• June 6, 2026 1:20 pm

मुगलों को मुंह तोड़ जवाब देने वाली वीरांगना दुर्गावती की कहानी, जिनके स्मारक की नींव रखेंगे PM मोदी

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अक्टूबर 5 2023 ! वह बहादुर थीं. स्वाभिमान से भरी हुई थीं. प्रजा प्रिय थीं. लोक कल्याण उनके खून में था. शानदार लीडर थीं. प्रजा का प्यार उनके हिस्से खूब आता था. मुगलों को एक नहीं, अनेक बार धूल चटाया. पर, अपनों की धोखेबाजी से युद्ध के मैदान में घिर गईं. कई तीर लगे. उन्हें लगा कि जान नहीं बचेगी. दुश्मन गिरफ्तार कर सकता है या उन्हें छू सकता है तो अपनी ही कटार से सर्वोच्च बलिदान देने से भी नहीं चूकीं.

भारतीय इतिहास उन्हें वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जानता है. आज यानी 5 अक्टूबर को उनकी बर्थ एनिवर्सिरी के मौके पीएम मोदी वीरांगना की धरती कही जाने वाले मध्य प्रदेश के जबलपुर पहुंचेंगे. रानी दुर्गावती की याद में बनने वाले स्मारक का भूमि पूजन करेंगे.

रानी दुर्गावती अपने दौर में भले ही महारानी थीं लेकिन उनका गोंड वंश इस समय अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आता है. मध्य प्रदेश की राजनीति में एसटी मतदाताओं का प्रभाव 80-85 सीटों पर है. यहां जीत उसी की होती है, जिसकी ओर यह वर्ग घूम जाता है. हार भी उसी की होती है, जिससे यह वर्ग खफा हो जाता है. निश्चित ही यह तबका गरीबी से जूझ रहा है. अब तक के सारे उपाय फेल रहे हैं लेकिन रानी दुर्गावती का महत्व अपनी जगह पर कायम है, भारतीय राजनीति में भी और अपने समाज में भी, दोनों ही ओर से उन्हें भरपूर सम्मान देने की परंपरा है, जिसका निर्वहन सब कर रहे हैं.

इस मान-सम्मान के पीछे जो कहानी है, इतिहासकारों ने जो लिखा है, उसमें महत्वपूर्ण है उनकी निष्ठा, बहादुरी, स्वाभिमान, किसी के सामने न झुकने की अदा. वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कलिंजर किले में राजा कीर्ति सिंह चंदेल के यहां उनका जन्म दुर्गा अष्टमी के दिन हुआ. इसलिए उनका नाम भी दुर्गावती रखा गया.

वे अपने माता-पिता की एकलौती संतान थीं. बढ़ती उम्र के साथ ही उनकी चपलता, होशियारी, कुशाग्र बुद्धि का परिचय होने लगा था. कालांतर में उनका विवाह गोंडवाना राज्य के राजकुमार दलपत शाह से हुआ. महज चार साल बाद ही पति के असामयिक निधन के बाद उन्होंने राज्य की सत्ता संभाल ली. उस समय मुस्लिम आक्रांता जगह-जगह कब्जे की होड़ में थे. उन्होंने गोंडवाना राज्य पर भी कब्जे की कोशिश यह मानकर कि पति की असमय मौत से व्यथित एक युवा नारी भला क्या ही लड़ेगी? पर हुआ एकदम उल्टा.

मालवा के मुस्लिम शासक बाज बहादुर की नजर रानी और उनके राज्य दोनों पर थी लेकिन वह बाल भी बांका न कर सका. हर बार मुंह की खानी पड़ी. इस तरह कुल तीन बड़े हमलों को उसी रानी दुर्गावती ने नाकाम कर दिया, जिसे बाज बहादुर कमसिन, कमजोर, व्यथित समझता था. इन युद्धों में विजय के बाद रानी को अपार संपदा भी मिली और राज्य का विस्तार भी हुआ.

कहते हैं कि उनका शासन 80 हजार गांवों तक फैला हुआ था. आज का जबलपुर रानी दुर्गावती का केंद्र था. यहीं से बैठकर वे शासन करती थीं. बहादुर इतनी कि शेर के शिकार पर निकलतीं तो पानी तब तक नहीं पीतीं, जब तक शेर को मार न लें. कुछ ही दिन में युद्ध उनका शगल बन गया और शस्त्रों से दोस्ती हुनर. मुस्लिम शासकों को हराने के बाद वे दोबारा तो नहीं लौटे लेकिन इस बीच अकबर का ध्यान इस राज्य और रानी पर चला गया.

मुगल बादशाह अकबर ने सबसे पहले एक प्रस्ताव भेजकर रानी दुर्गावती के प्रिय हाथी सरमन और उनके प्रिय मंत्री आधार सिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा, जिसे रानी ने स्पष्ट इनकार कर दिया. फिर अकबर ने आसफ खां के नेतृत्व में गोंडवाना पर हमला कर दिया. पहली बार आसफ को मुंह की खानी पड़ी. फिर दोबारा उसने दूनी तैयारी के साथ हमला बोल दिया. रानी फिर लड़ीं और तीन हजार से ज्यादा मुगल सैनिक मारे गए. यह तारीख थी 23 जून 1964.

इस बीच रानी की सेना को भी क्षति हुई और वह भी कमजोर हुई. 23 जून की रात रानी के एक सामंत बदन सिंह के साथ मिलकर आसफ खान ने साजिश रची. उसकी दगाबाजी से आसफ खान को रानी के प्लान की जानकारी मिली और तोड़ भी. उसी योजना पर काम करते हुए आसफ ने पहाड़ी सरोवर को तोड़कर नरई नाले में पानी भर दिया, जो 23 जून को सूखा था. 24 जून को सुबह नाले के इस पर रानी की सेना और उस पार मुगल सेना. रानी का इरादा जंगल में घेरकर मुगल सेना को निपटाना था, पर नाले में अचानक पानी आने से बाढ़ जैसी स्थिति बन गई और वे ऐसा न कर सकीं.

उनका हमला भी कमजोर पड़ने लगा. उधर तोपखाना से वार शुरू हो गया. रानी को पहले बांह में, फिर आंख में और गले में तीर चुभे. उन्होंने अपने करीबी आधार सिंह को अपनी गर्द उड़ाने का आदेश दिया, जिसके लिए वह तैयार नहीं हुआ. रानी ने खुद कटार उठाई और युद्ध के मैदान में ही अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया. वे किसी भी सूरत में दुश्मन सेना के हाथ नहीं लगना चाहती थीं. ऐसे में उन्होंने बलिदान देना उचित समझा. ऐसी महान वीरांगना को देश भला क्यों न याद करे, जिसने देश भक्ति में अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

उनके नाम पर खुले विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल, अस्पताल. उनके महत्व को रेखांकित करता है वज आम जनमानस जो आज भी पुण्य तिथि और जन्म जयंती धूमधाम से न केवल मनाता है. सरकारें भी इन आयोजनों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी करती हैं. भारत सरकार ने उनके बलिदान दिवस पर साल 1988 में डाक टिकट जारी किया तो मध्य प्रदेश में सरकार किसी भी दल की बनी रहे, रानी दुर्गावती को सबने सम्मान दिया है.

सोर्स :- ” TV9 भारतवर्ष    


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