अक्टूबर 23 2023 ! वह बहादुर थीं. शस्त्र विद्या में निपुण थीं. एक बार कित्तूर राज्य में बाघ का जबरदस्त आतंक फैला हुआ था. नरभक्षी का शिकार करने राजा मल्लासारजा खुद निकले. एक तीर में बाघ ढेर हो गया. जब राजा बाघ के करीब पहुंचे तो उसे दो तीर लगे मिले. उन्हें समझ नहीं आया कि उन्होंने जब एक ही तीर मारा तो भला दूसरा तीर किसने चलाया? तभी उनकी नजर कुछ दूर खड़ी एक वीरांगना पर पड़ी, जिसके हाथ में धनुष-वाण भी था और तरकश भी.
इलाके में बाघ के आतंक से निपटने यह युवती चुपचाप निकल गई. एक बाघ को एक ही समय में दो तीर लगे, एक राजा ने चलाया तो दूसरा चेन्नम्मा ने. यहीं से उस वीरांगना के रानी बनने का रास्ता साफ हुआ. राजा ने शादी की. एक बेटे का जन्म हुआ.
रानी चेन्नम्मा की किस्मत कुछ यूं खराब थी कि कुछ दिन के अंतराल पर ही राजा और उनके पुत्र, दोनों का निधन हो गया. अब उनके सामने पुत्र के रूप में प्रजा थी. अंग्रेजों का आतंक पूरे इलाके में था. पति और बेटे के असमय निधन के बाद रानी ने एक बच्चे को गोद ले रखा था.
अंग्रेजों की नजर कित्तूर राज्य और उसकी संपदा पर लगी. उन्होंने हमला कर दिया. रानी चेन्नम्मा के नेतृत्व में उनकी छोटी सी सेना ने अंग्रेजों के न केवल छक्के छुड़ा दिए बल्कि कुछ अफसर मारे गए और कुछ को बंधक बना लिया गया. बाद में बंधक बनाए गए अफसरों को रानी ने छोड़ भी दिया लेकिन यह हार अंग्रेज पचा नहीं सके.
उन्होंने कुछ ही दिन बाद फिर से कित्तूर पर हमला बोल दिया. इस बार वे ज्यादा तैयारी से आए थे और रानी इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थीं. इस बार अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और एक किले में रखा. 21 फरवरी 1829 को वहीं उनका निधन भी हुआ.
कित्तूर पर हमले का मुख्य कारण यह रहा कि रानी चेन्नम्मा ने गोद लिए हुए बच्चे शिवलिंगप्पा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. अंग्रेजों ने एक पॉलिसी बना रखी थी. नाम था डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स. इसके तहत दत्तक पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता था. अंग्रेजों ने रानी को आदेश दिया कि वे शिवलिंगप्पा को पद से हटाएं. वे ऐसा करतीं तो अंग्रेज कित्तूर को हड़प लेते. यही उनकी पॉलिसी का नियम था. रानी के इनकार के बाद अंग्रेजों ने हमला बोल दिया, जिसमें उन्हें पहली बार तगड़ी हार का सामना करना पड़ा.
यह लड़ाई अक्तूबर 1824 में हुई थी. इसमें अंग्रेज अफसर सेंट जों मारा गया. सर वाल्टर और स्टीवेंसन को कित्तूर सेना ने बंधक बना लिया. फिर युद्ध न करने के वायदे के साथ रानी ने इन्हें छोड़ दिया लेकिन अंग्रेज धूर्त निकले. अगली बार वे ज्यादा ताकत से आए और संघर्ष बहुत तेज हुआ. दोनों ही पक्षों को नुकसान हुआ. रानी को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें बेलहोंगल किले में रखा गया, जहां उनका निधन हुआ. वे अंग्रेजों की अनेक नीतियों का विरोध भी करती थीं. इसलिए अंग्रेज उनसे चिढ़ते थे.
इतिहास कहता है, अंग्रेजों के खिलाफ आमने-सामने युद्ध करने वाली वह पहली शासक थीं. हालांकि, इतिहास में उनके बारे में कम लिखा गया है या यूं भी कह सकते हैं कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला है, जिसकी वे हकदार थीं. बाद के दिनों में संसद परिसर में उनकी प्रतिमा लगी. साल 1977 में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया.
सोर्स :- ” TV9 भारतवर्ष “
