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क्या है UP सरकार का कांवड़ कॉरिडोर जिसके लिए काटे जाएंगे 1 लाख पेड़?

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31जनवरी 2024
भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने 1 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने की मंजूरी दे दी है. किस बात के लिए? मामला है उत्तर प्रदेश सरकार की महत्त्वकांक्षी कांवड़ कॉरिडोर का. 111 किलोमीटर के इसभारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने 1 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने की मंजूरी दे दी है. किस बात के लिए? मामला है उत्तर प्रदेश सरकार की महत्त्वकांक्षी कांवड़ कॉरिडोर का. 111 किलोमीटर के इस गलियारे को लेकर योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत पहले से तमाम तरह के अप्रूवल लेने में जुटी थी. अब जब भारत सरकार से पेड़ों को काटने की इजाजत मिल गई है तो उम्मीद की जा रही है कि गलियारे का काम फरवरी महीने में शुरू हो जाएगा.

जिन पेड़ों की कटाई होनी है, उनमें 25 हजार के करीब पौधे गाजियाबाद, 67 हजार के लगभग मेरठ और 17 हजार के तकरीबन मुजफ्फरनगर में फैले हैं. कुछ मीडिया रपटों में काटे और उखाड़े जाने वाले पेड़ों की संख्या 1 लाख 10 हजार से भी अधिक बताई गई है. उत्तर प्रदेश के पीडब्ल्यू डिपार्टमेंट को हालांकि इन पेड़ों को उखाड़ने या काटने से पहले करीब 50-50 लाख रूपये मेरठ, मुजफ्फरनगर और गाजियाबाद के फॉरेस्ट डिविजन में जमा करना होगा. यह पैसा काटे गए पेड़ों की जगह जरूरी पौधा रोपड़ की मकसद से जमा किए जाएंगे.

केंद्र सरकार ने तब जाकर दी मंजूरी

दरअसल पर्यावरण को लेकर जो कानून हैं, उसके मुताबिक अगर किसी परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई की जाती है तो संबंधित विभाग या एजेंसी को कहीं और पेड़ लगाने के लिए जमीन की व्यवस्था करनी पड़ती है. उत्तर प्रदेश सरकार का पीडब्ल्यूडी यानी लोक निर्माण विभाग इस पूरी परियोजना को धरातल पर उतारने में जुटा है. पिछले साल जब पीडब्लूडी विभाग ने ललितपुर जिले में तकरीबन 222 हेक्टेयर से अधिक जमीन की पहचान कर ली जहां काटे गए पेड़ों के वास्ते जरूरी पौधा रोपण होना है, तब जाकर परियोजना को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से रफ्ता-रफ्ता मंजूरी मिलनी शुरू हुई.

क्या बदल जाएगा, सरकार का दावा

यह गलियारा मुजफ्फरनगर के पुरकाजी को गाजियाबाद के मुरादनगर से जोड़ेगा. दो लेन वाला यह कांवड़ कॉरिडोर मेरठ के सरधना और जानी के इलाकों से होकर गुजरेगा. पूरा रास्ता ऊपरी गंगा नहर को लग कर जाएगा. सवाल है कि इस गलियारे से फर्क क्या पड़ जाएगा? दरअसल अभी सूरत-ए-हाल ये है कि जो कांवड़ यात्री हैं, वे दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस और मेरठ के पुराने हाइवे का इस्तेमाल करते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की ये चाह है कि वह इस कॉरिडोर के जरिये एक वैकल्पिक रास्ता कांवड़ यात्रियों को मुहैया कराए ताकि इससे रूट का बोझ कुछ कम हो. सरकार का कहना है कि इससे न सिर्फ कांवड़ यात्रा सुगम हो जाएगी बल्कि जो पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान हैं, उन्हें भी मंडी औऱ मिलों तक पहुंचने का एक और रास्ता मिल जाएगा.

काम शुरू होने में हुई देरी?

2018 की इस परियोजना को करीब दो बरस लग गए तब जाकर प्रदेश सरकार की ओर से इसके लिए 2020 में 628 करोड़ रूपये के फंड की मंजूरी मिली. बावजूद इसके यह प्रोजक्ट पर्यावरण और वन मंत्रालय की मंजूरी न मिल पाने के कारण लटकी रही. सरकार की दलील यह रही कि उन्हें पौधा रोपड़ के लिए जमीन जल्दी से नहीं मिल सकी, इस वजह से प्रोजेक्ट में देरी हुई. क्योंकि इस परियोजना की घोषणा को कुल मिलाकर 6 बरस अब होने को है मगर काम अब तक कुछ ठोस काम शुरू नहीं हो सका है. महज फाइलें आगे-पीछे हो रही हैं. 2023 के जून महीने में सरकार के एक अधिकारी का बयान है, जहां उन्होंने उम्मीद जताई थी कि 2024 में इस परियोजना को पूरा कर लिया जाएगा. मगर हकीकत ये है कि 2024 में भी अभी काम शुरू होने ही की बात हो रही. अब कहा जा रहा है कि यह परियोजना 18 महीने में पूरी कर ली जाएगी.

कांवड़ यात्रा: एक नजर

हर साल श्रावण यानी सावन महीने में कांवड़ यात्रा निकलती है. मीडिया रपटों की मानें तो 2019 में तकरीबन साढ़े 3 करोड़ कांवड़ियों ने हरिद्वार की यात्रा की थी जबकि 2 से 3 करोड़ ऐसे श्रद्धालु थे जिन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में मौजूद अलग-अलग तीर्थस्थलों की यात्रा कांवड़ लेकर की थी. इस यात्रा के दौरान शिव भक्तों की पहली इच्छा होती है कि वे कांवड़ लेकर बाबा औघड़नाथ मंदिर, पुरा महादेव मंदिर, दुधेश्वर नाथ मंदिर, लोधेश्वर महादेव मंदिर, काशीरेश्वर महादेव मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर और बैद्यनाथ धाम मंदिर जैसी प्राचीन मंदिरों में जल चढ़ाएं और माथा टेके. अगर किसी कारण वह यहां नहीं जा पाते तो नजदीकी शिव मंदिर में गंगा जल चढ़ाने और दर्शन करने को चुनते हैं. पश्चिम कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मेरठ, गाजियाबाद और मुजफ्फरनगर के रास्ते कांवड़ यात्रा पर जाने वालों को इस कॉरिडोर का लाभ होगा.

स्रोत :- ” TV9 भारतवर्ष ”   


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