा मिलता था।
करोड़ों रुपये का हेरफेर हो सकता
सूत्रों ने बताया कि दो मामले जो सामने आए उसके मुताबिक दो खाते से ही लगभग दो लाख रुपये का हेरफेर सामने आया। ऐसे ही अगर तीन हजार खातों को जोड़ लें और औसत 40 हजार रुपये का हेरफेर हो तो भी 12 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता। जांच टीम इन खातों की जांच करने के बाद ही रिपोर्ट के साथ कार्रवाई के लिए लिखेगी।
खाताधारकों के नाम सामने आने पर बढ़ेगा संकट
सूत्रों ने बताया कि जिस समय के खातों से इन रकम का हेरफेर किया गया था, उन खाताधारकों के परिजनों को खाते में रुपये होने की जानकारी तक नहीं थी। दस से बारह वर्ष तक खातों में वैसे ही रुपये पड़े थे। खातों को जब कागज से कंप्यूटर में दर्ज किया गया था, तो ये खाते सामने आए। अब सवाल है कि क्या जिन खाताधारकों के खाते से रुपये का हेरफेर किया गया, उनके परिजनों को अब वो रकम दी जाएगी? शायद इसी संकट से इन खाताधारकों के परिजन सामने नहीं आ रहे हैं। हालांकि, अमर उजाला के पास खाताधारकों के नाम और राशि दोनों हैं। लेकिन, इनके असली पते की जानकारी नहीं होने से इनके नाम नहीं लिखे गए हैं।
प्रवर डाक अधीक्षक मनीष कुमार ने कहा कि जांच में सभी बिंदुओं को प्रकाश में रखा गया है। अभी जांच चल रही है। हजारों खातों की जांच की गई है, जिससे रुपयों का हेरफेर किया गया। सोमवार को तीन लाख रुपये और उक्त दोनों आरोपी डाककर्मियों ने जमा करवाया है। इनपर मुकदमा दर्ज करवाया जाएगा।
केस 1
डाकघर के एक खाताधारक के खाते से 1 लाख 21 हजार रुपये का हेरफेर किया गया। 2004 में यह खाता खुला था और पांच साल बाद खाता बंद हो गया। जबकि, विभाग के अनुसार इस खाते का संचालन होता रहा। 2018 में इस खाते से एक-दूसरे खाते में इन रुपयों को ट्रांसफर किया गया। इसी खाते से रुपयों के हेरफेर से पूरा मामला खुलकर सामने आया। जांच शुरू हुई तो मामला 50 लाख रुपये से अधिक का हो गया।
केस 2
2003 में एक-दूसरे खाते से 49 हजार रुपये का हेरफेर किया गया था। इस खाते को भी सक्रिय रखते हुए 2017 में दूसरे खाते में रुपये ट्रांसफ र किए गए। ये खाता भी डाक विभाग के एक जानने वाले के नाम से खोला गया था। जांच में ये तथ्य सामने आया है। ऐसे ही एक और खाता 2005 का था। छह वर्ष बाद यह खाता बंद हो गया। लेकिन, इस खाते से रुपये 2019 में दूसरे खाते में भेजे गए।
Source :- “अमर उजाला”
