बिहार चुनाव में ये फूल काँटे की तरह क्यों चुभ रहे हैं?
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बिहार चुनाव में ये फूल काँटे की तरह क्यों चुभ रहे हैं?

रूपा देवी, फूल किसान हैं और बीते 10 साल से गेंदा, चेरी, मीना, मुंगड़ा आदि की खेती करती हैं. उनके पति हरियाणा में काम करते हैं और तीन बच्चों की माँ रूपा एक एकड़ का खेत 16,000 रूपए सालाना पट्टे पर लेकर खेती करती हैं. लेकिन ये साल इनके लिए बहुत बुरा गुज़र रहा है.

वो बताती हैं, “मार्च से जो लॉकडाउन के बाद स्थिति हुई, वो अभी तक ऐसे ही चल रही है. चुनाव का भी कोई असर नहीं. सारा फूल खेत में लगे-लगे सड़ गया. मज़दूरों ने 150 रुपए मज़दूरी ले ली और खेत के मालिक ने फसल क्षति का मुआवज़ा ले लिया. हम जैसे पट्टा पर काम करने वाले किसानों के हाथ कुछ नहीं आया.”

चुनाव बेरंग है

बिहार के नालंदा ज़िले के इस्लामपुर के गुलज़ारबाग की रूपा देवी की तरह ही दूसरे फूल किसान भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. इस्लामपुर में गुलज़ारबाग के अलावा अमनामां, बूढ़ा नगर, संडा, ढेकवारा सहित कई गाँव में मालाकार जाति के लोग फूलों की खेती करते है.

अमनामां गाँव की बुर्जुग दंपती बुल्लु देवी और नागेश्वर भगत ने अपनी पूरी उम्र फूलों की खेती में गुज़ार दी. इस बार पहले लॉकडाउन ने उनकी कमर तोड़ी, फिर बाढ़ के पानी ने फूलों को सड़ा दिया.

64 साल की बुल्लू देवी कहती हैं, “वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड से किसी तरह काम चलाते हैं, वरना तो हम बूढ़ा-बूढ़ी भूखे मर जाएँ.”

उनके बगल में ही बैठे नागेश्वर भगत कहते हैं, “चुनाव आता था, तो हम लोगों को बस यही फ़ायदा होता था कि डिमांड बढ़ जाती थी. ज़्यादा फ़ायदा पैकार (फूल किसान और व्यापारी के बीच की कड़ी) को ही होता है. लेकिन अबकी बार तो कोरोना के चलते चुनाव में भी कोई रंग नहीं. सब लोग एक दूसरे से दूरी बनाए हुए है. तो फूल माला का क्या होगा.”

अमनामां गाँव में 40 फूल किसान है. गाँव के संजीव मालाकार, रेणु देवी, सोनिया देवी, नीलम देवी, सूबेलाला मालाकार, बैजयंती देवी, कांति देवी, किरन देवी सहित दर्जनों किसानों की यहीं कहानी है.

चुनाव में फूलों की मांग को लेकर सवाल पूछने पर ये किसान बताते है कि उनके लिए सबसे अच्छा वक़्त तब होता है, जब मुखिया का चुनाव होता है. गुलज़ारबाग के मनोज मालाकार कहते है, “उस वक़्त गाँव में ही हमसे डायरेक्ट ख़रीदारी होती है. इसलिए सारा फ़ायदा हमारा होता है. जिसको माला चाहिए, वो सीधे हमारे पास आकर ख़रीद लेता है.”

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क़र्ज़ में डूबे किसान

अमनामां की किरन देवी के पति विजय मालाकार की मौत 15 बरस पहले हो गई थी. वो बताती हैं, “पति के पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा तो उन्हें पीएमसीएच (तकरीबन 80 किलोमीटर दूर) इलाज के लिए ले गए. लेकिन इमरजेंसी में उन्होंने दम तोड़ दिया.”

पति की मौत के एक साल बाद उन्होंने अपने पाँच बच्चों को पालने के लिए फूल की खेती शुरू की. फ़िलहाल वो 20 कठ्ठे का खेत पट्टे पर लेकर खेती कर रही हैं. वो बताती हैं, “बैशाख वाला फूल खेत में सड़ गया, आषाढ़ वाला पानी में डूब गया. एक रुपया भी कमाई नहीं हुई, उल्टे कर्ज़दार हो गए.”

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किरन के पति विजय मालाकार फूलों की खेती नहीं करते थे, लेकिन पति की मौत के बाद किरन ने फूलों की खेती की. वजह पूछने पर वो कहती हैं, “यही एक काम मायके में सीखा था, तो जब मुश्किल आई तो यही काम करने का मन बनाया.”

लेकिन क्या नई पीढ़ी की लड़कियाँ भी ऐसा ही सोचती हैं?

अमनामां गाँव की 12वीं की छात्रा रूपा कुमारी और नौंवी की छात्रा निशू कुमारी कहती है, “घर में फूलों की खेती होती है इसलिए इसके बारे में सब कुछ पता है. लेकिन हम लोग कभी ये काम नहीं करेंगें. ये बहुत बेकार काम है.”

आदमी से ज़्यादा फूल को चाहिए दवा

फूलो की खेती के लिए ‘चारा’ (छोटे पौधे) कोलकाता से आता है. सुरेश मालाकार बताते हैं, “एक हज़ार का चारा लाने में 600 रुपए ख़र्च हो जाते है. इस बार लॉकडाउन में ट्रेन नहीं चल ही थी, तो ख़र्चा बढ़ गया.” तीन से छह महीने की फसल में एक बीघा में 15 से 20 हज़ार पौधे लगते हैं. प्रत्येक पौधों की जड़ों में मिट्टी चढाई जाती है.

फूल किसान बताते हैं कि किसी भी दूसरी फ़सल की तुलना में फूलों की खेती में खाद/दवा ज़्यादा पड़ती है.

बैजयंती देवी बताती है, “आदमी को उतनी दवा नहीं मिलती होगी, जितनी फूलों को डालते हैं. इस फ़सल को हर हफ़्ते दवा चाहिए.” तीन माह के अंदर फसल तैयार होने के बाद 52 फूलों की एक ‘लड़ी’ तैयार की जाती है. ये ‘लड़ी’ फूल किसान ख़ुद ट्रेन, बस या दूसरी सवारी से राज्य की राजधानी पटना की मंडी में पैकार को बेचते हैं.

पैकार पवन मालाकार बताते है, “ये बहुत कच्चा बिज़नेस है. यानी हमको बहुत कम समय में फूल व्यापारी को बेचना है, इसलिए हम लोग ख़ुद 10-20 रुपए का फ़ायदा लेकर इसे बेच देते है. सस्ते में नहीं बेचेंगें, तो फूल बेकार हो जाएँगे और फिर ऐसे ही फेंक देने के अलावा कोई विकल्प नहीं.”

फूलों की कोई स्थायी मंडी नहीं

बिहार में कोई भी स्थायी फूल मंडी नहीं है. राजधानी पटना की बात करें, तो यहाँ हार्डिंग रोड में फुटपाथ पर ही पैकार व्यापारियों को फूल बेचते है. फुटपाथ पर लगी इस मंडी मे ज़ाहिर तौर पर ना तो कोई शौचालय, ना शेड और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था है. बिहार के अंदरूनी इलाक़ों के अलावा कोलकाता से भी यहाँ फूलों की सप्लाई होती है.

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माली (मालाकार) कल्याण समिति के पटना जिलाध्यक्ष मनोज कुमार बताते हैं, “पटना में स्थाई मंडी खुले, इसके लिए हमने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, संबंधित विभाग से लेकर सांसद तक को ज्ञापन दिया है. लेकिन आज तक कोई समाधान नहीं हुआ. ना तो ये लोग समाधान करते है और ना ही चुनाव में टिकट देते है. लेकिन अबकी बार हम लोग अपना निर्दलीय कैंडिडेट गोपाल प्रसाद मालाकार को चुनाव में उतार रहे हैं.”

मनोज के मुताबिक़, नालंदा, पटना, गया, जहानाबाद, पूर्णिया, वैशाली, औरंगाबाद, दरभंगा सहित उन सभी ज़िलों में फूल की खेती होती है, जहाँ मालाकार जाति के लोग है. अत्यंत पिछड़ा वर्ग से आने वाले इस समाज की 75 फ़ीसदी आबादी फूल की खेती और फूल डेकोरेशन के काम से ही जुड़ी है.

नेता बनने के लिए फूल चाहिए, लेकिन किसान का दर्द अनसुना

रौशन कुमार युवा किसान हैं. आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर फूलों की खेती करनी शुरू कर दी. उनकी उम्र महज 24 साल है. वो कहते है कि इस काम में कोई फ़ायदा नहीं है, लेकिन हम सबकी मुश्किल ये है कि हमने कोई दूसरा काम नहीं सीखा.

रौशन कहते है, “देखिए मरना हो, जीना हो, नेता बने, अफ़सर बने, जीवन का कोई भी फ़ंक्शन हो, सबके लिए फूल चाहिए. लेकिन वो फूल पैदा कैसे होता है, कौन उसे पैदा करता है, इससे किसी को मतलब नहीं. चुनाव आया है, लेकिन कोई नेता हमसे मिलने नहीं आया. इसी से समझ लीजिए हमारी क़ीमत क्या है?”















BBC

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