जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इतना सन्नाटा पहले कभी नहीं था
जम्मू कश्मीर

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इतना सन्नाटा पहले कभी नहीं था

पिछले साल 5 अगस्त की सुबह जब ये घोषणा हुई कि कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है तो कश्मीर में एक राजनीतिक भूकंप महसूस किया गया.

अलगावादियों को पहले ही क़ैद किया जा चुका था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाली पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी जेलों या घरों में नज़रबंद कर दिया गया.

एक साल बीत जाने के बाद भी कोई राजनीतिक गतिविधि दिखाई नहीं देती.

पर्यवेक्षक कहते हैं कि कई दशकों में ये पहली बार हुआ है कि राजनीतिक पार्टियां गूंगी हो गई हैं, कश्मीर की पारंपरिक राजनीति जैसे वेंटिलेटर पर आ गई है.

कश्मीर की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखते हैं:

पहली राजनीतिक पार्टी

सिर्फ 82 साल पहले कश्मीर में कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी. जम्मू के डोगरा महाराजा हरि सिंह एकमात्र शासक थे, सरकारी दमन के ख़िलाफ़ जब-जब विरोध होता था उसे ताक़त के ज़रिए दबा दिया जाता था.

1931: ऐसी ही कुछ घटनाओं के दौरान गिरफ्तार किए कश्मीरियों की जेल में सुनवाई हो रही थी कि एक क़ैदी ने नमाज़ के लिए अज़ान दी जिस पर डोगरा फ़ौज ने आपत्ति जताई. क़ैदियों ने विरोध किया तो फ़ौज ने फ़ायरिंग की, दर्जनों क़ैदी मारे गए.

उन दिनों अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त करके कश्मीरी नौजवान कश्मीर लौटे थे जिनमें शेख़ अब्दुल्लाह भी थे. उन्होंने अपनी तरह की सोच रखने वाले शिक्षित दोस्तों के साथ मिलकर घायलों की मदद के लिए एक राहत अभियान चलाया.

इस घटना से कश्मीरियों में राजनीतिक हलचल पैदा हो गई और इसी दौरान पहली राजनैतिक पार्टी जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नाम से बन गई.

जम्मू के चौधरी ग़ुलाम अब्बास और शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह के बीच वैचारिक मतभेद की वजह से 1938 में शेख़ अब्दुल्लाह ने पार्टी का नाम नेशनल कॉन्फ्रेंस रखा और ये पार्टी पूरे कश्मीर की प्रतिनिधि राजनैतिक पार्टी बन गई.

डोगराशाही के ख़िलाफ़ सौ साल में पहली बार विरोध करने के लिए शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह को ‘शेर-ए-कश्मीर’ के नाम से पुकारा जाने लगा. बाद में ब्रिटिश भारत के बंटवारे के दौरान शेख़ अब्दुल्लाह ने पाकिस्तान में विलय के ख़िलाफ़ आज़ाद कश्मीर का नारा दिया और भारत के साथ महाराजा के सशर्त विलय की पुष्टि कर दी.

कश्मीर का प्रधानमंत्री भी गिरफ्तार

भारत पाकिस्तान की जंग के बाद जब कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के प्रशासन में चला गया और युद्ध विराम रेखा के नाम पर एक अस्थायी सीमा रेखा खींच ली गई. इस तरह कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा यानी जम्मू कश्मीर भारत के तहत एक अर्द्ध स्वायत क्षेत्र बन गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस इस क्षेत्र की पहली और सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गई.

विलय की शर्तों के अनुसार कश्मीर के शासक को ‘प्रधानमंत्री’ और गवर्नर को ‘सदर-ए-रियासत’ कहा जाने लगा. लेकिन कुछ साल बाद ही भारत के विरुद्ध साज़िश के आरोप में कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख़ अब्दुल्लाह को गिरफ्तार किया गया और उनके क़रीबी साथी बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद को प्रधानमंत्री बनाया गया.

आगे चलकर प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री कहलाया जाने लगा और सदर-ए-रियासत को गवर्नर कहा जाने लगा. शेख़ अब्दुल्लाह 11 साल तक जेल में रहे और इस दौरान कश्मीर में उनकी ओर से जनमत संग्रह का अभियान चला. वो रिहा हुए तो भारतीय सरकार के साथ समझौते के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री का पद स्वीकार कर लिया. तब तक भारत की उस समय की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने कश्मीर में पैर पसार लिए थे.

शेख़ अब्दुल्लाह का समझौता

दोबारा सत्ता हासिल करने के बाद शेख़ अब्दुल्लाह ने मांग रखने की राजनीति शुरू की क्योंकि स्वायत्तता कश्मीरियों की भावनाओं के क़रीब थी,नेशनल कॉन्फ्रेंस का बुनियादी नारा ‘स्वायत्तता वापस दो’ दोबारा उठाया गया.

इसी नारे के बल पर शेख़ अब्दुल्लाह ,उनके बेटे फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और पोते उमर अब्दुल्लाह ने लगभग तीन दशकों तक कश्मीर पर शासन किया.

1998 में कारगिल जंग के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस पर सशस्त्र विद्रोह के दौरान पुलिस को असीमित अधिकार देकर, जनता पर अत्याचार करने के आरोप लगाये गए थे. इसी मुद्दे को उछालते हुए पूर्व कांग्रेसी नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और सिर्फ चार साल के अंदर कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए.

उन्होंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती, इज़्ज़त के साथ शांति, स्वराज और लाइन ऑफ़ कंट्रोल के दोनों ओर कश्मीरियों के बीच संबंधों की बहाली जैसे नारे लगाए और लोकप्रिय हो गए.

राजनीति पर सर्जिकल स्ट्राइक

पिछले साल कश्मीर की बाकी बची स्वायत्तता को ख़त्म करके उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया, तो ये नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के लिए एक सर्जिकल स्ट्राइक की तरह था. दोनों पार्टियों के सभी प्रमुख नेता और कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए.

नई दिल्ली में केंद्रीय सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने घोषणा की कि कश्मीरियों का जज़्बाती नारों से शोषण किया जाता रहा है,और अब कश्मीर में विकास और खुशहाली की राजनीति होगी.

बीजेपी के अलावा पिछले एक साल से कोई भी राजनैतिक पार्टी एक्टिव नहीं है. पीडीपी से नाराज़ कार्यकर्ताओं और पूर्व मंत्रियों ने पिछले साल बहुत ही गंभीर स्थिति के बीच ‘अपनी पार्टी’ नाम से नई पार्टी बनाई जिसके प्रमुख अल्ताफ़ बुख़ारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात कर चुके हैं.

‘अपनी पार्टी’ किसकी पार्टी?

अल्ताफ़ बुख़ारी ने बीबीसी को बताया, “कौन कहता है कि राजनीति ख़त्म हो गई. राजनीतिक गतिविधियों पर कोई पाबंदी नहीं है. उन लोगों (नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी) ने ख़ामोशी अख्तियार की है, और अब ख़ामोशी उनकी राजनीति है. लेकिन लोगों के मुद्दे हैं ,हम उन्हीं मुद्दों को उठाते हैं और केन्द्रीय सरकार से उन मुद्दों को हल कराते हैं.”

हालांकि अल्ताफ़ बुख़ारी पर अक्सर सौदेबाज़ी का आरोप लगाते हैं. “मुझे कहते हैं कि बेच दिया. अरे भाई बेचने के लिए क्या है. हां, ये कहिए कि कोशिश करता हूं.”

बुख़ारी स्वीकार करते हैं कि चुनी हुई सरकार के बिना लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता. लेकिन इस बात पर जोर देते हैं कि लोगों का भावनात्मक शोषण न किया जाये. वे कहते हैं, ” जो मिल सके हम उन्हीं बातों का ज़िक्र करते हैं,जो मुमकिन न हो हम वो क्यों मांगें. हमने कहा है कि कश्मीर से छीना गया राज्य का दर्जा वापस लेंगे, हम वो बात यहां भी करेंगे और दिल्ली में भी.”

अभी नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी छोटे-छोटे अख़बारी बयानों तक सीमित हैं. ट्विटर पर एक समय में राजनीतिक टिप्पणी से कोहराम मचाने वाले उमर अब्दुल्लाह भी अब गैर-राजनीतिक बाते करते हैं.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरोप लगाया है कि उमर के बहनोई सचिन पायलट कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में इसीलिए चले गए क्योंकि बीजेपी ने उनसे उमर को रिहा करने का वादा किया था.

उमर अब्दुल्लाह बेटे और फ़ारुक़ अब्दुल्लाह के भाई शेख़ मुस्तफ़ा कमाल कहते हैं : “केंद्र सरकार को देखना होगा कि यहां लोग मरने के लिए तैयार हैं, अब भी मौक़ा है कि बातचीत करें और लोगों की इज़्ज़त और गरिमा को बहाल किया जाए.”

विश्लेषक और सिविल सोसायटी कार्यकर्ता अब्दुल मजीद ज़रगर कश्मीर में राजनीतिक विकास को क्षेत्रीय बदलाव की पृष्ठभूमि में देखते हैं.

वे कहते हैं, “अभी चीन के साथ मामले ठीक नहीं हुए. पाकिस्तान और चीन की नज़दीकियों का मामला है. भारत को कमज़ोर पड़ोसी भी आंखें दिखा रहे हैं. ऐसे में यहां की राजनीति को दबा कर अच्छा काम नहीं कर रहे हैं दिल्ली वाले.”

लेकिन लंबे प्रतिबंधों और अब कोरोना वायरस से पैदा हुई स्थिति की वजह से ज़मीनी हालात बहुत ही अनिश्चित हैं, और ये कोई नहीं जानता कि राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा?




















BBC

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