• June 7, 2026 9:19 pm

इंदिरा के खिलाफ 15 बार आया, मोदी के खिलाफ दूसरी बार

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28 जुलाई 2023 ! ‘हमें पता है कि लोकसभा में हमारी कितनी संख्या है, लेकिन बात सिर्फ संख्या की नहीं है। ये अविश्वास प्रस्ताव मणिपुर में इंसाफ की लड़ाई का भी है। इस प्रस्ताव के जरिए हमने यह संदेश दिया है कि भले ही PM मोदी मणिपुर को भूल गए हैं, लेकिन INDIA अलायंस दुख की घड़ी में उनके साथ खड़ा है। हम इस मामले में सदन के अंदर PM से उनका जवाब चाहते हैं।’

26 जुलाई को ये बात लोकसभा में कांग्रेस के उप-नेता गौरव गोगोई ने कही। लोकसभा में केंद्र सरकार के खिलाफ गौरव गोगोई के अविश्वास प्रस्ताव का 50 विपक्षी सासदों ने समर्थन किया। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।

लोकसभा देश के लोगों की नुमाइंदगी करता है। यहां जनता के चुने प्रतिनिधि बैठते हैं, इसलिए सरकार के पास इस सदन का विश्वास होना जरूरी है। इस सदन में बहुमत होने पर ही किसी सरकार को सत्ता में रहने का अधिकार है।

अविश्वास प्रस्ताव लाने की वजह: सरकार के पास लोकसभा में बहुमत है या नहीं, ये जांच करने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नियम बनाया गया है। किसी भी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसे पास कराने के लिए लोकसभा में मौजूद और वोट करने वाले कुल सांसदों में से 50% से ज्यादा सांसदों के वोट की जरूरत होती है।

संसदीय प्रणाली में इस नियम का कहां जिक्र है: भारतीय लोकतंत्र में इसे ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर मॉडल की संसदीय प्रणाली से लिया गया है। संसदीय प्रणाली के नियम-198 में इसका जिक्र किया गया है।

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले सांसद ने खुद भी माना है कि उनके पास बहुमत नहीं है। इसके बावजूद सदन में प्रस्ताव लाया गया है। दरअसल, मानसून सत्र के पहले से ही विपक्षी दल मणिपुर हिंसा के मामले में PM नरेंद्र मोदी से संसद में बयान देने की मांग कर रहे हैं। वह सरकार के मुखिया होने के नाते प्रधानमंत्री पर बयान देने के लिए दबाव बना रहे हैं।

यही वजह है कि इस मुद्दे पर कई दिनों के विरोध और हंगामे के बाद आखिरकार बुधवार को सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 2 अलग-अलग नोटिस दिए गए।

विपक्षी दलों को भरोसा है कि अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के समय PM नरेंद्र मोदी को स्पीच देनी पड़ेगी।

अविश्वास प्रस्ताव लाने के 10 दिनों के अंदर चर्चा करके वोटिंग कराना जरूरी है। मंत्री परिषद के प्रमुख होने के नाते प्रधानमंत्री को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान जवाब देना होता है। इस दौरान विपक्षी दलों के लगाए आरोप पर PM नरेंद्र मोदी को अपनी बात रखनी होगी।

संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक 2019 के बाद PM मोदी ने लोकसभा के कार्यकाल के दौरान कुल 7 बार डिबेट में हिस्सा लिया है। इनमें से पांच मौकों पर उन्होंने राष्ट्रपति के भाषण के बाद जवाब दिया। जबकि एक बार उन्होंने श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाए जाने को लेकर व दूसरी बार लोकसभा स्पीकर के तौर पर ओम बिड़ला के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान उन्होंने अपनी बात रखी है।

सोर्स :- “दैनिक भास्कर”                      


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