अगस्त 8 2023 ! अकेला बस्तर मात दे रहा है उस ओडिशा को, जिसका एकछत्र राज चलता था झाड़ू-बुहारी के बाजार में। बस्तर के जंगलों में प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाली घास की तीन प्रजातियों से बनी यह सामग्री अब तेजी से बाजार और घरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही है। मौसम का खूब साथ मिल रहा है बस्तर को। अनुकूल परिस्थितियां हैं कुसल घास और छिंद घास के लिए।
टाइगर ग्रास, एशियन ब्रूम ग्रास और बैम्बू ग्रास ये तीन नाम है। इकलौती ऐसी घास, जो पूरे साल तैयार होती रहती है लेकिन कटाई केवल जनवरी, फरवरी और मार्च के महीने में ही की जाती है। हरा रहने पर पत्तियां, पशु चारा के रूप में उपयोग की जाती हैं। सूखने के बाद तना, जलावन के काम आता है। फैल रही है यह प्रजाति। इसलिए फूल झाड़ू के बाजार में बस्तर की धाक बन रही है।
पूरे साल आय का जरिया बनती है छिंद घास। जिस तरह इसका संरक्षण बस्तर कर रहा है, उसका ही प्रतिफल है कि छिंद झाड़ू के लिए ओडिशा पर निर्भरता लगभग खत्म होने की स्थिति में है। साल के वनों में प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाली घास की यह प्रजाति छिंद झाड़ू के रूप में हर घर में पहुंच बना चुकी है। परिपक्व होने के बाद काटी जाती है और सुखाई जाती है। सूखने के बाद चीरा लगाया जाता है। इस तरह तैयार होती है झाड़ू के लिए छिंद घास।
उत्तर बस्तर और कांकेर के घने जंगलों के खुले किनारों में तैयार होती है कुसल अनुकूल परिस्थितियां रहीं, तो एक मीटर से भी अधिक ऊंचाई हासिल कर लेती है घास की यह प्रजाति। पुष्पन के पहले तक हरी-भरी पत्तियों वाली यह प्रजाति सूखने के बाद भूरी हो जाती है और फूल वाली जगह पर कांटे लग जाते हैं। यह स्थिति पहचान है, कटाई की। कांटे तेज होते हैं, इसलिए कमर से पैरों तक प्लास्टिक क्लाथ पहनकर काटना होता है। कांटों की वजह से ही कांटा बुहारी के नाम से पहचाना जाता है।
घास आदि सामग्री से झाड़ू बनाना इस अंचल का एक महत्वपूर्ण कौशल है, जो आदिवासी समुदाय को न केवल रोजगार प्रदान करता है, बल्कि प्लास्टिक आदि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले वस्तुओं से बने झाड़ू के स्थान पर प्राकृतिक चीजों से बने परंपरागत झाड़ू को उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अजीत विलियम्स, विज्ञानी (वानिकी)बीटीसी कालेज आफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
सोर्स :-“नईदुनिया“
