अक्टूबर 31 2023 ! हाल ही में पाकिस्तान में हज़ारों लोगों ने इसराइल विरोधी रैलियों में हिस्सा लिया, मगर पाकिस्तानी सरकार कूटनीतिक संतुलन साधते हुए चल रही है.
पाकिस्तान ने युद्ध को ख़त्म करने की अपील की है. विश्लेषकों का मानना है कि यह अपील बड़े ही सधे हुए शब्दों में की गई.
ऐसा इसलिए, ताकि एक ओर पाकिस्तान अपने लोगों को बता सके कि वह भावनात्मक रूप से फ़लस्तीनियों के साथ है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों से जुड़े अपने आर्थिक और विदेश नीति सम्बंधित हितों को भी सुरक्षित रख सके.
पाकिस्तान ऐतिहासिक तौर पर फ़लस्तीनियों के पक्ष में रहा है. उसने अभी तक इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते स्थापित नहीं किए हैं.
पाकिस्तान ‘अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत’ एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना का समर्थन करता है जिसकी राजधानी यरूशलम में हो. वह कई दशकों से इसकी वकालत करता आ रहा है.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसराइल ने ग़ज़ा पर हमले जारी रखे तो पाकिस्तान के सामने जल्द ही ‘आगे कुआं तो पीछे खाई’ वाली स्थिति पैदा हो सकती है.
जब सात अक्टूबर को ग़ज़ा से इसराइल पर हमास के हमलों की ख़बर आई तो पाकिस्तान ने ‘इंसानों की जान जाने’ और ‘हालात बिगड़ने की आशंका’ पर चिंता जताते हुए अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत दो देशों की स्थापना वाले समाधान की वकालत की.
पाकिस्तान ने अपने आधिकारिक रुख़ को दोहराया कि फ़लस्तीनी देश की स्थापना 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर की जाए.
इस्लामाबाद में इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्ट्रैटिजिक स्टडीज़ में रिसर्च फ़ेलो अरहमा सिद्दीक़ा कहती हैं, “ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रेस रिलीज़ में फ़लस्तीन के साथ ‘कब्ज़ाया गया’ शब्द इस्तेमाल नहीं किए.”
वह कहती हैं कि बयान के लिए शब्दों का चयन बहुत ही सावधानी से किया गया था और इसका कारण है- सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंध बहाली की प्रक्रिया.
अरहमा सिद्दीक़ा कहती हैं, “जब संघर्ष शुरुआती दौर में था तो पाकिस्तान को नहीं पता था कि सऊदी अरब और इसराइल के बीच चल रही मैत्री-प्रक्रिया का क्या होगा. ऐसे में पाकिस्तान नहीं चाहता था कि कुछ ऐसा करे जिससे सऊदी अरब नाराज़ हो.”
लेकिन बाद में पाकिस्तान मुखर होकर ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई की आलोचना करने लगा.
कुछ दिन बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का बयान आया, जिसमें ‘आक्रामकता तुरंत रोकने’ के लिए कहा गया और इसराइल द्वारा ग़ज़ा के नागरिकों पर ‘अंधाधुंध और बेहिसाब’ ताक़त के इस्तेमाल की आलोचना की गई थी.
फ़लस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता के रास्ते में आ रही अड़चनों को ओआईसी जैसे कूटनीतिक माध्यमों से दूर करने का दबाव बनाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है.
उसने ग़ज़ा में मदद भी भेजी है. इस्लामाबाद में फ़लस्तीनी राजदूत ने हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से मुलाक़ात की थी, जिन्होंने फ़लस्तीनियों के प्रति समर्थन जताया था.
मगर 19 अक्टूबर को जब विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज़ ज़ाहरा बलोच से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान फ़लस्तीनियों की रक्षा के लिए सेना भेजने का इरादा रखता है, तो उन्होंने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार रसूल बख़्श रईस मानते हैं कि इसराइल-हमास संघर्ष के बीच पाकिस्तान का जवाब संयमित और सोचा-समझा है और आगे भी ऐसा ही रहने वाला है.
रईस कहते हैं, “भले ही कार्यवाहक सरकार हो, सेना हो या फिर मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां, सभी ने फ़लस्तीनियों के प्रति एकजुटता का भाव दिखाया, लेकिन ऐसे लोकलुभावन बयान देने से परहेज़ किया जिनसे इसराइली नागरिकों के ख़िलाफ़ ताक़त या हिंसा का इस्तेमाल को बढ़ावा देने का संकेत जाए.”
रसूल बख़्श रईस की राय है कि पाकिस्तान इस बात को अच्छी तरह समझता है कि दुनिया इस मसले पर कितनी ज़्यादा बंटी हुई है और कौन सा देश किस ओर खड़ा है.
वह कहते हैं, “पाकिस्तान का फ़लस्तीनियों के साथ ऐतिहासिक और भावनात्मक नाता है लेकिन उसके रणनीतिक और आर्थिक हित अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य देशों से जुड़े हुए हैं. पाकिस्तान न सिर्फ़ इन देशों को निर्यात करता है बल्कि इनसे उसे आर्थिक सहायता भी मिलती है. ऐसे में पाकिस्तान आर्थिक संकट के बीच इनमें से किसी को नाराज़ करना नहीं चाहेगा.”
सोर्स :-“BBC न्यूज़ हिंदी”
