14 अप्रैल2022 | चूड़िया महिलाओं का श्रृंगार होती हैं। हिंदू परंपरा के मुताबिक इसे सुहाग के तौर पर भी देखा जाता है, लेकिन जब ये किसी की पूरी जिंदगी बदल देती हैं तो फिर इस चूड़ियों की खनक कुछ खास हो जाती हैं। हम बात कर रहे हैं बिहार के मधुबनी की रहने वाली सीता देवी की। सीता देवी की शादी कम उम्र में ही गरीबी के कारण हो गई थी। जब उनकी शादी हुई थी तो घर में खाने के दाने तक मुश्किल से नसीब होते थे।
उनके पति सुखन शाह बताते हैं, गरीबी इतनी थी कि एक टाइम खाना खाते थे तो दूसरे टाइम का सोचते थे। चूड़ी का कारोबार पुश्तैनी था। पिता जी भी यही काम करते थे, लेकिन उस वक्त ना तो उस तरह का मार्केट था और न ही डिमांड।
वो कहते हैं, गांव में सड़क तक नहीं थी। पिता जी गांव के बाजार में जाकर चूड़ी बेचते थे। दरअसल, गांव में अभी भी एक साप्ताहिक मार्केट लगता है। जिसे देहात में पेठिया या हाट बोला जाता है। सुखन के पिता वही बैठक चूड़ी बेचा करते थे।

सुखन शाह कहते हैं, शादी हुई उसके बाद से पत्नी सीता भी साथ में चूड़ियां बनाने लगीं। धीरे-धीरे उनके सामान की पहचान राज्य, देश के अलावा विदेशों में भी मिलने लगी। सुखन की पत्नी सीता देवी कहती हैं, अंगूठा छाप (अनपढ़) महिला कोई पढ़ाने-लिखाने का काम तो नहीं कर सकती हैं। पुश्तैनी कारोबार को ही हम पूरे परिवार मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। और इससे अच्छी आमदनी भी हासिल कर रहे हैं। सीता देवी और उनके परिवार के लोग लाख (बिहार में इसे लाह की चूड़ी कहा जाता है) से बनी चूड़ियां अलग-अलग डिजाइन में बनाते हैं।
सीता के पति सुखन शाह कहते हैं, बदलते वक्त के साथ चूड़ी का मार्केट भी बदल रहा है। अब नए-नए डिजाइन में इसकी डिमांड है। शादी-ब्याह, सीजन के हिसाब से इसकी मांग होती है।
पहले सीता देवी की चूड़ियां जिला और बिहार तक ही सीमित थीं, लेकिन अब उनकी चूड़ियों की मांग देश के कई राज्यों में है। सीता देवी कहती हैं, राज्य सरकार और जिला प्रशासन अपने स्तर पर कई कार्यक्रम करवाती है जहां हाथों से बनाई चीजों का बाजार लगता है। यहां दूर-दराज से लोग आते हैं और इसे देखते हैं।
सीता के पति सुखन शाह बताते हैं, दिल्ली के सूरज-कुंड मेला समेत कई राज्यों में लगने वाले इस तरह के हाट में वो पूरे परिवार के साथ हिस्सा लेते हैं। अपने सामान को बेचते हैं। इसी दौरान उन्हें विदेशों से भी ऑर्डर मिलते हैं। उसकी वो सप्लाई करते हैं। राज्य में भी वो अपने सामानों को ट्रांसपोर्ट के माध्यम से भेजते हैं।
सुखन शाह के लड़के अविनाश हैं जो मिथिला पेंटिंग आर्टिस्ट हैं। वो कहते हैं, पहले चूड़ियों के कारोबार में उतनी कमाई नहीं थी, लेकिन जिस तरह से समय बदल रहा है, लोगों की पसंद बदल रही है, चूड़ियों की मांग बहुत ज्यादा है।
दरअसल, बिहार की चूड़ियां देशभर में प्रसिद्ध हैं। मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, जयनगर कई जिले हैं, जहां की चूड़ियां काफी प्रसिद्ध हैं। सबसे अधिक मुजफ्फरपुर की चूड़ी प्रसिद्ध है। सुखन शाह बताते हैं कि वो कच्चा माल अपने लोकल मार्केट या मुजफ्फरपुर से ही मंगवाते हैं। हालांकि, यदि वो अपने लोकल मार्केट से चूड़ी बनाने में लगने वाले सामान को खरीदते हैं तो उसकी ज्यादा कीमत देनी होती है।
चूड़ी बनाने के लिए सबसे प्रमुख लाख यानी लाह होता है। चूड़ी को बनाने में लगने वाले सामान को लेकर सीता देवी कहती हैं, इसे बनाने के लिए खास तौर से चओरी, चपरा, रंजन, सफेद पेपर, चपरा आलाटूल, मोहर चपरा, कुसुम चपरा, रंगीन रंग , रिंग, सफेद शीशा, कलर शीशा, स्टिकर, सफेद पाउडर, चमकी, बुरादा चमकी, लकड़ी, कोयला, लकड़ी का तख्ता, हत्था, कुन, छोटा बड़ा कुन, लकड़ी का साचा, देवला हत्था, सरौता, कैची, चूटा, पनकट्टा,बर्तन और गोरा की जरूरत होती है।
सीता देवी कहती हैं कि उन्होंने इसे बनाने की कही से ट्रेनिंग नहीं ली है। वो कहती हैं, अपने परिवार में बनाते-बनाते और प्रैक्टिस कर उन्होंने ये सब सीखा है। चूड़ियों की वैराइटी को लेकर कहती हैं, खास तौर से चुनरी, सुरखी, कंगन सेट, चेंगल, दुल्हन सेट, चूड़ी पर नाम लिखा हुआ- इस तरह की चूड़ियां वो बनाती हैं। सीता कहती हैं कि शादियों के सीजन में कंगन सेट, दुल्हन सेट, नाम लिखी हुई चूड़ियों की बहुत ज्यादा डिमांड होती है। एक चूड़ी सेट की कीमत 500 से लेकर 2500 रुपए तक की होती है।

Source;- ‘’दैनिकभास्कर’’
