देश में 124 सालों के अंतराल के बाद दुर्लभ प्रजाति का फूल ‘लिपरिस पैगमई’ खिला है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित सप्तकुंड ट्रेक क्षेत्र में फूल के खिलने की पुष्टि हुई है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण,पुणे के वनस्पति विज्ञान के विशेष जीवन सिंह जलाल कहते हैं कि 3800 मीटर की ऊंचाई में फूल खिला है।
उल्लेखीनय है कि उत्तराखंड वन विभाग के दो अधिकारियों ने जून में भी दुर्लभ फूल के खिलने की पुष्टि की थी। जलाल कहते हैं कि दुर्लभ प्रजाति का यह फूल जून महीने में पांच सेंटीमीटर तक खिलता है और यह पहली बार पश्चिमी हिमालय में खिला है।
इससे पहले यह फूल सिक्किम में 1892 और 1877 और फिर बाद में पश्चिम बंगाल में 1896 में देखा गया था। कहते हैं हमारे लिए यह बहुत ही गौरव की बात है कि दशकों के बाद यह फूल दोबारा खिला है और चुनौती भी है कि हम सभी को हिमालय संरक्षण के लिए कदम उठाना चाहिए।
जलाल बताते हैं कि फूलों की करीब 1250 से प्रजातियों में से 250 प्रजाति उत्तराखंड के 3100 से 3900 मीटर की उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती है। जलाल ने ‘लिपरिस पैगमई’ की तीन प्रजातियों की पहचान की है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञों ने फ्रेंच साइंटिफिटिक जनरल ‘रिर्चडाइना’ में इसी साल जुलाई 30 को प्रकाशित भी किया है।
रिसर्च पेपर ‘लिपरिस पैगमई’ (मैलाक्सिडिया व ऑर्चीडेसिया ) नया विभाजक रिकॉर्ड को संयुक्त रूप से भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण,पश्चिमी रीजनल सेंटर, पुणे के जीवन सिंह जलाल, दिनेश कुमार,भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण,सिक्किम हिमालय रीजनल सेंटर, गैंगतोक, मनोज सिंह, जूनियर रिसर्च फैलो, फॉरेस्ट रिसर्चविंग और हरीश नेगी,फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर उत्तराखंड ने प्रकाशित किया है।
रिसर्च पेपर के अनुसार, ‘लिपरिस पैगमई’ की करीब 320 प्रजातियां है, जिनमें से करीब 48 प्रजातियां देश में है। 48 प्रजातियों में से 10 प्रजातियां पश्चिमी हिमालय में मिली है। चमोली के सप्तकुंड में ट्रेकिंग के दौरान, मनोज सिंह को प्रजाति फूल की प्रजाति मिली थी,जिन्हें वह सैंपलिंग के लिए ले आए थे।
जीवन सिंह जलाल बताते हैं कि फूल को इथोनॉल में संरक्षित कर बीएसआई के विशेषज्ञ को स्टडी के लिए भेजा गया है। यह पहली बार हुआ है जब पश्चिमी हिमालय में इस फूल की प्रजाति मिली है।
दुर्लभ प्रजाति के फूल मिलने से इसबात के संकेत भी हैं कि चारगाह की स्थिति ठीक है। कहते हैं कि पिछले 100 सालें में सिक्किम व पश्चिम बंगाल में यह फूल यह सिर्फ एक बार ही दिखाई दिया है।
चीफ कंसर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (रिसर्च विंग ) संजीव चतुर्वेदी कहते हैं कि उत्तराखंड के लिए यह बहुत ही गर्व की बात है कि फ्रेंच जनरल में इस फूल बारे में प्रकाशित किया गया है।
