ठंड में तिलापिया मछली मत्स्यपालकों के लिए बनेगी बेहतर विकल्प
बिहार

ठंड में तिलापिया मछली मत्स्यपालकों के लिए बनेगी बेहतर विकल्प

बेतिया। केरल एवं विदेशों में बड़े पैमाने पर उत्पादन की जाने वाली तिलापिया मछली पहली बार सूबे के लिए सफल मानी जा रही है। यहां के मत्स्यपालक इसकी खेती कर इससे ज्यादा आमदनी ले सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मछली का बढ़वार जाड़े में भी ज्यादा हो रहा है। जबकि दूसरी प्रजाति की मछलियों का ग्रोथ जाड़े में न के बराबर होता है। यहां के मत्स्यपालकों के बीच इस मछली को प्रचलित करने के लिए पहली बार किया गया प्रयोग अब सफल रहा। इसके लिए चार जिलों समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, पूर्वी और पश्चिम चंपारण के 17 प्रगतिशील मत्स्यपालकों ने बेहतर ढंग से इसका पालन किया है। तिलापिया के प्रयोग के लिए छह से आठ माह का समय निर्धारित किया गया था, इसमें तीन माह में एक ग्राम की मछली सौ ग्राम तक हो चुकी है। सबसे अश्चर्यजनक बात यह है कि ठंड में भी इस प्रजाति की मछली का बढ़वार ज्यादा हुआ है। राष्ट्रीय मत्सि्यकी विकास बोर्ड, हैदराबाद के द्वारा तिलापिया पर कार्य कर रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के अधीन ढोली मत्सि्यकी महाविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. शिवेन्द्र कुमार ने बताया कि इस मछली का बढ़वार ठंड में बेहतर होना इस क्षेत्र के लिए नई बात है। बुधवार को इनपुट के तौर पर फिश फीड देने केविके आए मत्स्य वैज्ञानिक डा. कुमार ने बताया कि इस जिले में 2 एकड़ में इसकी खेती की गई है और इसमें मछली का बढ़वार बेहतर हुआ है। चार जिलों में अक्टूबर माह में मछली का स्टॉक हुआ था। इसे अप्रैल में निकाला जाएगा, तब तक एक मछली 6 सौ ग्राम की हो जाएगी। इसमें 17 मत्स्यपालक तिलापिया का पालन कर रहे हैं। इसमें पश्चिम चंपारण के तीन किसान शामिल हैं।

एक एकड़ में एक वर्ष में 3 लाख की होगी आमदनी
मत्स्य वैज्ञानिक के अनुसार इस मछली की खेती के लिए किसानों को एक ओर जहां कम लागत आएगी, तो दूसरी ओर इससे आमदनी ज्यादा। एक एकड़ में एक साल में एक मत्स्यपालक 3 लाख रुपये का मुनाफा ले सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तिलापिया मछली मादा ही पालते हैं। ऐसे में इस मछली के प्रजनन की समस्या से मत्स्यपालकों का कोई लेना देना नहीं रह जाता है। इतना ही नहीं इस मछली का चयन रोहू, कतला एवं मृगल के साथ भी आसानी से किया जा रहा है। अन्य विशेषताओं के साथ इसमें अन्य मछलियों के मारने की क्षमता नहीं होती है। इसलिए पालन में प्रतिद्वंद्विता भी नहीं होती है। 10 एकड़ क्षेत्र में यानी तालाबों में इसका प्रयोग शुरू किया गया है।

कोट
केरल के बाद तिलापिया को सूबे में लाने के लिए यह प्रयोग किया किया गया है। यह प्रयोग सफल माना जा रहा है। मछली सूबे के लोगों के लिए मुख्य फूड हैबिट एवं इसके स्वादिष्ट होने से इसकी खेती बड़े पैमाने पर होगी।

डॉ. शिवेंद्र कुमार
वरीय मत्स्य वैज्ञानिक
मत्सि्यकी महाविद्यालय, ढोली

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