16-अक्टूबर-2021 | प्रदेश में एक दशक में खेती में बड़ा परिवर्तन आया है। बोनस व एमएसपी पर खरीदी से इसका लाभ किसानों को मिल रहा। इसके बावजूद समय के साथ खेती के ट्रेंड और लोगों की जरूरत के मुताबिक किसानों ने एक से अधिक फसलें लेने, सब्जियां, फल व फूल लगाने भी प्रारंभ कर दिए। हार्टिकल्चर को बढ़ावा मिलने से युवाओं ने फार्मिंग खेती भी करना प्रारंभ कर दी। इससे उनकी आमदनी भी बढ़ने लगी। नए प्रयोग होने लगे। हाल ही में खेतों की मेढ़ की जमीन का भी उपयोग सब्जियां लगाने में किया जाने लगा। यहां तक कि बैंगनी फूल गोभी भी उगाई जा रही है। वर्तमान में धान के साथ ही हार्टिकल्चर में भी बड़ा वेरिएशन आया। किसान अब टमाटर ज्यादा लगाने लगे हैं। उसका रकबा भी बढ़ने लगा। जहां पानी की सुविधा थी या ट्यूबवेल लगे वहां जमकर टमाटर लगाया जाने लगा। पत्थलगांव में से इसकी शुरूआत हुई और फिर देखते-देखते धमधा, बेमेतरा, सिमगा, बलौदाबाजार, भाटापारा क्षेत्र में टमाटर को लेकर बड़ा चेंज आया। पहले हाईब्रीड में अविनाश -2 किस्म का टमाटर इसके बाद सोहो किस्म भी बोई जाने लगी। किसान प्रति एकड़ 300 से 400 क्विंटल और अब 700 से 800 क्विंटल तक उत्पादन करने में सफल हो रहे हैं। टमाटर को गेम चेंजर माना जाने लगा। फरवरी में किसानों को दो रुपए किलो तक टमाटर बेचना पड़ता है। बाकी सीजन में उन्हें दस रुपए किलो तक मिल जाते हैं। इस तरह प्रति एकड़ वे पांच से छह लाख रुपए तक कमा लेते हैं। कुलपति एसके पाटिल के अनुसार आईजीकेवी धान के खेतों की मेढ़ों की जमीन का उपयोग सब्जी लगाने में कर रहा है। अंबिकापुर में इस पर बैंगनी फूलगोभी उगाई गई है। इस जैविक खेती में इंथोसाइनिन होने के कारण इसका रंग बैंगनी होता है। यह दिल की बीमारी, कैंसर, आंखों की समस्या को कम करता है। मस्तिष्क को भी बेहतर बनाता है। इस किस्म की 200 ग्राम फूलगोभी में 400 एमजी इंथोसाइनिन पाया जाता है। बैंगनी फूल गोभी में सामान्य फूल गोभी की अपेक्षा 25 फीसदी अधिक विटामिन ए पाया जाता है।
फसलों पर दो अलग स्थितियां : ठाकुर
कृषि विशेषज्ञ डॉ. संकेत ठाकुर के अनुसार फसलों को लेकर छत्तीसगढ़ में दो स्थिति बनी। पहला पारंपरिक किसान जिनके पास सिंचाई की सुविधाएं नहीं थी। वे धान की खेती लेते रहे। बोनस मिलने से कोदो-कुटकी की जगह भी धान बोया जाने लगा। जहां पानी की सुविधा थी वहां सब्जियों की खेती की जाने लगी। फिर यहां से अमरूद, कुंदरू, मिर्च, टमाटर आदि विदेश भेजे जाने लगे।
Source;-“दैनिक भास्कर
