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गुढ़ियारी में 34 गांवों के गोंड पोर्ते समाज के लोगों ने खुशहाली की कामना लेकर मनाया राऊर त्योहार

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13 अप्रैल 2022 | बसना ब्लॉक के ग्राम गुढ़ियारी में गत दिवस गोड़ पोर्ते समुदाय ने राऊर त्योहार मनाया। इस त्योहार में शामिल होने के लिए फुलझर, कौड़ियाराज व ओडिशा के कुल 34 गांव के गोड़ पोर्ते समुदाय के हजार से अधिक परिवार शामिल हुए। यहां प्राचीन समय से ही 34 गांवों के सोमवंशी गोड़ पोर्ते समुदाय बूढ़ादेव देवपूजन, राऊर त्योहार मनाते आए हैं, जो एक समृद्ध आदिवासी परंपरा व संस्कृति से संबंधित है।

क्षेत्र के लोगों की मान्यता है कि चतुभुर्ज बूढ़ादेव भगवान के दर्शन मात्र से शरीर के सारे कष्ट व विकार दूर हो जाते है। गुढ़ियारी में स्वतंत्रता से पहले से मना रहे त्योहार : पोर्ते समुदाय के कुमर्रा सुशील दिवान और बड़े बुजुर्गो ने बताया की सोमवंशी पोर्ते समुदाय गुढ़ियारी स्थित राऊर देव कोठार फुलझर अंचल का सबसे प्राचीन देव कोठार है।

यहां फुलझर, कौड़िया राज और ओडिशा के 34 गांवों से पोर्ते समुदाय लगभग 1 हजार परिवार इकठ्ठा होकर लगभग 300 वर्षो से गुढ़ियारी में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में एक वर्ष के अंतराल में बूढ़ादेव पूजन का त्योहार मानते आ रहे हैं।

बूढ़ादेव पंचरत्न व तेंदू वृक्ष के लकड़ी से बिना शाल चबाये, कील का उपयोग किए बिना ही चारों भुजा को पदविद्या, मंत्र, समुदाय अटूट आस्था और शक्ति से जुड़ा है। बूढ़ादेव के चार भुजा होने के कारण भगवान शंकर का चतुर्भुज अवतार मानते हैं।

तीन दिनों तक मनाया जाता है त्योहार, फुलझर, कौड़िया राज और ओडिशा के एक हजार परिवार होते हैं एकत्रित

तीन दिनों तक चलने वाले राऊर त्योहार में पहले दिन संध्या में देव कोठार में पोर्ते समुदाय के लोगों द्वारा बूढ़ादेव का पूजा-अर्चना कर सभी देवों का आव्हान कर ज्योत जलाकर पूजन करते हैं। फिर अगली सुबह ज्योत का पाठ होने पर कमल के फूल, अन्य फूलों और श्वेत वस्त्र धारण कराकर पोर्ते वंश के 3 और जगत वंश के 1 सदस्य द्वारा बोहकर देव कोठार से नगर भ्रमण व दर्शन के लिए बाहर निकालते हैं, जो स्नान के लिए बूढ़ादेव गांव के मुख्य तालाब में जाते हैं।

नगर भ्रमण के दौरान बूढ़ादेव के साथ में देहा, बीसी बाना बाजा व अन्य वाद्य यंत्रों के साथ समुदाय के लोग कड़ी धूप में खाली पैर में साथ मे घूमते हैं। इस दौरान पोर्ते परिवार के 3 से 5 घरो में बूढ़ादेव जाते हैं, जहां परिवार की महिला मुखिया द्वारा घर के द्वार पर जल अर्पण कर बूढ़ादेव का स्वागत कर पूजा करती हैं। इसी क्रम में तालाब में स्नान कर सभी पोर्ते समुदाय के घरों में बूढ़ादेव जाते हैं। इसके अलावा भोजनालय जहां महाभंडारा के चूल्हा के पास जाकर आग जलाने की अनुमति देते हैं।

गांव के कुरुपाठ, जहां आदिवासी संस्कृति से जुड़े असंख्य पत्थर की प्रतिमा वाली स्थान और कुमर्रा परिवार के पूर्वजों का मरघट है वहां जाते हैं। नगर भ्रमण के समाप्ति के बाद समुदाय व अन्य समाज के लोग अपनी मन्नतों के लिए यहां आते हैं।

इसके बाद आखिर में तालाब से स्नान कर देव कोठार में वापस चले जाते हैं। रात्रि में बूढ़ादेव पूजन त्योहार का महाभंडारा का आयोजन किया जाता है। अगले दिन गोड़ पोर्ते समुदाय का विशेष छत्रभोज के साथ तीन दिवसीय पूजन त्यौहार का समापन करते हैं।

गुढ़ियारी के अन्य समाज के बुजुर्गों ने बताया कि गांव के सभी समाज के लोग शादी विवाह में चूल माटी कार्यक्रम देव कोठार के सामने ही करते हैं। साथ ही त्योहारों व कार्यक्रम में पुजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं।

’Source;- ‘’दैनिक भास्कर’


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