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कौन थे ‘सैटेलाइट मैन ऑफ इंडिया’ प्रो. उडुपी रामचंद्र राव, पहली सैटेलाइट से लेकर आदित्य एल-1 मिशन में रहें शामिल

ByPrompt Times

Mar 11, 2024
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भारत आज अंतरिक्ष की ऊंचाइयां छू रहा है तो इसमें प्रोफेसर उडुपी रामचंद्र राव का सबसे बड़ा योगदान है. 10 मार्च 1932 को कर्नाटक में जन्में उडुपी रामचंद्र राव ने भारत के पहले सैटेलाइट आर्यभट्ट से लेकर देश के पहले सोलर मिशन आदित्य एल-1 में अहम भूमिका निभाई है. जयंती पर आइए जानते हैं सैटेलाइट मैन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले प्रोफेसर उडुपी रामचंद्र राव की जीवनी.

कर्नाटक में हुआ था सैटेलाइट मैन ऑफ इंडिया का जन्म

प्रोफेसर उडुपी रामचंद्र राव का जन्म 10 मार्च 1932 को कर्नाटक में अडमरु, उड्डपी में हुआ था. उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से साल 1951 में विज्ञान में ग्रेजुएशन किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से 1953 में एमएससी की डिग्री हासिल किया. साल 1960 में गुजरात विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने एमआईटी के फैकल्टी मेंबर के रूप में काम किया. अमेरिका के डलास में टेक्सास यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पढ़ाया ही नहीं, बल्कि कई अंतरिक्षक्राफ्ट का हिस्सा भी रहे और कई प्रयोग किया. साल 1966 में प्रोफेसर राव भारत लौट आए और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी), अहमदाबाद में प्रोफेसर बन गए.

18 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च कराए

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में उन्होंने हाई-एनर्जी एस्ट्रोनॉमी प्रोग्राम की शुरुआत की और इस प्रयोगशाला के चेयरमैन और तिरुअनंतपुरम में स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी के चांसलर भी रहे. देश के तेज विकास में स्पेस साइंस की उपयोगिता का महत्व समझते हुए प्रोफेसर राव ने भारत में सैटेलाइट टेक्नोलॉजी को स्थापित करने का जिम्मा साल 1972 में अपने कंधों पर ले लिया. साल 1975 में आर्यभट्ट से शुरुआत कर एक-एक कर 18 से अधिक सैटेलाइट लॉन्च किए. इनमें संचार, रिमोट सेंसिंग और मौसम संबंधी सेवाएं प्रदान करने वाले सैटेलाइट उन्हीं की अगुवाई में डिजाइन कर लॉन्च किए गए. इसीलिए उन्हें सैटेलाइट मैन ऑफ इंडिया कहा जाता है.

रॉकेट टेक्नोलॉजी के विकास को तेजी से आगे बढ़ाया

साल 1984 में प्रोफेसर राव को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का चेयरमैन बनाया गया. इसके बाद 1994 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाया. इसके साथ ही अंतरिक्ष आयोग का अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव का कार्यभार भी मिला, जिसके बाद प्रोफेसर राव ने रॉकेट टेक्नोलॉजी के विकास को तेजी से आगे बढ़ाया. इसका नतीजा यह रहा कि एएसएलवी और पीएसएलवी रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया जा सका. प्रोफेसर राव ने ही 1991 में भूस्थिर रॉकेट जीएसएलवी के विकास और क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी के विकास की शुरुआत की थी.

आदित्य एल-1 मिशन की रखी थी नींव

साल 2023 में आदित्य एल-1 मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया तो इसकी नींव रखने वाले भी प्रोफेसर राव ही थे. तब आदित्य-एल1 परियोजना की निदेशक निगार शाजी ने प्रोफेसर यूआर राव को विशेष तौर पर याद किया था. उन्होंने कहा था कि इस मिशन का बीज प्रोफेसर राव ने ही बोया था. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए) के प्रोफेसर जगदेव सिंह ने आदित्य एल-1 मिशन के लिए गंतव्य के रूप में एल-1 को निर्धारित करने में राव द्वारा निभाई गई भूमिका को याद किया था. उन्होंने बताया था कि प्रोफेसर यूआर राव ने ही सुझाव दिया था कि पृथ्वी की निचली कक्षा के बजाय एल-1 पर जाया जा सकता है.

350 से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित

प्रोफेसर राव ने कॉस्मिक रेज (ब्रह्मांडीय किरणों), इंटरप्लेनेटरी फिजिक्स (अंतरग्रहीय भौतिकी), हाई एनर्जी एस्ट्रोनॉमी (उच्च ऊर्जा खगोल विज्ञान), स्पेस अप्लीकेशन (अंतरिक्ष अनुप्रयोग) और सैटेलाइट यानी उपग्रह और रॉकेट टेक्नोलॉजी को समाहित करते हुए 350 से अधिक साइंटिफिक और टेक्नोलॉजी से जुड़े शोधपत्र प्रकाशित किए. इसके साथ ही उन्होंने कई किताबें भी लिखीं. उन्हें यूरोप की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी बोलोग्ना यूनिवर्सिटी सहित 21 से अधिक विश्वविद्यालयों से डीएससी (मानद कौसा) की डिग्री भी मिली.

प्रोफेसर राव के नाम ढेरों सम्मान

साल 1976 में प्रोफेसर राव को भारत सरकार ने देश के तीसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण’ से नवाजा. साल 2017 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया. प्रोफेसर यूआर राव अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में प्रतिष्ठित ‘सैटेलाइट हॉल ऑफ फ़ेम’ में शामिल होने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक बने. उन्हें इस सम्मान से 19 मार्च, 2013 को नवाजा गया. इसके असाला मेक्सिको के गुआडालाजारा में प्रतिष्ठित आईएएफ हॉल ऑफ फेम में भी शामिल होने वाले वह पहले भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक थे.

स्पेस टेक्नोलॉजी से इन-इन रूपों में जुड़े रहे

1961 से 1963 तक पोस्ट डॉक्टरल फेलो एमआईटी, यूएसए, 1963 से 1966 तक एसडब्ल्यू केंद्र फॉर एडवांस्ड रिसर्च, डलास, टेक्सास में सह प्रोफेसर, 1966 से 1969 भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर, 1969 से 1972 तक भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद के प्रोफेसर, 1972 से 1975 तक भारतीय वैज्ञानिक उपग्रह परियोजना, बेंगलुरु के परियोजना निदेशक, 1975 से 1984 तक डॉ. विक्रम साराभाई अंतरिक्ष विभाग के प्रोफेसर और 1984 से 1994 तक अध्यक्ष, अंतरिक्ष आयोग/सचिव, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार और अध्यक्ष, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), बेंगलुरु. 1988 में पीआरएल परिषद, इसरो के अध्यक्ष बने.

इतने सारे पदों पर किया काम

1981 से 2001 तक अंतरिक्ष आयोग, भारत सरकार के सदस्य रहे. 1997 में नेशनल केंद्र फॉर अंटार्कटिक एंड ओशन रिसर्च, गोवा की गवर्निंग काउंसिल के सह-अध्यक्ष, 2001 में प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य रहे. 2001 – 2002 तक प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष रहे. 2005 में कर्नाटक विज्ञान और प्रौद्योगिकी अकादमी के अध्यक्ष बनाए गए. 2007 में भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु के अपर निदेशक बने. भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे की शासी परिषद के अध्यक्ष और अंतरिक्ष भौतिकी केंद्र, कोलकाता के अध्यक्ष भी रहे. उनको साल 2006 में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ का कुलपति बनाया गया और इस पद पर 2011 तक रहे. 2006 से 2010 तक केंद्रीय निदेशक मंडल, भारतीय रिजर्व बैंक के सदस्य रहे. 24 जुलाई, 2017 को प्रोफेसर राव का निधन हो गया.

 


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