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आरक्षण नीति पर समग्र रूप से हो विचार, जाति आधारित सुविधाओं का समापन; एक्सपर्ट व्यू

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28 नवंबर 2022 |  हाल के वर्षों में गुजरात के पाटीदार, राजस्थान के गुर्जर, हरियाणा के जाट और महाराष्ट्र के मराठा समुदाय जैसे प्रभावशाली समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग हेतु आंदोलन करने की घटनाएं सामने आई हैं। प्रभावशाली समुदायों द्वारा भी उच्च शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण की मांग के पीछे बड़ा कारण यह है कि ये जातियां खेती से कम आय से त्रस्त हैं और अपने बच्चों के भविष्य को अच्छी नौकरियों या आय के अन्य स्रोतों से सुरक्षित करना चाहती हैं।

राजनीतिक दल भी अपने हित साधने के लिए विभिन्न राज्यों में किसान समुदाय के लोगों को आरक्षण देने का लालच देते रहे हैं। सारे राजनीतिक दलों को पता है कि ओबीसी और एससी-एसटी आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और संविधान में जिन समुदायों को आरक्षण मिला हुआ है, उसे कम करके दूसरे समुदायों के लोगों को उसमें हिस्सा नहीं दिया जा सकता है। फिर भी जब राजनीतिक दलों को अपना जनाधार बढ़ाना होता है, चुनावों के समय आरक्षण का मुद्दा छेड़ देते हैं।

सभी राजनीतिक दल समझते हैं कि पढ़ाई और नौकरियों में आरक्षण के पीछे संवैधानिक मंशा क्या है, मगर वे अपने राजनीतिक लाभ को ध्यान में रख कर अलग-अलग जातियों को इसके लिए आंदोलन को उकसाते रहे हैं। हरियाणा में जाट आरक्षण, गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर तथा महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए थे। इन मांगों के पीछे समुदायों का अपना तर्क हो सकता है। कुछ राज्य सरकारों की इस दलील में भी सचाई हो सकती है कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष के बाद भी कई ऐसे समुदाय हैं जो पिछड़े हैं। परंतु प्रश्न यह है कि क्या ऐसे तमाम पिछड़ेपन को दूर करने का एकमात्र जरिया आरक्षण ही है? इसका उत्तर हां में नहीं हो सकता।


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