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गोलीबारी की वो घटना जिससे जम्मू-कश्मीर की पहली पॉलिटिकल पार्टी का जन्म हुआ

ByPrompt Times

Aug 23, 2024
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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में लीडर ऑफ अपोजिशन राहुल गांधी 2 दिन के जम्मू-कश्मीर के दौरे पर हैं. राहुल और खरगे आगामी विधानसभा चुनावी तैयारी की बैठक के लिए जा रहे हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर की सबसे पहली पॉलिटिकल पार्टी कौन सी थी.

 

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 2 दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे पर हैं. राहुल और खरगे आगामी विधानसभा चुनावी तैयारी की बैठक के लिए जम्मू और श्रीनगर में हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर की सबसे पहली पॉलिटिकल पार्टी कौन सी थी.

 

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी 1932 में बनी थी. उसका नाम था – ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस. बाद में इसका नाम नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया और यह आज भी कश्मीर में एक प्रमुख राजनीतिक दल बनी हुई है.

किस घटना के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की नींव पड़ी?

शेख अब्दुल्ला ने मीरवाइज यूसुफ शाह और चौधरी गुलाम अब्बास के सात मिलकर ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना की थी. पार्टी के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का जन्म 5 दिसंबर 1905 को कश्मीर के श्रीनगर के बाहरी इलाके में एक गांव में हुआ था. उनकी पहली बड़ी राजनीतिक भागीदारी जुलाई 1931 में हुई थी. दरअसल, उस समय पुलिस गोलीबारी में 21 लोगों की मौत हो गई थी. इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया था. अपनी रिहाई के तुरंत बाद, उन्होंने अक्टूबर 1932 में ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्थापना की.

 

नाम बदलने पर दो हिस्सों में टूट गई पार्टी

शेख अब्दुल्ला को जल्द ही एहसास हुआ कि कश्मीरी राजनीति को खुद को धर्मनिरपेक्ष के सिद्धांत पर स्थापित करने की जरूरत है. इस सोच के साथ उन्होंने 1939 में पार्टी का नाम ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ से बदलकर ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ कर दिया. लेकिन इस फैसले से कई नेता खुश नहीं थे. उन असंतुष्ट नेताओं ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना की. दूसरी तरफ नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कश्मीर के अल्पसंख्यक नेताओं और कांग्रेस नेतृत्व दोनों के साथ संबंध स्थापित किए. जवाहरलाल नेहरू के साथ उनकी साझा विचारधारा ने इसमें सहायक स्थापित हुई.

 

 

भारत में कश्मीर के विलय को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस की क्या राय थी?

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्तारूढ़ डोगरा राजवंश के खिलाफ बड़े पैमाने पर ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन शुरू किया था. एक समय पर कश्मीर महाराजा ने अब्दुल्ला को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. पंडित नेहरू ने इस दमन का विरोध किया था.

नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में थी. उन्होंने पाकिस्तान की ओर से भेजे आदिवासी हमलावरों के खिलाफ कश्मीर की रक्षा के लिए लोगों को संगठित किया था. पार्टी ने महाराजा से भारत में विलय स्वीकार करने का आग्रह किया.

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नेशनल कॉन्फ्रेंस का इतिहास

पंडित नेहरू की अंतरिम सरकार ने 5 मार्च 1948 को शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था. इसके बाद जब सितंबर 1951 में चुनाव हुए , तो नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा की सभी 75 सीटें जीतीं.

हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख शेख अब्दुल्ला को देश के खिलाफ साजिश करने के आधार पर अगस्त 1953 में प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया. 1965 में, नेशनल कॉन्फ्रेंस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) में विलय हो गया. यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जम्मू और कश्मीर शाखा बन गई. शेख अब्दुल्ला को राज्य के खिलाफ साजिश के आरोप में 1965 से 1968 तक फिर से गिरफ्तार कर लिया गया.

केंद्र सरकार के साथ एक समझौते के बाद फरवरी 1975 में अब्दुल्ला को सत्ता में लौटने की अनुमति मिल गई गई और 1977 में वो फिर से भारी बहुमत से राज्य विधानसभा चुनाव जीत गए. शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने. 8 सितंबर 1982 को उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने. जून 1983 के चुनावों में, फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) ने फिर से बहुमत हासिल किया.

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव आखिरी बार दस साल पहले 2014 में हुए थे. तब कांग्रेस ने JKNC के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया. JKNC ने सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल 15 सीटें जीतीं, यानी बहुमत से 13 सीट कम. PDP ने 28 सीटें जीतीं और विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इस चुनाव में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था. इसके बाद पीडीपी-भाजपा ने गठबंधन कर प्रदेश सरकार बनाई थी.

 

 

SOURCE –  TV9 BHARATVARSH

 

 


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