14 फ़रवरी 2023 | इंदौर देवी अहिल्या बाई की नगरी है और वे खुद भगवान शिव की परम भक्त रही हैं। इंदौर के कई शिवालय भक्तों के लिए आस्था का केंद्र हैं। शिव पूजा के महान पर्व महाशिवरात्रि पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजा के लिए आते हैं। हर मंदिर की अपनी एक खासियत होती है। कहीं चारों धाम के देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं तो कहीं 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन एक साथ होते हैं।
श्मशान घाट पर विराजित है 300 साल पुराना भूतेश्वर महादेव मंदि
इंदौर के पंचकुइया स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर 300 साल पुराना है। यहां श्मशान घाट पर महादेव विराजमान हैं। कहा जाता है कि महादेव के सामने अंतिम संस्कार करने से मरने वाले की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां नर्मदा से निकले स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना की गई है। मंदिर में भगवान के सामने एक बड़ी खिड़की बनाई गई है और मुक्तिधाम की दीवार में एक खिड़की बनाई गई है, ताकि महादेव के सामने अंतिम संस्कार किया जा सके। महाशिवरात्रि पर भगवान की आराधना के लिए लंबी कतार लगती है।
इंदौर के परदेशीपुरा स्थित गेंदेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर (शिवधाम) में एक साथ बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन होते हैं। यहां ज्योतिर्लिंग के साथ चारों धामों के देवता भी विराजमान हैं। वहीं, गुंबद पर बारह ज्योतिर्लिंग हैं। इससे भक्तों को दूर से ही महादेव के दर्शन होते हैं। यहां महाशिवरात्रि पर हर साल पांच दिवसीय विवाह उत्सव का आयोजन होता है। इसमें शहर भर से श्रद्धालु भाग लेते हैं और भगवान के विवाह के साक्षी बनते हैं।
इंदौर के नेमावर रोड पर स्थित देवगुराड़िया शिव मंदिर भक्तों के बीच आस्था का केंद्र है। यह मंदिर होलकर राज्य के प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस स्थान को गरुड़ तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। देवी अहिल्या बाई 1784 में महेश्वर से इंदौर प्रवास के दौरान यहां दर्शन के लिए आई थीं। यह भी उल्लेख है कि उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इस मंदिर को गुटकेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। यहां वर्षा ऋतु में गोमुख से निकलने वाले जल से शिवलिंग का अभिषेक होता है।
पंढरीनाथ चौराहे पर स्थित इंद्रेश्वर महादेव मंदिर के नाम पर इंदौर शहर का नाम इंदूर रखा गया। कहा जाता है कि इंदौर चार हजार साल पुराना है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार तुकोजीराव प्रथम द्वारा कराया गया था। जब शहर में पानी का संकट होता है, तो नगरवासी इंद्रेश्वर महादेव की शरण लेते हैं और उसे जलमग्न कर देते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से जल संकट से मुक्ति मिलती है और अच्छी वर्षा होती है। इंद्रेश्वर महादेव के दर्शन के लिए राज्य भर से भक्त आते हैं। मंदिर के बारे में भी कई किंवदंतियां हैं।
किला मैदान में गुटकेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। इस मंदिर की स्थापना 1851 में हुई थी। वर्तमान में जहां कॉलेज है, वहां सेना की छावनी थी। युद्ध में जाने से पूर्व सैनिक गुटकेश्वर महादेव को प्रणाम करते थे। उनका आशीर्वाद लेने के बाद ही सैनिक अपने काम पर जाते थे। पुजारी परिवार की पांचवी पीढ़ी मंदिर में सेवा कार्य कर रही है। इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार भी शासकों द्वारा कराया गया था। वर्तमान मंदिर के पीछे नदी बहती थी, इसलिए पहले यह पूर्व की ओर थी, बाद में यह पश्चिम की ओर थी। गुटकेश्वर सद्गुरु परिवार ट्रस्ट के धीरज शुक्ल के मुताबिक महाशिवरात्रि पर मंदिर को फूलों से सजाया जाएगा।
सोर्स :-“नईदुनिया”
