04 जून 2022 | नए भारत के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है। शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व के बिना हम कभी भी दुनिया से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के आठ वर्ष पूरे कर लिए हैं। पूछा जाना चाहिए कि इन सालों में केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में क्या काम किया है? इस सवाल का जवाब तभी दिया जा सकेगा, जब हम पहले यह जानें कि मोदी को विरासत में कैसी शिक्षा प्रणाली मिली थी और शिक्षा में कोई भी गम्भीर सुधार लाने की राह में कड़ी चुनौतियां कौन-सी हैं।
सबसे पहली बात तो यह कि क्या इसमें कोई संदेह है कि पूरे देश के वामपंथी-झुकाव रखने वाले कॉलेज कैम्पसों में एक मोदी-विरोधी युवा आंदोलन छेड़ा गया था? जेएनयू इसमें अग्रणी था। मैं उस संघर्ष का साक्षी रहा था, और मैं जेएनयू में इकलौती ऐसी आवाज था, जो उस समय दूसरे पक्ष को सामने रख रहा था। लेकिन बात केवल जेएनयू तक ही सीमित नहीं थी।
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बीएचयू, जादवपुर यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया, एएमयू आदि अनेक कैम्पसों में अगर देश-विरोधी नहीं तो भाजपा-विरोधी और सरकार-विरोधी आंदोलन तो निश्चय ही छेड़े गए थे। इन सभी के सूत्रधार वाम और इस्लामिस्ट विचारधाराओं से प्रेरित थे। उन्हें विपक्षी पार्टियों का समर्थन प्राप्त था। यह देश का सौभाग्य था कि वे तमाम आंदोलन नाकाम साबित हुए और उनके कर्णधारों में से कोई जेल में है, किसी ने पार्टी बदल ली है और कोई राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं।
इस उग्र और नकारात्मक छात्र-राजनीति के अलावा जाति-आधारित कोटा-प्रणाली ने भी शिक्षा प्रणाली को बंधक बना रखा है। आज देश के हर सार्वजनिक कॉलेज या यूनिवर्सिटी में तकरीबन हर सीट किसी जाति या पिछड़े वर्ग या अन्य के लिए आरक्षित हो चुकी है। ऐसा लगता है कि आज शिक्षा या किसी सरकारी क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए सबसे बड़ी पात्रता किसी वंचित वर्ग से होना है।
इसका यह मतलब है कि पिछले दशक में लाखों युवाओं ने अरबों डॉलर खर्च करके देश से बाहर नौकरी या वैसी शिक्षा पाने का प्रयास किया है, जिसके लिए वे अपने देश में भी भुगतान करने को तैयार थे, लेकिन वह उन्हें उपलब्ध नहीं थी। भारत को दुनिया का एजुकेशन-हब बनाना तो दूर, आज तो हम अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को देश से बाहर धकेल दे रहे हैं, जैसा कि यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने गए 60 हजार छात्रों की संख्या से प्रमाणित होता है।
जटिल और अंतहीन कोटा, अल्पसंख्यक संस्थान, राजनेताओं व भू-माफियाओं द्वारा संचालित कॉलेज, अनियमित निजी संस्थान- इन सबने भारत में उच्चशिक्षा का नाश कर दिया है। इसके मूल में है राजनीतिक हस्तक्षेप, वोट-बैंक राजनीति, विशेष हितों का तुष्टीकरण, पक्षपात और जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, नस्ल के नाम पर सौदेबाजियां। यही कारण है कि आज हमारे अधिकतर ग्रेजुएट्स अगर नाकारा नहीं तो बेरोजगार जरूर हैं। प्राथमिक शिक्षा में तो और अराजकता है।
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरकारी स्कूलों की दशा शोचनीय है। इस कारण निजी और शोषक स्कूल संचालक इंग्लिश-मीडियम के नाम पर बाजार पर छा गए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति जरूर अधिसूचित की गई है, जो एक बेहतर दस्तावेज है। लेकिन आज उसका जितना प्रचार किया जा रहा है, वह यही बताता है कि हम अभी तक टॉप-डाउन एप्रोच से मुक्त नहीं हो सके हैं। ऊपर से एक नीति घोषित की जाती है, जिसे देश में एक भीमकाय नौकरशाही-तंत्र के द्वारा लागू किया जाता है।
नेशनवाइड कॉमन एंट्रेंस एग्जाम से निश्चित ही केंद्रीय संस्थानों में एडमिशन के लिए हेरफेर कम होगी, लेकिन सब कुछ केंद्रीकृत और ऊपर से निर्देशित होने से स्वायत्तता और रचनात्मकता भी घटेगी। हमें नई नीति से ज्यादा हर संस्थान में बेहतर प्रशासन की जरूरत है। शिक्षा प्रणाली में जमीनी स्तर पर सुधार जरूरी हैं। अगर हम गुणवत्ता को प्रोत्साहित करेंगे और प्रतिभाहीनता को हतोत्साहित करेंगे तो शेष अपने आप ठीक होता चला जाएगा। अनिर्णय में अनेक दशक बिता देने के बावजूद अब भी देरी नहीं हुई है।
हम आलोचनात्मक चिंतन, श्रेष्ठता, दक्षता और रचनात्मकता को प्रेरित करने के लिए पर्याप्त कोशिशें नहीं कर रहे हैं। इसके बजाय हम कोटा-प्रणाली, राजनीतिक कनेक्शंस और वरदहस्त को बढ़ावा दे रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source;- ‘’दैनिक भास्कर’’
