दिनांक 16 मई 2022|भूख से बिलखते बच्चे, बेबस मां-बाप। चौपट अर्थव्यवस्था, ठप्प पड़े कारोबार। गैस-तेल की लाइनों में मरते लोग, चौराहे-चौराहे मचा हाहाकार। सरकार बदलने पर अड़ी जनता और पद ना छोड़ने की जिद लिए बैठे राष्ट्रपति। ये भारत के दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका के हालात हैं। इसका भविष्य अब बेहद खराब दिख रहा है। दैनिक भास्कर रिपोर्टर एक महीने में दूसरी बार श्रीलंका पहुंचीं। इस दौरान वहां क्या-क्या बदला गया, पढ़िए इस रिपोर्ट में…
श्रीलंका में पिछले एक-डेढ़ महीने में बहुत कुछ बदला है। प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे पद छोड़ चुके हैं। उनकी जगह मात्र एक सांसद की पार्टी वाले रनिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री पद संभाल चुके हैं। अब तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोग हिंसक भीड़ में बदल गए और कई मंत्रियों और नेताओं के घरों को आग लगा दी गई।
इस सबके बीच अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है आम लोगों की मुश्किलें और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे की पद ना छोड़ने की जिद। पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत और गहरी हो गई है। खाने-पीने के सामान का संकट और गंभीर हो गया है। और अब लोगों के सब्र का बांध भी टूटने लगा है। साथ ही लोगों को अब चीन की चालबाजियां भी समझ में आने लगी हैं और भारतीयों के प्रति उनका नजरिया काफी बदला है।
एक महीने पहले एयरपोर्ट पर कुछ चहल पहल थी। इस बार सन्नाटा सा था। कोलंबो में कर्फ्यू लगा है और पेट्रोल की किल्लत की वजह से गाड़ियां आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
जिस ड्राइवर को मैंने पिछली बार साथ चलने के लिए तय किया था वो बमुश्किल तेल का इंतजाम करके मुझसे मिल सका, लेकिन इस बार वो कोलंबो से बाहर जाने के लिए तैयार नहीं है। वजह वही कि उसे भरोसा नहीं है कि बाहर कहीं तेल मिल पाएगा।
हालात सुधरने में समय लगेगा
श्रीलंका में 17 साल से टूरिज्म इंडस्ट्री से जुड़े आईपीएस आनंद के माथे पर भी श्रीलंका के बिगड़ते हालात से चिंता की लकीरें बढ़ने लगी हैं। उनको लगता है कि हालात बेहतर होने में अभी लंबा समय लगेगा। वो कहते हैं, ‘आज श्रीलंका की साख खराब हो गई है। देश में 12- 12 घंटे बिजली कट रही है, पेट्रोल नहीं है, गैस नहीं है।’ आनंद को पिछले कुछ सालों में भारी नुकसान हुआ है, लेकिन फिर वो यहीं कारोबार जारी रखना चाहते हैं। हालांकि, उनकी एक मजबूरी ये भी है कि उनके पैसे पर अब सरकार का कब्जा है।
वो कहते हैं, ‘हमारा बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। हमने जो निवेश यहां किया था वो एक डॉलर के मुकाबले 170 रुपए पर किया था। आज डॉलर 400 रुपए के करीब है। श्रीलंका की सरकार ने हमारे डॉलर अकाउंट फ्रीज कर दिए हैं और उन्हें जबरन श्रीलंकाई रुपए में बदल दिया है। हम अपना निवेश भी यहां से नहीं निकाल सकते हैं। हमारे पास अर्थव्यवस्था सुधरने का इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। हम 17 सालों से यही कारोबार कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि रिटायर होने तक यही करते रहें।’
श्रीलंका के इतिहास में आजादी के बाद ये पहली बार हुआ है जब जनता ने सरकार पर हमला किया। जनता ने ये हमला भी तब किया जब प्रधानमंत्री के समर्थकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला किया। जिस दिन ये सब हुआ, आनंद उसी दिन भारत से कोलंबो पहुंचे थे।
लिट्टे के दौर से भी खराब हालात
आनंद कहते हैं कि मौजूदा हालात उस दौर से भी खराब हैं जब लिट्टे श्रीलंका में खूनी संघर्ष कर रहा था। आनंद कहते हैं, ‘मैं 2006 से श्रीलंका आ रहा हूं। मुझे यहां आते हुए 17 साल हो गए हैं।
लिट्टे के साथ युद्ध 2009 में समाप्त हुआ था। तब भी ऐसे खराब हालात नहीं थे जैसे कि अब हैं। मिल्क पाउडर जैसी जरूरी चीज भी नहीं मिल पा रही है। मैंने यहां कभी ऐसे हालात नहीं देखे थे।’
आनंद मानते हैं कि श्रीलंका के मौजूदा हालात के पीछे सबसे बड़ा कारण राजपक्षे परिवार का भ्रष्टाचार और श्रीलंका में पर्यटन उद्योग का ठप हो जाना है।
वो कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि श्रीलंका के हालात 2019 में ईस्टर धमाकों के बाद से खराब होने शुरू हुए। इन हमलों के बाद एक साल तक पर्यटक श्रीलंका नहीं आए। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर निर्भर है।
फिर कोविड महामारी आई, उसने पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी। इतने खराब हालात के बाद भी डॉलर के मुकाबले श्रीलंका का रुपया नहीं टूटा था। तब भी एक डॉलर के मुकाबले रुपया 170-180 के आसपास रहा।’
भारतीयों को सम्मान देने लगे हैं श्रीलंकाई
उस दिन को याद करते हुए आनंद कहते हैं, ‘मैं 9 मई को अपने दोस्तों के साथ श्रीलंका पहुंचा था। हम एयरपोर्ट से भी नहीं निकल पा रहे थे, क्योंकि कोई गाड़ी मौजूद नहीं थी। हम कई घंटे वहीं फंसे रहे। फिर हमें एक बस मिली। हमारी बस को भी प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि हम भारतीय हैं तो हमें सम्मान के साथ छोड़ दिया।’
श्रीलंका के इस मुश्किल दौर में आनंद को बस एक बात की खुशी है कि अब यहां भारतीयों को पहले से अधिक सम्मान मिल रहा है।
आनंद कहते हैं, ‘मैं यहां लंबे समय से हूं। हम भारतीयों को यहां इतना सम्मान पहली बार मिल रहा है। भारत ने संकट के इस समय श्रीलंका की मदद की है और श्रीलंका के लोग इस बात को समझ रहे हैं। पहले यहां चीन के लोगों की इज्जत होती थी, अब हमारी हो रही है।’
9 मई को हुई हिंसा के बाद से प्रोटेस्ट साइट पर भी पहले जैसी भीड़ नहीं है। गॉल फेस इलाके में मुख्य प्रदर्शनस्थल पर अब गिने-चुने प्रदर्शनकारी ही हैं। पहले यहां रात भर प्रोटेस्ट चलता रहता था।
हिंसा के बाद बहुत से लोग कोलंबो से वापस अपने गांव लौट चुके हैं। कर्फ्यू की वजह से भी लोगों का बाहर निकलना मुश्किल रहा है।
सरकार ने सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों को गोली मारने के आदेश दिए हैं। अब जगह-जगह सेना के चेक प्वाइंट हैं।
जेना पिछले 38 दिनों से रोज प्रोटेस्ट में आ रही हैं। वो अब भी प्रोटेस्ट में शामिल हैं।
प्रदर्शनकारियों के कम संख्या में आने की वजह बताते हुए जेना कहती हैं, ‘तीन दिन तक कर्फ्यू था। ट्रांसपोर्ट बहुत कम हैं। बहुत अधिक चेक प्वाइंट लगा दिए गए हैं। इसी वजह से लोग यहां नहीं पहुंच रहे हैं।’
पहले लोग अपने पूरे परिवार के साथ प्रोटेस्ट में आ रहे थे। अब अधिकतर युवा प्रदर्शनकारी ही दिखते हैं।
9 मई को तत्कालीन प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के समर्थकों ने अचानक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला किया। जेना भी उस हमले में फंस गई थीं।
जेना बताती हैं, ‘मैं रोज की तरह दस बजे यहां पहुंच गई थी। मेरे सभी दोस्त भी यहीं थे। अचानक पुलिस के साथ वो लोग यहां आए और हम पर हमला कर दिया। मेरे दोस्त को बहुत बुरी तरह पीटा, उसके सिर में 28 टांके लगे हैं। मेरी एक महिला दोस्त को चाकू मारा गया। उस दिन हम ये समझ गए थे कि सेना हमें सुरक्षा नहीं दे रही है।’
जेना को अब प्रोटेस्ट में आते हुए डर लगता है, लेकिन उनका मनोबल नहीं टूटा है। वो कहती हैं, ‘अब यहां आने में डर तो लगता है, हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा, लेकिन जब तक हमें इंसाफ नहीं मिलेगा, हमारे देश को इंसाफ नहीं मिलेगा, मैं यहां आती रहूंगी, चाहे जो भी हो।’
पत्रकार अहमद बूसू भी उस दिन हुए हमले में घायल हुए थे। उनका एक पैर टूट गया था। बूसू बताते हैं, ‘मैं रोजाना की तरह कवरेज करने के बाद प्रदर्शनकारियों के कैंप में आया। अचानक कैंप पर हमला हो गया। वो एक लड़की को बुरी तरह पीट रहे थे। मैंने किसी तरह उसे बचाया तो मुझ पर हमला किया गया। एक सिपाही ने अपनी बंदूक की बट से मुझ पर हमला किया।’
बूसू और दूसरे घायलों को रेडक्रॉस के कैंप में ले जाया गया। वहां उनका इलाज चल ही रहा था कि कैंप पर भी हमला हो गया।
प्रधानमंत्री बदला, लेकिन प्रोटेस्ट जारी
भले ही राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को बदल दिया है, लेकिन प्रदर्शनकारी अब भी प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास ‘टेंपल ट्रीज’ के बाहर डटे हैं। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने अपना नारा बदल लिया है। पहले वो #MahindaGoGama का नारा लगा रहे थे। अब #NoDealGama का नारा लगा रहे हैं।
जनाक्रोश शांत करने के लिए राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे का इस्तीफा ले लिया है, लेकिन इससे भी लोगों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ है।
प्रदर्शन में शामिल अनुषिका कहती हैं, ‘ये सरकार भ्रष्ट है। जो भी इसके साथ आएगा उसे हम भ्रष्ट ही मानेंगे। जब तक राजपक्षे सत्ता में हैं, हमें सरकार पर भरोसा नहीं है।’
नए नारे का मतलब समझाते हुए वो कहती हैं, ‘हम नए प्रधानमंत्री से मांग कर रहे हैं कि वो कोई सौदा ना करें और जो डील राजपक्षे परिवार ने की हैं उनकी जांच करें।
हम ये संदेश भी देना चाहते हैं कि हम पीछे नहीं हटे हैं और हमारी नजर सरकार पर हैं। जो कुछ भी प्रधानमंत्री करेंगे, उस पर हमारी नजरें हैं और गलत निर्णयों को हम स्वीकार नहीं करेंगे।’
श्रीलंका में ईंधन संकट इतना गहरा गया है कि अब जगह-जगह ईंधन की मांग को लेकर भी प्रदर्शन हो रहे हैं।
रविवार को राजधानी के पास मीनूवानगोडा इलाके में ईंधन की मांग करते हुए लोगों ने राजधानी की तरफ जाने वाला हाइवे जाम कर दिया।
राजधानी के वाटाला इलाके में लोगों को तीन हफ्ते से केरोसीन नहीं मिला है और अब वो सड़कों पर हैं। देश के लगभग सभी हिस्सों में हालात ऐसे ही हैं।vv
पिछले महीने जब मैं यहां आई थी तो श्रीलंका का पारंपरिक नववर्ष था। लोग सड़कों पर उमड़ आए थे और प्रदर्शन में भारी भीड़ थी। प्रदर्शनकारी केक काटकर नववर्ष का जश्न भी मना रहे थे।
इस बार, रविवार को श्रीलंका के धार्मिक कैलेंडर में अहम वेसाक (बुद्ध पुर्णिमा) के मौके पर कोई खास चहल-पहल नजर नहीं आई। लोगों को पर्व मनाने का मौका देने के लिए सरकार ने कर्फ्यू जरूर हटाया, लेकिन कोई बड़ा जश्न नजर नहीं आया।
आम दिनों में वेसाक के दिन पूरा कोलंबो लालटेनों से सजा होता है। इस बार भी ऐसी ही सजावट की गई, लेकिन पहले जैसी रौनक नहीं दिखी।
श्रीलंका के आर्थिक संकट ने लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनके त्यौहारों की रौनकें छीन ली हैं। बीते एक महीने में श्रीलंका में बहुत कुछ बदल चुका है- शायद लोगों की पर्व मनाने की आर्थिक शक्ति भी क्षीण हो गई है।
Source-दैनिक भास्कर
