करीब दो दशक बाद भारतीय राजनीति में यह सवाल फिर एक बार प्रासंगिक हो उठा है कि लोकसभा का स्पीकर बीजेपी, कांग्रेस के अलावा क्या किसी दूसरे राजनीतिक दल का होगा? दो दशक इसलिए क्योंकि 2004 के ‘इंडिया शाइनिंग’ वाले लोकसभा चुनाव में जब वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी महज 138 और एनडीए 181 सीटों पर रुक गई. वहीं कांग्रेस 145 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी तो बनकर उभरी लेकिन बहुमत से जब काफी पीछे रह गई. तब कांग्रेस को वाम दलों की जरूरत शिद्दत से समझ आई.
पर 2024 लोकसभा चुनाव नतीजे के बाद भाजपा की स्थिति वह नहीं जो 2014, 2019 में थी. अव्वल तो भाजपा, 2009 आम चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन से भी 34 सीट ज्यादा लाकर इस बार सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी है. ऐसे में, कहीं न कहीं वह तो आश्वस्त होगी कि अगर कांग्रेस 206 सीट पर अपना स्पीकर बना ले सकती है तो 240 के आंकड़े के साथ उसे दिक्कत नहीं आनी चाहिए.
लेकिन चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार जैसे कठिन सहयोगियों का समर्थन होने से, केन्द्र के मंत्रालयों में भी रक्षा, वित्त, गृह, विदेश और रेल जैसे अहम मंत्रालय अपने पास रख लेने, एक तल्ख और ध्रुवीकृत संसदीय राजनीति के हो जाने से, और विपक्षी इंडिया गठबंधन के सांसदों की भी ठीक-ठाक संख्या होने से कयास लग रहे हैं कि भाजपा अपना स्पीकर आसानी से बना पाएगी या नहीं?
क्योंकि बीजेपी के सहयोगी दलों से लेकर विपक्षी दल भी ये जानते हैं कि सांसदों की अयोग्यता तय करने से लेकर किसी राजनीतिक दल में टूट की स्थिति में लोकसभा स्पीकर का पद किस हद तक महत्त्वपूर्ण हो जाता है. मामला काफी पेचीदा है. इसलिए एक दशक तक अपनी ढपली-अपनी राग गाने वाली बीजेपी की तरफ से इस दफा आम सहमति की आवाज कुछ ज्यादा ही आ रही है.
बहुत मुमकिन है कि लोकसभा में बीजेपी सर्वसम्मति से स्पीकर चुनने की परंपरा को आखिर दम तक तोड़ने की कोशिश न करे. केवल बीजेपी ही नहीं बल्कि विपक्षी गठबंधन के पाले में भी गेंद है. जहां वे कुछ अपनी कहते हुए, कुछ सत्ताधारी दल की सुनते हुए चुनाव की स्थिति बना सकते हैं. आजादी के बाद से लोकसभा का स्पीकर अब तक आम सहमति से ही चुना जाता रहा है. हालांकि, भाजपा के हालिया इतिहास पर गौर करें तो वह इस तरह की परंपरा तोड़ने में कुछ खास
दूसरा – सहयोगी दल को स्पीकर का पद देने की दूसरी स्थिति 1999 के आम चुनाव के बाद बनी. इस चुनाव में तेलुगू देशम पार्टी ने एनडीए गठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा. इस बार उनका ग्राफ 12 से बढ़कर 29 पहुंचा. जीएमसी बालयोगी को फिर एक बार स्पीकर चुन लिया गया. मगर एक हेलिकॉप्टर हादसे में उनके असामयिक निधन हो जाने से दोबारा चयन करना पड़ा.
तीसरा – बालयोगी के निधन से स्पीकर का पद दो महीने खाली रहा. करीब दो दर्जन क्षेत्रीय दलों के समर्थन से सरकार चला रहे वाजपेयी को फिर एक बार अपने गठबंधन के घटक दलों ही की तरफ देखना पड़ा. महाराष्ट्र में और केन्द्र में भी भाजपा की सहयोगी शिवसेना की लौटरी लगी. मुंबई उत्तर-पूर्व सीट से सांसद मनोहर जोशी लोकसभा अध्यक्ष बन गए. वाजपेयी सरकार के आखिरी दिनों तक वह पद पर बने रहे.
अब बात ये है कि न तो ये 2004 है और ना ही 1998, 1999 का साल. सो, सभी को 2024 के 26 जून, बुधवार का इंतजार है. हां, कुछ सवाल हैं.
भाजपा अपना स्पीकर बना पाएगी या सहयोगियों के सामने झुक जाएगी? बना भी ले तो बिना चुनाव के स्पीकर चुने जाने वाली परंपरा निभ जाएगी या आजादी के बाद पहली दफा इस पद के लिए चुनाव की नौबत आएगी? डिप्टी स्पीकर का पद बीजेपी के सहयोगी दल ले जाएंगे या फिर विपक्ष के किसी दल को यह पद देकर भाजपा थोड़ी भलमनसाहत दिखाएगी?
हिचकिचाहट नहीं दिखाती.
स्वतंत्र भारत के इतिहास में 17वां लोकसभा ऐसी रही जब पूरे पांच साल तक लोकसभा में डिप्टी स्पीकर नहीं चुना गया. जबकि अब तक यह रवायत चली आ रही थी कि सत्ताधारी पार्टी अपना स्पीकर बना लेती थी और उपाध्यक्ष का पद अपने सहयोगी या फिर विपक्षी दल के किसी सदस्य को दे देती थी. पर भाजपा ने पिछली लोकसभा में ये परिपाटी नहीं निभाई. इस बार भाजपा अगर अपना स्पीकर बनाने में कामयाब हो भी जाती है तो उसे डिप्टी स्पीकर का पद किसी और को देना होगा.
कब-कब क्षेत्रीय पार्टियों की चली?
आजादी के बाद से अब तक जो 17 लोग लोकसभा के स्पीकर पद के लिए चुने गए, इनमें केवल दो ऐसे रहे हैं जो क्षेत्रीय दलों से थे. जब एक राष्ट्रीय पार्टी को क्षेत्रीय दल की मांग के आगे झुकना पड़ा और उनके लिए स्पीकर का पद छोड़ना पड़ा. ये नौबत तीनों ही दफा वाजपेयी के गठबंधन सरकार के दौरान आई.
पहला – साल 1998. 12वीं लोकसभा का गठन हुआ. अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनानी थी लेकिन उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं थी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की 261 सीटें आईं थीं. कांग्रेस विरोध के स्वर को बुलंद करते हुए वाजपेयी ने दूसरे दलों से बात की.
12 सीट जीतने वाली तेलुगू देशम पार्टी ने अपना स्पीकर बनाने की शर्त रख दी. चंद्रबाबू नायडू अड़ गए. और आखिरकार भाजपा को टीडीपी के जीएमसी बालयोगी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने पर सहमत होना पड़ा. 25 बरस बाद हालात खुद को दोहरा रहे हैं. बीजेपी क्या इस बार झुक जाएगी?
फिलहाल तो नहीं लग रहा. तब वह कहां 182 पर अटक गई थी, आज उसकी संख्या 240 पर है.
इस बार क्षेत्रीय दल को मिलेगी कमान? source TV9
