अक्टूबर 25 2023 ! सीमा विवाद पर चर्चा के 25वें दौर की बातचीत में भूटान के विदेश मंत्री टांडी दोर्जी ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाक़ात की और दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बन गई है कि दोनों के बीच सीमा विवाद का समाधान “जल्द कराया” जाना चाहिए.
इस दौरान दोनों देशों के बीच “भूटान-चीन सीमा के निर्धारण और सीमांकन” को लेकर एक संयुक्त तकनीकी टीम बनाने को लेकर एक “सहयोग समझौते” पर हस्ताक्षर किए गए हैं.
अख़बार लिखता है कि इसी साल अगस्त में इस पर सहमति बनी थी. इस संबंध में बैठक के बाद में एक साझा बयान भी जारी किया गया है. इस मौक़े पर दोर्जी के साथ भारत के लिए भूटान के राजदूत रिटायर्ड मेजर जनरल वी नामग्याल भी मौजूद थे.
चीनी पक्ष की तरफ़ के जारी बयान में कहा गया है कि दोर्जी और वांग यी की बैठक के दौरान वांग यी ने ये उम्मीद जताई कि दोनों देश एक-दूसरे के साथ राजनयिक रिश्ते कायम करेंगे. अब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी सदस्य के साथ भूटान के कूटनीतिक संबंध नहीं हैं.
अख़बार लिखता है कि बयान के अनुसार, वांग यी ने कहा, “चीन और भूटान के बीच सीमा को लेकर चर्चा का नतीजा निकलने और राजनयिक संबंध कायम होने से दोनों मुल्कों के लिए लंबी अवधि के हित हैं.”
भारत ने इस मामले पर पहले कहा था कि वो दोनों के बीच की बातचीत पर उसकी नज़र है क्योंकि इसका संबंध उसकी सुरक्षा से है, ख़ासकर डोकलाम से.
डोकलाम की स्थिति भारत, भूटान और चीन के ट्राई-ज़ंक्शन जैसी है. डोकलाम एक विवादित पहाड़ी इलाक़ा है, जिस पर चीन और भूटान दोनों ही अपना दावा जताते हैं. डोकलाम पर भूटान के दावे का भारत समर्थन करता है.
भूटान के पीएम ने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि नक़्शे पर एक रेखा खींची जाएगी, जिसके एक तरफ़ का हिस्सा भूटान का होगा और दूसरी तरफ़ का हिस्सा चीन का. इस इंटरव्यू में उन्होंने चीन के साथ राजनयिक संबंध कायम करने की बात से इनकार किया था.
अख़बार लिखता है कि भूटान और चीन के बीच 1984 से लेकर 2016 के बीच 24 दौरों की चर्चा हुई थी. इसके साथ एक्सपर्ट ग्रुप की बैठकें भी आयोजित की गईं. इस साल की शुरुआत में सीमा निर्धारण के लिए संयुक्त टेक्निकल टीम की पहली बातचीत हुई थी, जिसके बाद ये संकेत मिलने लगे कि दोनों इस प्रक्रिया को जल्द पूरा करना चाहते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और भूटान के बीच सीमा निर्धारण को लेकर कोई भी समझौता, जिसमें पश्चिम में डोकलाम के साथ उत्तर के क्षेत्रों (जाम्परलुंग और पासमलुंग घाटियों) के बीच “अदला-बदली की व्यवस्था” की बात हो, वो भारत के लिए चिंता का विषय होगा.
भारत और उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाला “सिलीगुड़ी गलियारा” भारत के लिए बेहद अहम है और इसकी सुरक्षा के लिए डोकलाम भारत के लिए ज़रूरी है.
अख़बार लिखता है कि भूटान के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री अब तक कहते रहे हैं कि चीन के साथ कोई भी समझौता “भारत के हितों के ख़िलाफ़” नहीं किया जाएगा और अगर डोकलाम को लेकर कोई चर्चा हुई तो उसमें भारत-चीन और भूटान शामिल रहेंगे.
इसी साल एक बेल्जियन अख़बार को दिए गए इंटरव्यू में भूटान के प्रधानमंत्री लोटे छृंग ने एक देश के तौर पर अपनी सीमाओं का ज़िक्र किया था.
उन्होंने कहा था, “ये समस्या अकेले भूटान हल नहीं कर सकता. हम तीन हैं. इनमें से कोई छोटा या बड़ा देश नहीं है, ये तीनों बराबर हैं. अगर बाक़ी दो देश इसके लिए तैयार हैं तो हम भी तैयार हैं.”
उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भूटान और चीन एक या दो बैठक में अपनी कुछ सीमाओं का सीमांकन करने में सक्षम होंगे. इन दो देशों के बीच 1984 से सीमा को लेकर बातचीत चल रही है.
पीएम छृंग के इस बयान ने भारत में चर्चा छेड़ दी थी. कई टिप्पणीकारों ने इस बात की भी संभावना जताई कि कहीं भूटान और चीन के साथ ट्राई-जंक्शन को लेकर कोई स्वैप अग्रीमेंट तो नहीं हो गया है. कुछ जानकारों का मानना है कि भूटान डोकलाम पर किए गए अपने दावे को मज़बूती के साथ पेश नहीं कर रहा है.
पूर्व वरिष्ठ भारतीय राजनयिक और हिमालय से जुड़े मामलों के जानकार पी स्टोबदान ने बीबीसी से कहा था,”भारत को चिंता है कि चीन उसे परेशान करने के इरादे से भूटान पर सीमा विवाद सुलझाने का दबाव बना रहा है.”
सोर्स :-“BBC न्यूज़ हिंदी”
