HIV एक ऐसी बीमारी है जो इंसान को अंदर और बाहर दोनों जगह से मारती है, जहां शरीर की इम्यूनिटी इंसान का साथ छोड़ देती है वही समाज भी एचआईवी पेशेंट्स से मुंह मोड़ लेता है. लेकिन इस बीमारी को तभी हराया जा सकता है जब इसका सही इलाज कराया जाए, लेकिन आज भी लोग बदनामी के डर से इस बीमारी का इलाज नहीं करवाते और इसे जानलेवा बना लेते हैं जबकि इस बीमारी के साथ एक अच्छी और स्वस्थ जिंदगी जी जा सकती हैं. आइए जानते हैं इस बीमारी के खिलाफ कैसी हो आपकी तैयारी.

कई बीमारियां लोगों के जीवन में अभिशाप की तरह आती हैं और ताउम्र के लिए परेशानी बन जाती हैं उन्हीं में से एक बीमारी है एचआईवी. ये बीमारी कोई नई नहीं है लेकिन आज भी हमारा समाज इस बीमारी को स्वीकार नहीं कर पाया है इसलिए आज भी इससे पीड़ित व्यक्ति को कई अजिय्यतों से दो-चार होना पड़ता है. जहां उसको समाज में रहने लायक नहीं समझा जाता वहीं वो इंसान अंदर और बाहर दो जंग एक साथ लड़ता है. लेकिन आज इस बीमारी के बारे में जानना बेहद जरूरी है और इसे सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण की वजह से जानना नाइंसाफी है क्योंकि इस बीमारी होने के कई अन्य कारक भी जिम्मेदार हैं. वहीं आज सरकारी स्तर पर इस बीमारी का इलाज कराना बेहद सरल है जिससे न सिर्फ आप इस बीमारी से बच सकते हैं बल्कि समाज में सर उठा के जिंदगी भी जी सकते हैं.
सरकार ने इस बीमारी के उन्मूलन के लिए पिछले 20-25 सालों में बेहद ही सराहनीय कदम उठाएं हैं यही वजह हैं कि इसके आंकड़ों में पिछले 10 सालों में बेहद कमी देखी गई है. कुछ राज्यों को छोड़ दें तो लगभग पूरे देश में एचआईवी स्क्रीनिंग बढ़ी है और मामलों में कमी देखने को मिली है. नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन के मुताबिक केवल अरूणाचल प्रदेश (470%), असम (22%), मेघालय (125%), पंजाब (117%), त्रिपुरा (524%) ऐसे राज्य हैं जहां 2010 से लेकर 2023 में एचआईवी के मामलों में उछाल आया है. 31 मार्च 2023 तक देश में कुल 25,44,364 लोग एचआईवी से संक्रमित हैं और 35,866 लोगों की इस बीमारी की वजह से जान चली गई. हालांकि पिछले 13 सालों में इन आकंड़ों में 80 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है.
क्या है एचआईवी?
एचआईवी ह्यूमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस की वजह से होता है, जिसकी वजह से शरीर की इम्यूनिटी इतनी ज्यादा कमजोर हो जाती है कि शरीर किसी भी बीमारी से नहीं लड़ पाता और एक साथ कई इंफेक्शन्स की चपेट में आ जाता है जिसकी वजह से व्यक्ति को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और अगर इसका समय पर इलाज न कराया जाए तो एड्स जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी का खतरा बढ़ जाता है.
क्या सभी एचआईवी को एड्स होता है?
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, दिल्ली के अंबेडकर अस्पताल में एआरटी सेंटर की काउंसलर शिखा सिंह बताती हैं कि सभी एचआईवी पेशेंट को एड्स नहीं होता है, अगर समय रहते शरीर में इस वायरस का पता लगा लिया जाए तो पेशेंट सही समय पर ठीक से सभी दवाईयां ले तो वो पूरी जिंदगी स्वस्थ रह सकता है और एड्स जैसी खतरनाक बीमारी से बच सकता है. हां, अगर समय पर दवाईयां न ली जाए और एतिहात न बरती जाए तो फिर पेशेंट को एड्स हो सकता है. एचआईवी से एड्स बनने में कितना समय लगता है? इस सवाल के जवाब में शिखा बताती हैं कि ये हर व्यक्ति की इम्यूनिटी पर निर्भर करता है, अगर कोई एचआईवी पेशेंट हेल्दी लाइफस्टाइल जीता है तो जरूरी नहीं उसे एड्स हो लेकिन यदि किसी की इम्यूनिटी बेहद कमजोर है तो उसे एड्स हो सकता है. इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं है.
किन वजहों से होता है एचआईवी?
एचआईवी होने की चार मुख्य वजहें हैं-
– असुरक्षित यौन संबंध बनाना, जिसमें एक से ज्यादा पार्टनर्स के साथ संबंध स्थापित करना भी शामिल है.
– एचआईवी संक्रमित खून चढ़ना, किसी दुर्घटना में किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ा लेने से भी एचआईवी होता है.
– एचआईवी संक्रमित मां से बच्चे को एचआईवी होना, पर हर केस में ऐसा हो जरूरी नहीं है, आजकल डॉक्टर्स मां को ऐसी दवाएं दे सकते हैं जिससे ये वायरस बच्चे में न पहुंचे.
– ड्रग्स और दवाई के लिए एक ही सीरिंज का इस्तेमाल करना, अगर ऐसे में आप एचआईवी पेशेंट की इस्तेमाल की हुई सीरिंज इस्तेमाल कर लेते हैं तो एचआईवी फैलता है.
एचआईवी के इलाज का प्रक्रिया
एचआईवी बेहद खतरनाक बीमारी है इसलिए इसका इलाज बेहद जरूरी है, लेकिन आज लोग शर्म में इस बीमारी का इलाज कराने से घबराते हैं, लेकिन आज हर सरकारी अस्पताल में इसकी जांच से लेकर इलाज तक फ्री मुहैया कराया जाता है. सबसे अहम बात इसकी जांच से लेकर इसके इलाज के समय पेशेंट की प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखा जाता है और पेशेंट संबंधी कोई भी जानकारी किसी से सांझा नहीं की जाती. इसके साथ ही बिना पेशेंट की मर्जी के एचआईवी टेस्ट नहीं किया जाता. पेशेंट जब अपनी इजाजत देता है तभी उसका टेस्ट किया जाता है और रिपोर्ट भी पेशेंट के अलावा किसी को नहीं दी जाती.

ब्लड टेस्ट से होती है HIV की जांच
एचआईवी पता लगाने का सबसे अहम तरीका होता है ब्लड टेस्ट. जिसके लिए एचआईवी की जांच सभी सरकारी अस्पतालों के इंटरीग्रेटिड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर्स (ICTC) में की जाती है. जिसके बाद रिपोर्ट सिर्फ और सिर्फ पेशेंट के हाथ में ही दी जाती है. अगर पेशेंट एचआईवी पॉजिटिव पाया जाता है तो देश के सभी सरकारी अस्पतालों में बने एआरटी सेंटर्स में उसका नाम रजिस्ट्रेशन किया जाता है. ध्यान रखने वाली बात ये होती है कि इसमें पेशेंट की जानकारी गोपनीय रखी जाती है इसलिए उसके कार्ड पर उसके नाम की जगह एक कोड दिया जाता है.
सरकारी अस्पताल में एचआईवी जांच कराने का एक और फायदा ये है कि हर ICTC सेंटर ART Centre से कनेक्टिड होता है. ऐसे में अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तो तुरंत एआरटी सेंटर में आपका रजिस्ट्रेशन फ्री में हो जाता है और ट्रीटमेंट भी वहीं शुरू हो जाता है. ICTC सेंटर्स में रेफर किए पेशेंट और खुद भी पेशेंट आकर अपनी सहमति से ब्लड जांच करवा सकते हैं. एचआईवी रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद पेशेंट्स की काउंसलिंग की जाती है. एचआईवी पेशेंट की काउंसलिंग करना बेहद जरूरी होता है क्योंकि हमारे समाज में इस बीमारी को एक कलंक/धब्बे की तरह लिया जाता है और व्यक्ति सामाजिक और शारीरिक दोहरी लड़ाई लड़ता है. हर एआरटी सेंटर्स में मौजूद काउंसलर समय-समय पर पेशेंट की मानसिक और शारीरिक तौर पर एस्सेसमेंट करके काउंसलिंग करते हैं.

दिल्ली के अंबेडकर अस्पताल में एआरटी सेंटर की काउंसलर निवेदिता झा बताती हैं कि लोग यहां बेहद ही खराब कंडीशन में आते हैं, उन्होंने कई पेशेंट्स यहां व्हील चेयर पर आते हुए देखे हैं, लेकिन समय पर काउंसलिंग और दवाई लेने से वो बेदह स्वस्थ और अच्छी जिंदगी जीना शुरू कर देते हैं. एआरटी सेंटर में हर उम्र के लोग इलाज के लिए आते हैं और एक बेहतर जिंदगी जी पाते हैं. लेकिन बेहद जरूरी है समय पर बताए अनुसार दवाई लेना. ये दवाईयां सभी एआरटी सेंटर्स में फ्री मुफ्त कराई जाती हैं और हर बार पेशेंट को खुद आकर अपनी दवाईयां लेनी होती है. किसी खास स्थिति में ही पेशेंट के अलावा दवाई दूसरे व्यक्ति को दी जाती है. एचआईवी की रोकथाम के लिए देश में एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी (एआरटी) है जो एचआईवी में बेहद कारगर है. ये कई दवाओं से मिलकर बनी एक थेरेपी है जो एचआईवी को कंट्रोल करती है.
सफदरजंग हॉस्पिटल में कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के एचओडी प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर बताते हैं कि एआरटी दवाएं एचआईवी को कंट्रोल करने में बेहद कारगर हैं, इससे ये बीमारी कंट्रोल में रहती है और एचआईवी एड्स की बीमारी नहीं बनता. इसलिए बेहद जरूरी है कि अगर किसी व्यक्ति को एचआईवी के लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत सरकारी अस्पताल जाकर अपना टेस्ट कराना चाहिए और अपना इलाज कराना चाहिए. इसके साथ ही इस तरह के पेशेंट्स को अपना लाइफस्टाइल भी सुधारने की बेहद जरूरी होती है क्योंकि खराब लाइफस्टाइल से ये बीमारी और ज्यादा बढ़ती है और दवाओं का असर भी कम होता है.
इन दवाईयों को लेने से मरीज का एचआईवी वायरस लोड कम होता है. दवा शुरू होने के बाद समय समय पर मरीज के वायरल लोड की भी जांच की जाती है ताकि पता चल सके कि वायरस लोड कितना कम हो रहा है क्योंकि वायरस लोड जितना कम होगा उतना ही मरीज के लिए बेहतर होता है. ऐसे में एचआईवी के हर मरीज को समय पर एंटीरेट्रोवायरल दवाएं लेनी चाहिए. अगर मरीज नियमित रूप से दवाई लेना भूल जाता हैं तो वायरस फिर से बढ़ना शुरू हो जाता है जो खतरनाक हो सकता है. ऐसे में जरूरी होता है कि समय पर दवाएं ली जाएं जो आपको एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद ताउम्र लेनी पड़ती है. इसमें ऐसा नहीं है कि अगर आप बेहतर फील कर रहे हैं तो आप दवाएं लेना बीच में छोड़ सकते हैं, ऐसा करने से वायरस लोड बढ़ जाता है और फिर से लक्षण दिखाई देने शुरू हो जाते हैं.
दिल्ली का एचआईवी 95-95-95 प्लान
दिल्ली सरकार भी एचआईवी के उन्मूलन के लिए 95-95-95 प्लान पर काम कर रही है. सेंट्रल हेल्थ सर्विसेज के सीएमओ डॉ. प्रवीन कुमार बताते हैं कि हमारा टार्गेट 95-95-95 का है, इसमें पहला 95% टार्गेट उन लोगों का स्टेट्स पता करना है जिन्हें एचआईवी का खतरा है, ये बिना टेस्टिंग के संभव नहीं है, ऐसे में इस टार्गेट को पूरा करने के लिए 79 एनजीओ की मदद से हाई रिस्क कम्यूनिटी में एचआईवी टेस्टिंग बढ़ाई जाती है. हाई रिस्क कम्यूनिटिज वो हैं जहां इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है जैसे सेक्स वर्कर्स, रोड ट्रांसपोर्ट साइट्स पर ट्रक ड्राइवर्स, माइग्रेंट प्रोजेक्ट्स, ट्रांसजेंडर्स और ड्रग्स लेने वाले लोग. इसके लिए दिल्ली में टेस्टिंग के लिए 85 ICTC Centres बनाए गए हैं जिसमें एक मोबाइल ICTC वैन भी शामिल है. जो हाई रिस्क कम्यूनिटीज में टेस्टिंग करती है 2023-24 में 9 लाख से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग की गई है, जिनमें करीब 6,100 लोग एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं.
इसमें अगला 95 सभी एचआईवी पेशेंट्स को डायग्नोस के बाद एआरटी थेरेपी से जोड़ना है ताकि एचआईवी पेशेंट्स को इलाज मिल सके. अगला 95 प्रतिशत एआरटी थेरेपी लेने वाले पेशेंट्स का वायरल लोड कम करना है ताकि उन्हें एड्स जैसी बीमारी से बचाया जा सके. इस प्लान को एचीव करने के लिए साल 2030 तक का लक्ष्य रखा गया है.
दिल्ली में एम्स और सफदरजंग समेत 11 बड़े सरकारी अस्पतालों और तिहाड़ जेल समेते 12 एआरटी सेंटर्स खुले हुए हैं ये सभी 12 सेंटर्स सभी ICTC सेंटर्स से जुड़े है जहां टेस्टिंग के बाद पेशेंट्स का रजिस्ट्रेशन कर दिया जाता है ताकि संबंधित अस्पताल में उसका फ्री इलाज शुरू किया जा सके.
एचआईवी और एड्स प्रिवेंशन एंड कंट्रोल एक्ट 2017
इसके साथ ही एचआईवी पेशेंट के साथ किसी प्रकार का भेदभाव और दुर्व्यवहार न हो इसके लिए देश में एचआईवी और एड्स प्रिवेंशन एंड कंट्रोल एक्ट 2017 बनाया गया है. इस एक्ट के किसी भी एचआईवी और एड्स पेशेंट के साथ कोई भी व्यक्ति घर-परिवार या कार्यालय में दुर्व्यवहार करता है तो पेशेंट की शिकायत पर उस पर कार्यवाही की जा सकती है. ये एक्स एचआईवी पेशेंट्स को एक सुरक्षा प्रदान करता है ताकि वो समाज में सिर उठा कर जी सकें.
एचआईवी पेशेंट्स की फाइनेंशियल मदद
चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रवीन कुमार बताते हैं कि दिल्ली सरकार एचआईवी पेशेंट्स की फाइनेंशियल मदद भी करती है इसके लिए हर साल ऐसे पेशेंट्स को जो दिल्ली में रहता हो और यहां के एआरटी सेंटर्स से ट्रीटमेंट करवा रहा हो उसे 2,500 रूपये प्रतिमाह की फाइनेंशियल मदद की जाती है. ऐसे में दिल्ली में 6,630 लाभार्थी इस स्कीम का फायदा उठा रहे हैं. इस स्कीम का मकसद एचआईवी पेशेंट्स की मदद करना है ताकि उन्हें कुछ आर्थिक राहत मिल सके.
एचआईवी एक ऐसी बीमारी है जिसे सिर्फ और सिर्फ सही इलाज और हेल्दी लाइफस्टाइल से हराया जा सकता है क्योंकि एक बार ये बीमारी किसी इंसान पर हावी हो जाए तो जानलेवा साबित हो सकती है. इसलिए इस बीमारी को हराने के लिए सरकार भरसक प्रयास कर रही है लेकिन लोगों को सही इलाज और अपने अधिकारों की जानकारी होना बेहद जरूरी है ताकि वो स्वस्थ रह सकें और इस बीमारी से लड़ सकें.
