• June 5, 2026 3:53 pm

मिस्र के राष्ट्रपति को पीएम मोदी का फ़ोन, क्या संतुलन साधना चाहता है भारत?

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अक्टूबर 30 2023 ! मिस्र की सरकार के बयान के मुताबिक़ दोनों नेताओं ने इसराइल के ग़ज़ा में सैन्य अभियान और उससे जुड़े ताज़ा घटनाक्रम पर चर्चा की.

दोनों नेताओं ने ग़ज़ा के मानवीय संकट पर भी चर्चा की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया पर बातचीत की जानकारी दी.

 “राष्ट्रपति अल सीसी के साथ पश्चिमी एशिया में ख़राब हो रहे सुरक्षा और मानवीय हालात पर चर्चा की. हमने आतंकवाद, हिंसा और आम लोगों की जानों के नुक़सान को लेकर चर्चा की.”

हमास ने 7 अक्तूबर को इसराइल पर हमला किया था जिसमें 1400 से अधिक लोग मारे गए थे. इसराइल ‘हमास को समाप्त करने’ के उद्देश्य से लगातार ग़ज़ा पर हमले कर रहा है. इसराइल ने ज़मीनी अभियान भी शुरू किया है. अब तक ग़ज़ा में आठ हज़ार से अधिक लोग मारे गए हैं.

दोनों नेताओं ने मौजूदा संघर्ष की गंभीरता और इसके क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चर्चा की है.

भारत शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान से दूर रहा था. भारत इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष में अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने के प्रयास कर रहा है.

हमले के तुरंत बाद जहां भारत ने कहा था कि वो पूरी तरह से ‘इसराइल के साथ खड़ा है.’ वहीं भारत ने ये भी कहा है कि वो ‘स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण को इस संकट के समाधान के रूप में देखता है.’

सुरक्षा परिषद में मतदान से दूर रहने के बाद मिस्र के राष्ट्रपति से पीएम मोदी के फ़ोन कॉल को संतुलन बनाने के इसी प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है.

दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं, “भारत भले ही संघर्ष विराम पर मतदान से दूर रहा लेकिन भारत पर दबाव है कि वो फ़लस्तीनी मुद्दे पर अपने पारंपरिक स्टैंड पर बना रहे. भले ही भारत इसराइल के साथ खड़ा रहे लेकिन फ़लस्तीनियों का भी समर्थन करता हुआ भी दिखे.”

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अल सीसी से बात करने से युद्ध के हालात पर कोई असर पड़ सकता है? इस सवाल पर प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “भारत के प्रधानमंत्री ने सीसी से बात की है, इसका कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. ये सिर्फ़ बातचीत ही है, इसे एक तरह से औपचारिकता कहा जा सकता है.”

ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) के अधिकतर देशों ने संघर्ष विराम का समर्थन किया है. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि ये देश संघर्ष विराम लागू कराने की स्थिति में नहीं है

प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “अरब देश मानवाधिकार संघर्ष विराम लागू कराने का प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन जो खुला समर्थन इसराइल को पश्चिमी देशों की तरफ़ से मिल रहा है, उसके सामने उनकी आवाज़ बेअसर है. ग्लोबल साउथ अभी कमज़ोर है और उसका इतना प्रभाव नहीं है कि वो संघर्ष विराम लागू करा सके.”

  सोर्स :-“BBC  न्यूज़ हिंदी”                                  


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