• June 6, 2026 12:21 am

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत का भारत के साथ रिश्तों पर क्या होगा असर?

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ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी (63) और विदेश मंत्री होसैन अमीराब्दुल्लाहियन का हेलिकॉप्टर क्रैश में निधन हो गया. यह दुर्घटना अजरबैजान से लौटते वक्त हुई. 19 मई की शाम के करीब 7 बजे रईसी का हेलिकॉप्टर लापता हो गया था. इस हादसे में हेलिकॉप्टर पर सवार सभी 9 लोगों की मौत हो गई.

यह दुर्घटना ऐसे समय में हुई है जब ईरान का इजरायल के साथ रिश्ते काफी बिगड़ गए हैं. इतना ही नहीं, ईरान का अमेरिका से भी तनाव चल रहा है. ऐसे में रईसी की मौत इराक, इजरायल, भारत और वैश्विक स्तर के राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है.

इस रिपोर्ट में जानते हैं कि ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत का भारत के साथ उनके रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?

सबसे पहले जानते हैं कहां हुआ ये हादसा 

राष्ट्रपति रईसी अजरबैजान में किज कलासी और खोदाफरिन बांध का उद्घाटन करने पहुंचे थे. इस उद्घाटन कार्यक्रम के संपन्न होने के बाद वह तबरेज शहर जा रहे थे. तबरेज और अजरबैजान के बीच ही रास्ते में उनका हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया. डिसबैलेंस होने के बाद जिस जगह पर उनके हेलीकॉप्टर ने हार्ड लैंडिंग की, वह तबरेज शहर से 50 किलोमीटर दूर वर्जेकान शहर के पास है.

इस दुर्घटना पर भारत की प्रतिक्रिया 

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर रईसी के मौत पर दुख व्यक्त करते हुए लिखा, ”राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत की खबर से स्तब्ध और उदास हूं. भारत-ईरान, इन दोनों देश के रिश्तों को मजबूत करने के लिए उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा. ईरान के लोगों और रईसी के परिवार से शोक प्रकट करता हूं. इस दुख की घड़ी में भारत ईरान के साथ खड़ा है.”

रईसी के निधन का भारत के संबंधों पर असर 

ईरान के राष्ट्रपति की मौत भारत के लिए गहरे झटके से कम नहीं है. दरअसल ईरान और भारत के बीच व्यापारिक रिश्ते तो हैं ही साथ ही दोनों देश एक दूसरे का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार भी है. ईरानी राष्ट्रपति इसी साल भारत भी आने वाले थे, लेकिन अचानक हुई इस दुर्घटना में उनका दुखद निधन हो गया.

रईसी का रुख का भारत को लेकर काफी सकारात्मक था और नरेंद्र मोदी  के साथ भी उनके अच्छे संबंध थे. यही कारण है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने ईरान के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारी को जारी रखा था.

कुछ समय पहले भारत ने ईरान के साथ मिलकर चाबहार पोर्ट पर बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत कम से कम अगले 10 सालों तक चाबहार पोर्ट भारत ही संचालित करेगा. इस डील को भी अंजाम तक पहुंचाने के लिए इब्राहिम रईसी ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

भारत को चाबहार पोर्ट का मिलना रणनीतिक रूप से काफी जरूरी था. यह न सिर्फ यूरेशिया और पूर्वी यूरोप में जाने का रास्ता था, बल्कि इसके जरिये भारत मिडिल-ईस्ट और यूरोप के रास्ते भी तलाश रहा है. ऐसे में चाबहार समझौता भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है और उम्मीद है कि इस परिस्थिति में भारत ईरान का साथ नहीं छोड़ेगा.

वैश्विक राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है

ईरान के राष्ट्रपति के अचानक मौत के बाद ईरान की राजनीतिक अस्थिरता तेल बाजारों में अस्थिरता का कारण बन सकती है. क्योंकि निवेशक ईरान के तेल उत्पादन और निर्यात पर संभावित प्रभाव का आंकलन करते हुए कारोबार में सतर्कता बरत सकते हैं. रईसी के हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद शुरुआती एशियाई कारोबार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है.

ईरान के तेल उत्पादन में कोई भी व्यवधान वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकता है. क्योंकि ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक देश है. विशेषज्ञों के अनुसार अस्थिरता के बाद भी तेल बाजार में काफी हद तक एक दायरे के भीतर कारोबार होता दिखा.

सोने की कीमतों पर भी पड़ सकता है असर

भूराजनातिक अस्थिरता अक्सर सोने जैसी सुरक्षित धातुओं की कीमतों पर भी असर डालती है. ऐसी परिस्थितियों में लोग इसमें निवेश करने को सुरक्षित मानते हुए खरीदारी करने लगते हैं. इससे कीमतों में उछाल आती है. रईसी के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद सोने की कीमतों में मजबूती आई है और यह अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है.

रईसी की मौत की खबर वैश्विक स्तर पर शेयर बाजारों को भी प्रभावित कर सकती है. निवेशक क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक नीतियों पर संभावित प्रभाव को देखते हुए कारोबार करते हैं. इससे बाजारों में उतार चढ़ाव दिख सकता है.

रईसी के निधन को किस तरह देखा जा रहा है?

रईसी ने इस्लामिक क्रांति के बाद से ही न्यायपालिका में काम करना शुरू कर दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने कई शहरों में वकील के तौर पर काम किया था. ऐसे में रईसी के निधन पर उनके विरोधी एक ऐसे शख़्स के चले जाने की खुशी मनाएंगे जो साल 1980 के दशक में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बंदियों को सामूहिक फांसी देने का अभियुक्त था.

बीबीसी की एक रिपोर्ट में तेहरान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मोहम्मद मरांदी कहते हैं ” पश्चिम देश पिछले 40 से अधिक सालों से ईरान के बिखर जाने का नैरेटिव देते आए हैं. लेकिन यह देश आज भी यहीं है और मेरा अनुमान है कि आने वाले कई सालों तक ये यहीं रहेगा.”

प्रोफेसर मोहम्मद मरांदी ने कहा कि एक और ऐसा पद है जिसे भरा जाना चाहिये और वो पद है ‘असेम्बली ऑफ़ एक्सपर्ट’ में मौलवी का. ये वो संस्था है जो सर्वोच्च नेता को चुनती है.

फिलहाल ईरान में सर्वोच्च नेता के चुनाव को लेकर कई अटकलें लगाई जाती रही हैं. कई नेता का नाम इस रेस में शामिल है, इनमें एक नाम सर्वोच्च नेता के बेटे मोज्तबा ख़ामेनेई का है.

कितनी बड़ी चुनौती है राष्ट्रपति चुनाव 

ईरान में राष्ट्रपति की हत्या के बाद मौजूदा राजनीतिक चुनौती यहां राष्ट्रपति का चुनाव कराना है. वर्तमान में उपराष्ट्रपति मोहम्मद मोख़बर को इस पद की ज़िम्मेदारी दी गई है. लेकिन आने वाले 50 दिन के भीतर यहां राष्ट्रपति चुनाव कराना ही होगा.

इस पद के लिए मतदान की अपील ऐसे वक्त में की जाएगी, जब मार्च महीने में हुए संसदीय चुनाव में रिकॉर्ड स्तर पर कम मतदान हुआ था.

इससे पहले इस देश में साल 2021 में राष्ट्रपति चुनाव हुए थे, इस चुनाव में जीत हासिल कर ने रईसी राष्ट्रपति का पद संभाला था, उस चुनाव में कई ऐसे उदारवादी और सुधार-समर्थक लोग थे जिन्होंने चुनावों का बहिष्कार किया था.

बीबीसी की एक रिपोर्ट में लंदन स्थित न्यूज़ वेबसाइट अमवाज डॉट मीडिया के संपादक मोहम्मद अली शाबानी कहते हैं, ”ये राष्ट्रपति चुनाव, ख़ामेनेई और सत्ता में बैठे शीर्ष लोगों को अपनी प्रवृत्ति बदलने का और मतदाताओं को राजनीतिक प्रक्रिया में फिर से शामिल करने का मौका दे सकता है. लेकिन, दुर्भाग्य की बात ये है कि हमें सत्ता की तरफ से ऐसे कदम उठाने के लिए तैयार होने का या इच्छुक होने का कोई संकेत नहीं मिला है.”

 

 

 

 

 

 

source abp news


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