19 अप्रैल 2023 | रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर दुनिया में हर संघर्ष की खबर को विश्व युद्ध की चिंगारी बनने की संभावाना पर विश्लेषण शुरू हो जाता है. ऐसे में सूडान में सत्ता पर कब्जा करने के लिए सेना और अर्द्धसैनिक बलों के बीच संघर्ष पर चिंता अस्वाभाविक नहीं है. फिलहाल सूडान में हालात चिंताजनक हैं और स्थिति यह हो गई है कि वहां रहने वाले भारतीयों को सलाह दी गई है कि वे घर से बाहर ही ना निकलें. तो क्या यूक्रेन की तरह सूडान में भी क्या भारतीयों को निकालने की नौबत आने की स्थिति बन रही है. ऐसे सभी सवालों के लिए यह समझना जरूरी है कि सूडान का संकट है क्या और उसके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव क्या होंगे.
किसके बीच है संघर्ष
सूडान का संकट दरअसल सैन्य सत्ता के दो प्रमुख हिस्सों के बीच शक्ति संघर्ष का नतीजा है. एक तरफ देश के शासन की बागडोर संभाले हुए जनरल अब्देल फत्ताह बुरहान और उनके प्रति वफादार सैन्य बल हैं तो दूसरी तरफ रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (आरएसएफ), अन्य हथियार बंद सैन्य समूह, है जो पूर्व जनरल मोहम्म्द हमदान दागालो के साथ है.
पुरानी है जड़ें
संघर्ष की जड़ें कई साल पुरानी हैं जब ओमर अल बशीर नाम के तानाशाह को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था. बताया जाता है कि बशीर ने ही इस तरह से जानबूझ कर सैन्य तंत्र की रचना की थी जिससे सेना उनके खिलाफ कभी एक ना हो सके. यही वजह है कि जब बशिर की सत्ता गिरने के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करने के प्रयास हुए संघर्ष शुरू हो गया जो कि अनपेक्षित नहीं था. राजधानी खार्तूम के राजनयिकों ने 2022 के शुरुआत में ही चेता दिया था कि ऐसे हिंसक संघर्ष हो सकता है.
तो अभी कैसे हैं हालात
हाल के ही कुछ हफ्तों में ये संघर्ष बहुत बढ़ गया है और स्थिति बहुत ही तनावपूर्ण हो गई है. हालांकि दोनों पक्षों ने 24 घंटे का संषर्ष विराम कर कुछ राहत दी है, लेकिन अनिश्चितता अभी कायम है कि यह संघर्ष किस हद तक जाएगा. ऐसे में जब खबरें आईं कि भारतीय दूतावास ने भारतीयों को घर में ही रहने की सलाह दी है, भारत में चिंताएं पैदा हो गईं.
कैसे बनी थी आरएसएफ
आरएसएफ की स्थापना बशीर ने दारफूर विद्रोहियों को कुचलने के लिए की थी जो 20 साल से भी ज्यादा समय पहले से सूडान की केंद्रीय सरकार के द्वारा स्थानीय लोगों को राजनैतिक और आर्थिक अलग-थलग करने की वजह पनपे थे. जानजवीद के नाम से मशहूर आरएसएफ व्यापक अत्याचारों के लिए भी जाने जाते थे.
आरएसएफ और सत्ता में सेना
ये बशीर ही थे जिन्होंने 2013 में जानजवीद को एक अर्द्धसैनिक बल में तब्दील कर उनके नेताओं को दारफूर में विद्रोहियों को कुचलने से पहले सैन्य पदवियां देने का काम किया था. इसके बाद उन्होंने इन्हीं सैनिकों को लीबिया और यमन के हिंसक संघर्षों में भी भेजा था. आरएसएफ और बुरहान समर्थित सेना ने ही मिलकर 2019 में बशीर को सत्ता से बाहर करने का काम किया था. शुरू में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार बनने में सहयोग की बात की, लेकिन अक्टूबर 2021 में सेना ने सत्ता अपने हाथ ले ली.
वर्तमान संघर्ष की वजह
अहम बात यह है कि स्थानीय बशीर के जाने के बाद स्थानीय लोगों को फिर से वैसे ही वैसे ही विरोध और संघर्ष करना पड़ा जैसे वे बशीर को हटाने के लिए कर रहे थे. फिर धीरे धीरे बुरहान और आरएसएफ के बीच तनाव सतह पर आने लगा. आरएसएफ के प्रमुख दागलो के पास सोने के अवैध खदानें, और भारी संख्या में सैन्य बल भी है और सरकार में उनका प्रमुख स्थान भी है. लेकिन आरएसएफ के सेना में विलय पर समस्या पैदा हो गई जिसका विरोध होने लगा. आरएसएफ के साथ होने वाली जांच की मांग केवल सूडान के लोग ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है.
सूडान की स्थिति लाल सागर के पास है जिससे यह अफ्रीका का एक संवेदनशील हिस्सा माना जाता है. यहां के विवादों का असर पास के इथोपिया, चाड, दक्षिण सूडान ( जो अलग देश है) पर भी देखने को मिलता है. खास तौर पर से सूडान और इथोपिया के संबंध खासे तनावपूर्ण हैं. इसके अलावा रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई और देशों का भी यहां प्रभाव है. यहां भी रूस और अमेरिका एक तरह से विरोधी ताकतों के पीछे नजर आते दिखते हैं. लेकिन फिलहाल तो यह दो जनरलों के बीच का संघर्ष ज्यादा है और अनिश्चितताएं ज्यादा आशंकाएं पैदा कर रही हैं. फिलहाल हालात बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हैं. लेकिन ऐसा कब तक नहीं रहेगा यह भी कहा नहीं जा सकता है. दोनों पक्षों केबीच में हाल ही में हुआ 24 घंटे का युद्धविराम जल्दी ही स्थिति स्पष्ट होने उम्मीद जगा रहा है.
सोर्स :-“न्यूज़ 18 हिंदी|”
