भव्य सेट और भव्यतम स्टोरीटेलिंग के साथ संजय लीला भंसाली की हीरामंडी रिलीज हो चुकी है. इस सीरीज में पाकिस्तान के लाहौर में आजादी के पहले की हीरामंडी नाम की एक जगह की कहानी दिखाई गई है. सीरीज की कहानी भले ही काल्पनिक हो, लेकिन उसका सोर्स ओरिजनल है. जैसे सीरीज में शाही जिंदगी जी रही तवायफों की चमकती दुनिया के पीछे का डार्क साइड दिखाया गया है. वैसे ही इस ओरिजनल जगह से जुड़ी एक डार्क कहानी भी है.
ये कहानी सीरीज की तरह काल्पनिक नहीं है. लेकिन इस कहानी में वही दर्द है जो सीरीज में दिखाया गया है. ये कहानी है हीरामंडी की मशहूर तवायफ निग्गो की, जिनको गोलियों से छलनी कर दिया गया था.
आजाद भारत में फिल्में कई जगह बनती थीं. उनमें से दो जगहें मुंबई और लाहौर की अपनी अहम थी. आजादी के बाद पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री लाहौर में ही रही. साल 1947 के बाद पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री ‘लॉलीवुड’ लाहौर में फलाफूला और यहां पंजाबी और उर्दू फिल्में बनने लगीं. अब फिल्म इंडस्ट्री है तो ग्लैमर भी होगा. ग्लैमर की खोज लॉलीवुड को हीरामंडी की मशहूर नरगिस बेगम उर्फ निग्गो तक ले गई.
लॉलीवुड की पहली आइटम गर्ल निग्गो
निग्गो की पाकिस्तानी फिल्मों में शुरुआत साल 1964 में आई ‘इशरत’ से हुई. इसके बाद, 100 से ज्यादा फिल्मों का हिस्सा रही निग्गो ने फिल्मों में शामिल होने के लिए हीरामंडी छोड़ दी और फिल्मों में ही अपना नया करियर ढूंढ लिया. निग्गो एक बेहतरीन डांसर थीं और लोग उनके दीवाने थे. लेकिन हीरामंडी में होने की वजह से बहुत से लोगों को उनकी इस खासियत के बारे में नहीं पता था. हालांकि, फिल्मों में आने के बाद उनका डांस पूरा पाकिस्तान देखने लगा और वो देखते ही देखते स्टार बन गईं.
तवायफों को नहीं थी प्यार करने की मंजूरी पर निग्गो कर गईं ये ‘गुस्ताखी’
साल 1972 में कासू नाम की एक फिल्म आई. फिल्म के निर्माता ख्वाजा मजहर थे. फिल्म बनने के दौरान ही निग्गो और मजहर में प्यार हो गया. दोनों ने शादी भी कर ली. लेकिन ये बात हीरामंडी में रह रही निग्गो की फैमिली को नागवार गुजरी. वजह बड़ी अजीब थी.
पाकिस्तानी न्यूज वेबसाइट डॉन के मुताबिक, ”लाहौर के शाही मोहल्ले की पुरानी परंपरा थी कि यहां काम करने वाली कोई भी लड़की अपने परिवार को मुआवजा दिए बगैर शादी या फिर यात्रा नहीं कर सकती थी.”
खुद की मां और परिवार ने किया इमोशनल ब्लैकमेल
डॉन के मुताबिक, परिवार ने निग्गो को वापस बुलाने की लाख कोशिशें कीं, लेकिन जब सफल नहीं हुए तो मां ने किसी बड़ी बीमारी का बहाना बनाकर निग्गो को मिलने के लिए बुलाया. मां के प्यार के आगे निग्गो को जरा सी भी भनक नहीं लगी कि उन्हें क्यों बुलाया जा रहा है. परिवार ने कहा मां को आखिरी बार देख जाओ.
हीरामंडी पहुंचते ही किया जाने लगा ब्रेनवॉश
जब निग्गो अपने घर पहुंचीं तो उनके परिवार के लोगों ने समझाया कि उनके और उनके पति के लिए ये अच्छा नहीं होगा, इसलिए वापस न जाएं. घर वालों के इमोशनली ब्लैकमेल करने के बाद निग्गो टूट गईं और उन्होंने अपने शौहर के पास वापस जाने से मना कर दिया.
पति ने भी लगा दी वापस लाने में पूरी ताकत
मजहर को जब पता चला कि निग्गो नहीं आ रही हैं, तो उन्होंने अपनी फिल्मों के लिए काम करने वाले प्रोडक्शन कंट्रोलर जिनका नाम मम्मा था, उनको भेजा ताकि वो निग्गो को समझाकर वापस ले आएं. इस काम के लिए म्यूजिक डायरेक्टर मंजूर अशरफ को भी भेजा गया, लेकिन दोनों ही लोग निग्गो को वापस नहीं ला सके.
प्यार ही बन गया जहर
फिर वो दिन आया जब निग्गो की जिंदगी का प्यार ही उनके लिए जहर बन गया. 5 जनवरी 1972 का वो दिन हर दिन की तरह ही था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि ये दिन निग्गो की जिंदगी का सबसे मनहूस दिन होने वाला था. निग्गो के पति ख्वाजा मजहर स्टेनगन (ऐसी बंदूक जिससे एक साथ कई राउंड फायर होती है) लेकर पहुंच गए और अंधाधुंध फायर करना शुरू कर दिया. उन्होंने अपनी बीवी पर गोलियों की बारिश कर दी. निग्गो की आखिरी सांसें बस इसी दिन तक थीं फिर वो इतिहास के पन्नों में कहीं दब कर रह गईं.
निग्गो की मां ने दिलाई मजहर को सजा
बेटी की मौत के बाद निग्गो की मां ने कसम खाई कि वो मजहर को सजा दिलाएंगी. मजहर पकड़ा गया और उसे कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुना दी. पब्लिक ट्रायल के दौरान मीडिया और लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. ऐसा हुजूम इसके पहले और इसके बाद कुछ ही बार देखा गया. ये दर्दनाक कहानी हीरामंडी में फंसी उन सैकड़ों तवायफों की छटपटाहट की कहानी है, जिनका रहन-सहन तो राजकुमारियों जैसा था. लेकिन वो अंदर ही अंदर जल रही थीं.
source abp news
