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बैतूल के 2 इंजीनियर मधुमक्खियों से बने करोड़पति; कई फ्लेवर के शहद का उत्पादन कर रहे

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23 सितम्बर 2022 | बैतूल के दो युवा इंजीनियर शहद बेचकर लाखों रुपए कमा रहे हैं। कुछ समय नौकरी की, लेकिन मन नहीं लगा। दोनों ने साथ में खेती करने का सोचा। ट्रेडिशनल फार्मिंग में मुनाफा कम था। एक मित्र ने मधुमक्खी पालन की सलाह दी। दोनों ने मधुमक्खी पालन की बारीकियों को समझा। फिर एक लाख रुपए से कंपनी शुरू की। तीन साल में मध्यप्रदेश सहित 4 राज्यों में कारोबार फैला लिया है। अब लोगों तक शहद ऑनलाइन पहुंचा रहे हैं। कंपनी का सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपए है।

आकाश वर्मा और आकाश मगरुरकर बचपन में साथ खेले और स्कूल में साथ पढ़े। दोनों ने साथ में इंजीनियरिंग की। आकाश वर्मा ने 2012 में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भोपाल से बीई की पढ़ाई की। 2013 में एक एलईडी कंपनी जॉइन की। 2016 में दूसरी नौकरी बदली। फिर 2018 में नौकरी छोड़कर घर लौट आए।

आकाश मगरुरकर ने बताया कि 5 साल तक निजी कंपनियों में बतौर मैनेजर नौकरी की। इसमें मन नहीं लगा। खुद की कंपनी शुरू करने का फैसला किया। इसी दौरान ऑटोमोबाइल की दो कंपनियों में जॉब मिलने के बाद भी जॉइन नहीं किया।

दोनों दोस्तों ने नौकरी छोड़ने के बाद मधुमक्खी पालन करने का निर्णय लिया। इसके लिए पुणे के खादी और विलेज इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया। शुरूआत में खुला शहद बेचना शुरू किया।

ई-कॉमर्स कंपनी से घर-घर पहुंचा रहे शहद
एक साल तक खुला शहद बेचने के बाद दोनों दोस्तों ने 2019 में अपनी कंपनी रजिस्टर्ड की। खुद की पैकेजिंग के साथ शहद बेचना शुरू किया। मध्यप्रदेश के साथ ही राजस्थान, हिमाचल और पंजाब में भी मधुमक्खियों के डिब्बे रखे। डिब्बों में शहद भरने के बाद इसे निकालकर पैकेजिंग की जाती है। शहद को आसपास के जिलों समेत ई-कॉमर्स साइट्स से जरिए बेचते हैं। दोनों युवा किसान मधुमक्खियों को ब्रीडिंग भी करवाते हैं। ब्रीडिंग से ही सालाना 3 लाख रुपए की कमाई हो जाती है। वहीं, सालभर में 5 टन से ज्यादा शहद का उत्पादन कर रहे हैं।

राजस्थान, हिमाचल, पंजाब में भी शुरू की कंपनी
दोनों दोस्तों ने मधुमक्खियों के डिब्बों को फ्लोरा वाले इलाकों में भेजने की तैयारी की। पंजाब के लुधियाना, राजस्थान के झालावाड़, सीकर और हिमाचल के कई जिलों में यह डिब्बे भेजे गए। जहां फूलों की फसल होती है। एक-एक साइट पर 150-150 डिब्बे रखे गए। यह योजना काम कर गई और मधुमक्खियों को मिलने वाले फ्लोरा ने शहद उत्पादन को नई उड़ान दे दी। अब दोनों दोस्त मौसम के हिसाब से शहद उत्पादन कर रहे हैं। अब उन्हें राजस्थान से बेरी, बाजरा, सरसों की फसल के दौरान शहद मिल जाता है। पंजाब में अजवाइन, नीलगिरी और सूरजमुखी की फसल के दौरान शहद मिल जाता है, जबकि मल्टी फ्लोरा का शहद हिमाचल से आ जाता है।

सेल्स बढ़ने पर खुद की मशीनें लगाई
एक लाख रुपए से शुरू हुई कंपनी का टर्नओवर आज 30 लाख रुपए तक पहुंच गया है। शहद का उत्पादन और बिक्री बढ़ने से कंपनी में काम आने वाला स्टॉक, रॉ मटेरियल, पैकेजिंग, सिलर, मिक्सर, ग्राइंडर, प्रिंटिंग जैसी मशीनें इन्स्टॉल की गई हैं।

शुरुआत में मधुमक्खियों के वैक्स को खा गए थे कीड़े​​​​​​
दोनों दोस्तों ने शहद के उत्पादन की योजना बनाकर इसे बतौर बिजनेस शुरू करने की प्लानिंग की तो समझ आया कि यह बैतूल जिले में संभव नहीं है। यहां उत्पादन में जोखिम था। 2019 में उन्होंने बैतूल में मधुमक्खियों के 15 डिब्बे रखे, लेकिन यहां उम्मीद पर पानी फिर गया। कम फ्लोरा के कारण मधुमक्खियां यहां बच नहीं पाईं। यहां कीड़े लगने से सारे डिब्बे खत्म हो गए। फ्लोरा की कमी दूर करने के लिए सरसों की खेती की, लेकिन मधुमक्खियों के वैक्स को कीड़ों ने खा लिया, कई छत्ते नष्ट हो गए। कोरोना वायरस की दोनों लहरों के दौरान उनका व्यवसाय प्रभावित हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

शहद के बाद अचार बनाना शुरू किया
जून 2020 में दोनों दोस्तों ने कच्चे आम का अचार बनाना शुरू किया है। अब वे साल भर में सात से आठ टन अचार बेच देते हैं। गर्मी के मौसम में कच्चे आम लेकर बड़ी-बड़ी टंकियों में सुरक्षित कर रख दिया जाता है। जिसे ऑर्डर के हिसाब से तैयार कर मार्केट में भेज देते हैं। इसके लिए स्थानीय और बाहरी स्तर के लिए सेल्समैन रखे गए हैं। दोनों ने बताया कि अब महिलाओं को रोजगार देने के लिए वे घरेलू उत्पाद (पापड़, बड़ी) बनाकर बेचेंगे। इसके लिए महिलाओं को रोजगार देंगे।

गुना शहर से 10 किलोमीटर दूर गढ़ा गांव। जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके सुमेर सिंह का परिवार पारंपरिक खेती करता है, लेकिन उनके बेटे धनंजय सिंह ने कुछ अलग करने की सोची। धनंजय ने परंपरागत खेती के जोखिम से अलग हटकर 18 बीघा जमीन पर अमरूद का बगीचा लगाया। इस बगीचे की लागत करीब 7 लाख रुपए आई। अब उनको अमरूद से प्रतिवर्ष 18 से 20 लाख रुपए की आमदनी हो रही है।

सोर्स :- “दैनिक भास्कर”                         


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