15 फ़रवरी 2023 | पेड़ों में जान होती है, यह तो सदियों पहले से माना जाता था. लेकिन उसे वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध करने में काफी समय लगा. इसी तरह की कई धारणाएं हैं जो अभी तक सिद्ध नहीं हैं, लेकिन चर्चित हैं और कई लोगों को लगता है कि वे वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध (Scientifically proven) भी की जा चुकी हैं. ऐसी ही एक धारणा के बारे में नए अध्ययन में विश्लेषण किया है कि जंगल में पेड़ (Forest Trees) आपस में बात कर करते हैं और उनका संचार माध्यम जमीन के अंदर की फफूंदों के तंतुओं (Filaments of Fungi) का एक तंत्र होता है. अध्ययन में कहा गया है कि यह अभी सिद्ध नहीं किया जा सका है.
विशेषज्ञ की चेतावनी
यह अवधारणा अजीब लेकिन आकर्षक लगती है और मीडिया और लोगों में चर्चित भी है यहां तक कि लोकप्रिय एपल टीवी शो टेड लासो में भी इसका जिक्र हो चुका है. लेकिन अल्बेर्टा यूनिवर्सिटी की विशेषज्ञ जस्टीन कार्स्ट इसको लेकर चेताती हैं कि इस सबके पीछे का विज्ञान अभी सिद्ध नहीं हो सका है.
जड़ों को जोड़ कर रखना
नेचर्ल इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन जर्नल में यह सहकर्मी समीक्षित लेख 13 फरवरी को प्रकाशित हुआ है. इसमें कार्स्ट और उनके सहयोगियों ने जमीन के नीचे की फफूंद के बारे में लोकप्रिय दावों पर अपने विचार रखे. जमीन के नीचे की फफूंद की नइन क्षमताओं को कॉमन मायकोरिजाल नेटवर्क या सीएमएन कहते है. इनके बारे में कहा जाता है कि ये जड़ों का आपस में जोड़ कर रखते है.
यह समझना जरूरी
कार्स्ट यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बेर्टा में एग्रीकल्चर, लाइफ एंड एनवायर्नमेंटल साइंसेस फैकल्टी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनका कहना है कि यह बहुत अच्छी बात है कि सीएमएन पर शोध ने जंगल की फफूंद मे दिलचस्पी पैदा करने का काम किया है , लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि लोगों को समझना होगा कि इससे संबंधित बहुत से लोकप्रिय विचार विज्ञान से आगे हैं.
पड़ताल करने का फैसला
दिलचस्प बात यह है कि सीएमएन के अस्तित्व को वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया जा चुका है, लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ किया कि इस बात के कोई मजबूत प्रमाण नहीं मिले हैं कि उनसे पेड़ों को या उनके अंकुरों को भी कोई फायदा मिलता है. इसी दावे का परीक्षण करने के लिए कार्स्ट और उसके सहयोगियों ने यह शोध किया.
पर्याप्त प्रमाण नहीं, लेकिन
कार्स्ट और उनके सह लेखकों, ओकानागैन की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया की मिलेनी जोन्स और मिसिसिपी यूनिवर्सिटी के जेसन होएकसेमा ने फील्ड में किए अध्ययनों से मिले प्रमाणों की समीक्षा की और पाया कि सीएमएन के जंगलों में व्यापक तौर पर को पाए जाने के प्रमाण पर्याप्त रूप समर्थन नहीं हैं ना ही उनकी संरचना और उनके कार्यों के बारे में पता चला है, लेकिन वैज्ञानिकों ने यह भी माना का बहुत कम जंगलों की पड़ताल हुई है.
मिली जुली धारणा
दूसरे दावे में कहा जाता है कि वयस्क पेड़ अंकुरों को सीएमएन के जरिए पोषण और अन्य संसाधन मुहैया कराते हैं और वे उनके अस्तित्व के बने रहने और वृद्धि में मददगार होते हैं. शोधकर्ताओं ने इस पर कुछ प्रमाणिक नहीं पाया. 26 अध्ययनों, जिनमें से एक में खुद कार्स्ट सहलेखक हैं, की समीक्षा में शोधकर्ताओं ने पाया है कि जहां पेड़ों में जमीन के नीचे से संसाधनों का स्थानांतरण होता है, इसमें सीएमएन की भूमिका नहीं होती है.
उन्होंने यह भी देखा कि पेड़ों और अंकुरों के सीएमएन की पहुंच का फायदा नहीं होता है. लेकिन ऐसे कोई प्रमाण नहीं पाए गए जो इस दावे की पुष्टि करते हैं कि पेड़ सीएमएन के जरिए कीड़ों के आने के खतरे जैसी चेतावनी आदान प्रदान करने का काम करते हैं. शोधकर्तों का मानना है कि विज्ञान के बारे में गलत धारणाएं ना केवल जंगलों के बारे में नीतियां बनाने में गड़बड़ियां पैदा क सकती हैं, बल्कि उनके प्रबंधन को भी समस्याकारक बना सकती हैं.
सोर्स :-“न्यूज़ 18 हिंदी|”
