• June 7, 2026 7:07 pm

देश और धर्म में से किसी एक को चुनने की बहस क्यों छिड़ी?

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25 जुलाई 2023 ! असदुद्दीन ओवैसी ने उस रिपोर्ट के स्क्रीनशॉट के साथ लिखा, “दशकों बाद पहली बार इंटेलिजेंस ब्यूरो के शीर्ष नेतृत्व में कोई भी मुस्लिम ऑफिसर नहीं होगा. ये उस संदेह की झलक है, जिससे बीजेपी मुसलमानों को देखती है. आईबी और रॉ विशिष्ट बहुसंख्यकवादी संस्थान बन गए हैं. आप लगातार मुसलमानों से उनकी वफ़ादारी का सबूत मांगते हैं लेकिन कभी उन्हें अपने बराबर नागरिक के तौर पर स्वीकार नहीं करते.”

इसी ट्वीट पर कवि और आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता कुमार विश्वास ने ओवैसी से पूछा कि अगर उन्हें इस्लाम और भारत में से किसी एक को चुनना होगा तो किसे चुनेंगे? क़ुरान शरीफ़ और संविधान में से किसी एक को चुनना होगा तो किसे चुनेंगे?

कुमार विश्वास की इस टिप्पणी को लेकर अब सोशल मीडिया पर लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

ओवैसी ने अपने जवाब में कहा, “भारत की जासूसी और इंटेलिजेंस एजेंसियों में मुस्लिम अफ़सरों की कमी वाले मेरे ट्वीट पर लोगों ने बहुत सारे सवाल उठाए. मुसलमानों से पूछा जाता है कि मज़हब और मुल्क के बीच में किसे चुना जाएगा. पता नहीं कितने लोग देश की सुरक्षा का सौदा करते हुए पकड़े जाते हैं, आईएसआई (पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी) महिलाओं के फ़र्ज़ी अकाउंट बना कर इन्हें फंसा लेती है. धर्म की बात तो दूर, क्या कोई इन्हें पूछेगा कि ये अपने हवस और देश के बीच किसे चुनते हैं?”

कुछ लोगों ने कुमार विश्वास के सवालों पर ही प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

व्यंग्यकार राजीव ध्यानी लिखते हैं, “यह एक चुनना ही तमाम समस्याओं की जड़ है कुमार भाई. मैं मनुष्य हूं, पुरुष हूं, भारतीय हूं, हिन्दी भाषी हूं, हिन्दू हूं. और भी बहुत सी पहचानें हैं मेरी. मुझे इसमें से किसी भी पहचान को बताने या उनसे प्रेम करने के लिए दूसरी पहचान को छोड़ने या पीछे रखने की कोई ज़रूरत नहीं.”

राजीव ध्यानी ने पूछा है कि उनकी (कुमार विश्वास) कई पहचाने हैं. क्या उन्हें भी रामकथा वाचक की अपनी पहचान बताने के लिए कवि और अध्यापक की पहचानों को छोड़ना होगा? तो फिर असदुद्दीन ओवैसी को भारतीय होने के लिए मुसलमान होने की पहचान छोड़ने की ज़रूरत क्यों है.

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने था, “कुछ धर्म भारत के बाहर के थे और हमारे उनके साथ युद्ध हुए थे, लेकिन बाहर वाले तो चले गए, अब तो सब भीतर हैं. फिर भी वे लोग बाहरी लोगों के प्रभाव में हैं. हमें समझना होगा कि वे हमारे लोग हैं. अगर उनकी सोच में कोई कमी है तो उसमें सुधार हमारी ज़िम्मेदारी है.”

सावरकर भी पितृभूमि और पुण्यभूमि की बात करते थे. यानी जो भारत में जन्मे हैं उनकी पितृभूमि तो भारत है लेकिन जो हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख नहीं हैं उनकी पुण्यभूमि भारत नहीं है. सावरकर मानते थे कि ऐसे में उनका प्यार पितृभूमि और पुण्यभूमि के बीच बँटा होगा.

सावरकर ने ‘हिन्दुत्व: हू इज अ हिन्दू’ में लिखा है, ”हमारे मुसलमानों या ईसाइयों के कुछ मामलों में, जिन्हें जबरन ग़ैर-हिन्दू धर्म में धर्मांतरित किया गया, उनकी पितृभूमि भी यही है और संस्कृति का बड़ा हिस्सा भी एक जैसा ही है लेकिन फिर भी उन्हें हिन्दू नहीं माना जा सकता. हालाँकि हिन्दुओं की तरह हिन्दुस्थान उनकी भी पितृभूमि है, लेकिन पुण्यभूमि नहीं है. उनकी पुण्यभूमि सुदूर अरब है. उनकी मान्यताएं, उनके धर्मगुरु, विचार और नायक इस मिट्टी की उपज नहीं हैं. ऐसे में उनके नाम और दृष्टिकोण मूल रूप से विदेशी हैं. उनका प्यार बँटा हुआ है.”

  सोर्स :-“BBC  न्यूज़ हिंदी”                                  


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