उन्होंने दद्दा का जिक्र करते हुए कहा कि वो जितने बड़े खिलाड़ी थे, उतने बड़े देशभक्त भी। 1936 में जब जर्मनी के चांसलर हिटलर ने उन्हें अपने देश की नागरिकता और सेना में मेजर का पद देने की पेशकश की तो उन्होंने ये कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि वो भारत के लिए ही खेलेंगे।
सोर्स :-“अमर उजाला”
