ब्रिटेन और चीनः बिज़नेस करें या हॉन्ग कॉन्ग पर भिड़ें?
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ब्रिटेन और चीनः बिज़नेस करें या हॉन्ग कॉन्ग पर भिड़ें?

ब्रिटेन ने हॉन्ग कॉन्ग के नए राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के मुद्दे पर उसके साथ अपनी प्रत्यर्पण संधि ‘तुरंत प्रभाव से‘ और ‘अनिश्चितकाल के लिए‘ निलंबित करने की घोषणा इसी मंगलवार को थी.

हॉन्ग कॉन्ग के मुद्दे पर उठे विवाद के बाद ब्रिटेन और चीन के रिश्तों में काफ़ी कुछ बदला हुआ दिख रहा है, लेकिन दोनों देशों के संबंधों की तस्वीर हमेशा से ऐसी नहीं थी.

गुज़रे दो दशकों में ब्रिटेन और चीन के बीच आर्थिक संबंधों में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है. साल 1999 में चीन ब्रिटेन का 26वाँ सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार था. अब ये छठे नंबर पर आ गया है.

दोनों देशों के बीच व्यापार पिछले साल रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है. इसमें बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और शिक्षा का अहम रोल रहा है.

लेकिन, देश के टेलीकॉम नेटवर्क के लिए ब्रितानी सरकार के ख्वावे कंपनी के 5जी इक्विपमेंट इस्तेमाल करने को लेकर बदले गए फ़ैसले ने दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ा दिया है.

ऐसे में दोनों देशों को आर्थिक रिश्तों के ज़रिए होने वाले फ़ायदे अब ख़तरे की ज़द में आते दिखाई दे रहे हैं.

व्यापार

पिछले साल चीन ब्रिटेन का छठा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट बन गया था. ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ओएनएस) के मुताबिक़, इसकी वैल्यू 30.7 अरब पाउंड थी.

चीन के लिए ब्रिटेन के निर्यात का यह रिकॉर्ड स्तर था. 2018 में यह वैल्यू 23.4 अरब पाउंड थी.

साथ ही यह लगातार चौथा साल था, जबकि चीन को ब्रिटेन से होने वाले एक्सपोर्ट में इज़ाफ़ा दर्ज किया गया था.

दूसरी तरफ़, आयात के मामले में चीन ब्रिटेन के लिए चौथा सबसे बड़ा ज़रिया था. साल 2019 में चीन से ब्रिटेन को होने वाले आयात की वैल्यू 49 अरब पाउंड थी.

बीजिंग के चियुंग कॉन्ग ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ बिज़नेस में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर लेस्ली यंग ने बीबीसी को बताया कि उनकी राय में ब्रिटेन और चीन के बीच तनाव का असर दोनों देशों के व्यापार पर नहीं पड़ना चाहिए.

उन्होंने कहा, “ब्रिटेन और चीन के बीच बढ़ते तनाव का असर इनके व्यापार पर ज़्यादा पड़ने के आसार नहीं हैं. इसका बड़ा असर ब्रिटेन में उच्च शिक्षा पर पड़ सकता है और साथ ही इसका असर चीनी कंपनियों के लिए ब्रिटेन को हब बनाने पर पड़ सकता है.”

इंफ़्रास्ट्रक्चर

ब्रिटेन के इंफ्रास्ट्रक्चर में भी चीन की बड़ी भूमिका है. इसमें न्यूक्लियर पावर से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल हैं.

सॉमरसेट में 20 अरब पाउंड के हिंकले पॉइंट न्यूक्लियर पावर स्टेशन को बनाने में चीन की जनरल न्यूक्लियर पावर (सीजीएन) आंशिक रूप से वित्तीय मदद दे रही है.

इस सरकारी चीनी ग्रुप के पास सुफोल्क के साइजवेल में एक और प्लांट में 20 फ़ीसदी हिस्सेदारी लेने का भी विकल्प है.

साथ ही कई न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट्स में काम कर रही एक इकाई में इसकी बहुमत हिस्सेदारी है.

चीन के सरकारी सॉवरेन वेल्थ फ़ंड चाइना इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन (सीआईसी) का थेम्स वॉटर में 8.7 फ़ीसदी स्टेक है.

इसके अलावा लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर मालिकाना हक़ रखने वाली कंपनी में इसकी 10 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

ब्रिटेन के नॉर्थ सी ऑयल प्रोडक्शन में चाइना नेशनल ऑफ़शोर ऑयल कॉरपोरेशन (सीएनओओसी) की हिस्सेदारी है.

चीनी छात्र

ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में चीनी छात्रों की संख्या 2006 के मुक़ाबले तीन गुने से ज़्यादा बढ़ी है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड सोशल रिसर्च (एनआईईएसआर) के आँकड़ों से इस बात का पता चलता है.

ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों और स्कूलों में बतौर ट्यूशन फ़ीस चीनी छात्र कम से कम 1.7 अरब पाउंड सालाना का योगदान देते हैं.

जानकारों ने चेतावनी दी है कि अगर चीन अपने छात्रों के ब्रिटेन आने पर रोक लगा दें, तो ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों को बड़ा आर्थिक नुक़सान होगा.

शंघाई की मार्केट इंटेलिजेंस फ़र्म इमर्जिंग स्ट्रैटेजी के प्रवक्ता के मुताबिक़, “विदेशी छात्रों में चीन के छात्रों की तादाद सबसे ज़्यादा है. ऐसे में ब्रिटेन के शैक्षिक संस्थानों पर इसका वित्तीय असर काफ़ी तगड़ा होगा. विश्वविद्यालयों को अपनी लागत निकालने और कमाई के ज़रिए ढूँढने पड़ेंगे.”

लेकिन, ब्रिटिश काउंसिल ने चीनी छात्रों की बड़े पैमाने पर निकासी से इनकार किया है.

एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया, “तात्कालिक राजनीतिक संबंधों का छात्रों की विदेश में पढ़ाई की लंबी अवधि की योजनाओं पर असर पड़ने के आसार नहीं हैं. ब्रिटेन हमेशा से चीनी छात्रों के लिए सबसे अहम ठिकानों में से एक रहा है.”

अधिग्रहण

ब्रिटेन में चीन कई हाई-प्रोफ़ाइल अधिग्रहणों में सक्रिय रहा है. इसके चलते ब्रिटेन में अरबों डॉलर की पूँजी आई है.

मार्च में ब्रिटिश स्टील को चीन के जिंग्या ग्रुप ने ख़रीद लिया था. माना जा रहा है कि इस ख़रीदारी से कंपनी में 3,000 से ज़्यादा नौकरियाँ बच जाएँगी.

चीनी कंपनी ने कहा है कि वह अपनी ख़रीदी गई कंपनी को आधुनिक बनाने में एक अरब पाउंड से ज़्यादा का निवेश करेगी.

अन्य प्रमुख अधिग्रहणों में ब्लैक कैब बनाने वाली एलटीआई शामिल है, जिसे चीन की कंपनी गीली ने ख़रीदा है.

इसके अलावा वुल्वरहैंप्टन वांडरर्स फ़ुटबॉल क्लब को चीन की फोसुन इंटरनेशनल ने ख़रीद लिया है.

टेक्नॉलॉजी

टेक्नॉलॉजी फ़र्म ख्वावे का ब्रिटेन में एक हाई-प्रोफ़ाइल और लंबे वक़्त से चला आ रहा निवेश है, जिसकी जड़ें 2005 तक जाती हैं.

हालाँकि, ख्वावे अब नए 5जी इक्विपमेंट को लॉन्च करने में शामिल नहीं होगी, लेकिन यह अभी भी मौजूदा टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल है.

हालांकि, सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियां ख्वावे को लेकर बनी हुई हैं, लेकिन यह ऐसी इकलौती टेक्नॉलॉजी कंपनी नहीं है, जो ब्रिटेन और चीन को जोड़ती है.

चीन की ब्रितानी हाईटेक कंपनियों को लेकर भूख की एक मिसाल तब नज़र आई, जब इसने चिप बनाने वाली कंपनी इमैजिनेशन टेक्नॉलॉजीज को 2017 में ख़रीद लिया था.

ब्रिटेन का चीन में कारोबार

हालाँकि, ब्रिटेन में आने वाली ज़्यादातर पूँजी चीनी कंपनियों और सरकारी समर्थन वाली इकाइयों की है, लेकिन कुछ बड़ी ब्रितानी कंपनियाँ भी चीन में कारोबार कर रही हैं.

एनर्जी, कार उत्पादन, फार्मास्युटिकल्स और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे सेक्टरों में ब्रिटेन की कंपनियों की अच्छी ख़ासी तादाद है.

पिछले साल जर्मनी में चीन के राजदूत ने चेतावनी दी थी कि अगर जर्मनी के 5जी नेटवर्क्स से ख्वावे को बैन किया गया तो जर्मनी की कार कंपनियों को इसके बुरे नतीजे भुगतने पड़ेंगे.

इस बयान से इस बात का डर पैदा हो गया कि चीन दूसरे देशों के साथ इस तरह के हथकंडे अपना सकता है.

शंघाई स्थित मार्केट इंटेलिजेंस फ़र्म इमर्जिंग स्ट्रैटेजी के प्रवक्ता ने कहा, “चीन के लोग पार्टी के बताए गए राष्ट्रीय हितों के आधार पर बहिष्कार करने में काफ़ी आगे रहते हैं.”

लेकिन, चीन में ब्रिटिश चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर स्टीवन लिंच उम्मीद जताते हैं कि इस तरह के हालात से बचा जा सकता है.

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि ब्रिटिश ऑटोमोटिव मैन्युफैक्चरर्स को यूके सरकार के फ़ैसलों के लिए निशाना नहीं बनाया जाएगा.”












BBC

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