14 अगस्त 2022 | वर्क लाइफ बैलेंस के होने से तनाव कम होता है, बर्न आउट नहीं होता। तनाव का कर्मचारियों की सेहत पर सीधा असर होता है। जो कर्मचारी ओवरटाइम काम करते हैं उनके बर्न आउट होने की संभावना भी ज्यादा होती है। बर्न आउट की वजह से थकान, मूड स्विंग और चिड़चिड़ाहट पैदा हो जाती है जिसका असर उनके परफॉर्मेंस पर होता है। वर्क लाइफ बैलेंस बनाने के कोई भी कंपनी ज्यादा प्रोडक्टिव वर्क फोर्स तैयार कर पाती है।
सबसे ज्यादा जरूरी प्राथमिकताएं तय करना
वर्क लाइफ बैलेंस को सुधारने के लिए जो सबसे ज्यादा जरूरी है वो है प्राथमिकताएं तय करना। जिन कर्मचारियों को इसमें अपने मैनेजर्स का सहयोग नहीं मिलता है वो अपने वर्क लाइफ बैलेंस से संतुष्ट नहीं होते हैं। प्राथमिकताएं तय करके आप स्टेबिलिटी बना पाते हैं। वर्क लाइफ बैलेंस बनाने के लिए यही सबसे जरूरी है। इस तरह टीम नियंत्रण में रहना सीखती है, गैरजरूरी कामों को ना कहना सीखती है। इसका नतीजा ये होता है कि मीटिंग्स कम हो जाती हैं, काम पर फोकस बढ़ जाता है और टाइम-ऑफ लेने की आजादी मिल जाती है।
मीटिंग्स का रि-इवैल्यूएशन जरूरी
- मीटिंग्स के दौर के बीच में एक ब्रेक या ब्रीदर प्लान करें जिसमें कर्मचारियों को पानी पीने का और अगले विषय के लिए तैयारी करने का मौका मिले। माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार मीटिंग्स के बीच यदि 5 से 10 मिनट का ब्रेक भी मिल जाता है तो कर्मचारियों का स्ट्रेस लेवल कम होता है, फोकस बढ़ता है।
- जहां तक हो सके मंडे मीटिंग्स न रखें। मंडे को मीटिंग रखने से कर्मचारियों को वीकेंड में मीटिंग का तनाव होने लगता है। वीक के बीच में ही मीटिंग प्लान की जा सकती है। माइक्रोसॉफ्ट में नो-मीटिंग फ्राइडे भी घोषित किए जाते हैं जिसमें कर्मचारी वीकेंड से पहले अपने आप को काम से पूरी तरह अनप्लग कर सकें।
- माइक्रोसॉफ्ट में हाल ही में हुई एक रिसर्च बताती है कि लंबी मीटिंग्स में मल्टी टास्किंग होती है। शोध में पाया गया कि अक्सर जिन मीटिंग्स में कर्मचारियों की दिलचस्पी नहीं होती या उनमें वो मल्टी टास्किंग करते हैं। इसलिए बहुत जरूरी है ये जानना कि मीटिंग को असरदार कैसे बनाया जाए। क्या उनका समय घटाया जाए? या कम लोगों को बुलाया जाए? मीटिंग रखी भी जाए या नहीं?
फोकस बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें
काम को प्राथमिकता देने और मीटिंग्स छोटी करके टीम कोने काम पर फोकस बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें। ज्यादा फोकस टाइम मतलब ज्यादा तरक्की। इसका ये भी मतलब है कि आफ्टर आवर्स में काम न करना।
टाइम ऑफ लेना जरूरी
जो काम से अनप्लग करना सीख लेता है वही वर्क लाइफ बैलेंस बना पाता है। वेकेशन, स्टेकेशन, सिक डे, मेंटल हेल्थ डे, रेस्ट, रीचार्ज, लोगों के लिए अलग-अलग मायने रखते हैं। अपनी टीम को यह समझाएं कि टाइम ऑफ लेने के कई कारण हो सकते हैं और उनकी सेहत भी प्राथमिकता है जिसके लिए समय निकालना जरूरी है।
ऐसा है एपल का वर्क लाइफ बैलेंस
एपल के ज्यादातर कर्मचारी वहां के वर्क लाइफ बैलेंस से संतुष्ट हैं। हालांकि कई बार जब प्रोजेक्ट की डेडलाइन कठिन होती है तो कर्मचारियों को आफ्टर आवर्स रुकना पड़ता है। लेकिन इन घंटों को बाद में एडजस्ट कर लिया जाता है। ज्यादातर टीम एपल के वर्क आवर्स एंजॉय करती हैं। कर्मचारियों को लंबे समय तक काम नहीं करने दिया जाता है। कंपनी कर्मचारियों को पेड वेकेशन भी देती है। कई टीमों को फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स भी दिए जाते हैं। कई टीम को रिमोट वर्किंग करने की भी छूट मिली हुई है। मेटरनल और पैटर्नल लीव भी दी जाती हैं।
गूगल का वर्क लाइफ बैलेंस
गूगल में कर्मचारियों को ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर दिया जाता है। रिक्रिएशनल एक्टिविटीज भी हैं। गेमिंग रूम, मूवी रूम, जिम पेड वेकेशन और काउंसिलिंग सर्विस भी मिती है। गूगल के 70 प्रतिशत कर्मचारी उनके वर्क लाइफ बैलेंस से संतुष्ट हैं। करीब 56 प्रतिशत कर्मचारी 8 घंटे या उससे कम ही काम करते हैं। वहीं 11 प्रतिशत कर्मचारियों का दिन अक्सर लंबा होता है। ज्यादातर गूगल कर्मचारी उनके वर्क लाइफ बैलेंस से संतुष्ट हैं और बर्न-आउट महसूस नहीं करते। हालांकि बिजनेस डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के कुछ कर्मचारियों को लगता है कि उनके वर्क लाइफ बैलेंस में अभी और सुधार होना चाहिए।
सोर्स :- “दैनिक भास्कर”
