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यह साधु-मान्यता हिंदी पट्टी की घुट्टी में है कि आप बस लिखिए, बाकी का काम आपका नहीं

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31 मई 2022 | हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद को इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार मिलने के बाद एक ओर हिंदी की दुनिया में खुशी है, दूसरी ओर चंद सवाल भी। खुशी इस बात की कि आखिरकार हिंदी की किसी कृति को इस योग्य माना गया। इससे इस भाषा, बल्कि कहें कि भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे फिक्शन और बड़े पैमाने पर साहित्य-लेखन को दुनिया गम्भीरता से लेगी एक बड़े पुरस्कार से अनेक का रास्ता निकलेगा। सवाल यह है कि इस अदद पुरस्कार को पाने के लिए हिंदी को इतना इंतजार क्यों करना पड़ा? इस सवाल का एक वाजिब जवाब यह है कि हिंदी के श्रेष्ठ लेखन को भी अच्छे अनुवादक नहीं मिल पाते। प्रकाशक इस बात की बहुत कम परवाह करते हैं कि मूल भाषा के बाद उस कृति के लिए दूसरी भाषा में भी गुंजाइश बने।

अगर किसी समर्थ प्रकाशक ने ऐसा किया भी तो वह अनुवाद की गुणवत्ता को लेकर सजग नहीं रहता। उसकी निगाह रहती है एक मशहूर कृति और लेखक के नाम को दूसरी भाषा के किताब-बाजार से लेकर सरकारी-खरीद तक भुनाना। यही वजह है कि प्रकाशक अच्छे अनुवाद की सम्भावनाओं, उस पर होने वाले श्रम और खर्चे का सही-सही भुगतान न करके एक चलताऊ-बिकाऊ जुगाड़ से अनूदित किताब मुहैया करा देता है।गीतांजलि श्री का उपन्यास बड़भागी था कि उसे फ्रेंच में आनी मान्तो और अंग्रेजी में डेजी रॉकवेल जैसे प्रसिद्ध अनुवादक मिले। इन अनुवादकों की अपने काम में गहरी निष्ठा है इसलिए ये कृति के साथ वैसा न्याय कर पाए, जिसकी वह हकदार है। दुर्भाग्य से हिंदी की किताबों को लेकर इस स्तर की बहुभाषिक आवाजाही बहुत कम है। दूसरे, अनुवादकों से अटी पड़ी दुनिया में हिंदी की ओर ध्यान दिलाने वाले लोग कम हैं।

जिस ‘बुक एजेंट’ या भाषाओं के बीच ‘मैचमेकर’ की बात अंग्रेजी में सगर्व की जाती है, हिंदी में आकर वह एक विपदा या शर्म की बात हो जाती है। यह साधु-मान्यता हिंदी पट्टी की घुट्टी में है कि आप बस लिखिए, बाकी का काम आपका नहीं है। इसी ‘सधुक्कड़ी’ का नतीजा लेखकों को रॉयल्टी में घपले से लेकर घटिया अनुवाद के रूप में मिलता रहा है। दरअसल, हिंदी में अनेक लेखक प्रकाशन और अनुवाद की दुनिया के ‘दूर-दर्शक’ भर हैं और अपनी इस दूरी का वे भरसक ‘प्रचार’ भी करते हैं। होना यह चाहिए कि वे पूरी प्रक्रिया में बराबर के किरदार की तरह हिस्सा लें। अनुवाद को सिर्फ अनुवादक या प्रकाशक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे मामले भी हैं, जिनमें लेखक कृति के अनुवाद का अधिकार अपने पास रखते हैं।

तब उनकी यह जिम्मेदारी भी बनती है कि मूल भाषा से निकलकर किताब जब दूसरी भाषा और भूगोल में जाए, तो उससे पहले वह सधे हाथों से गुजरे जरूर। लेकिन ज्यादातर मामलों में लेखकीय मनोकामना यह रहती है कि किसी तरह अनुवाद हो जाए, ताकि ब्लर्ब में यह सूचना भी जोड़ी जा सके कि हिंदी के अलावा फलां-फलां भाषाओं में भी अनूदित! उस अनुवाद का क्या उत्तर-जीवन है, इसकी परवाह बहुत कम लेखकों को होती है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अनुवाद में किसी भी किस्म का हल्कापन या ढील कृति-विशेष के बारे में नहीं, मूल भाषा में रचे जा रहे साहित्य के बार में भी बाहर की दुनिया में नए और देर तक न मिटने वाले पूर्वग्रहों को जन्म देते हैं। हिंदी में ऐसे लेखकों की एक लम्बी फेहरिस्त बनाई जा सकती है, जिनकी किताबें यदि सही ढंग से अंग्रेजी अनुवाद में आतीं, तो इस भाषा को बुकर सरीखा पुरस्कार शायद बहुत पहले मिल जाता।

लेकिन इस देरी के बावजूद हिंदी के हिस्से अनुवाद के जरिए जो अब आया है, वह काबिले-दाद है। बुकर मिलने से हिंदी-टेक्स्ट की तरफ अब अनुवादक कुछ और आदर से देखेंगे। उस पर धैर्य से जुटकर काम करेंगे। लेखक मूल भाषा के बाद कृति की दूसरी भाषा में गृहस्थी के लिए अधिक सजग होंगे। इससे यकीनन स्थितियां बदलेंगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनूदित हिंदी कृतियां सराहना ज्यादा बड़े सम्मान की हकदार बनेंगी। बुकर जैसा सौभाग्य तब बरसों-बरस में एक बार का मामला नहीं रह जाएगा। बुकर पुरस्कार मिलने से हिंदी-टेक्स्ट की तरफ अब अनुवादक कुछ और आदर से देखेंगे। उस पर धैर्य से जुटकर काम करेंगे। लेखक मूल भाषा के बाद कृति की दूसरी भाषा में गृहस्थी के लिए अधिक सजग होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Source;- ‘’दैनिकभास्कर’’


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