• June 6, 2026 9:44 am

मृत्यु के बाद क्यों चुरा लिया गया था आइंस्टीन का दिमाग, अब भी जार में रखा है

Share More

19 अप्रैल 2023 |  जर्मनी के महान भैतिक विज्ञानी अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन को जब आखिरी समय में अस्‍पताल ले जाया जा रहा था, तो उन्‍हें पता था कि अब उनके पास ज्‍यादा समय नहीं बचा है. अस्‍पताल पहुंचने पर पर 76 वर्षीय आइंस्‍टीन ने डॉक्‍टर्स से कहा कि अब मुझे किसी तरह की मेडिकल सपोर्ट की जरूरत नहीं है. उन्‍होंने कहा, ‘मैं जब चाहूं तब चले जाना चाहता हूं. बनावटी जीवन जीने में कोई आनंद नहीं है. मैं अपने हिस्‍से का काम कर चुका हूं. अब मेरे जाने का वक्‍त आ गया है. मैं पूरी निष्‍ठा के साथ अब जाना चाहता हूं.’

जब 18 अप्रैल 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन की पेट की गंभीर समस्‍या के चलते मृत्यु हो गई, तो उन्होंने अपने पीछे एक अद्वितीय विरासत छोड़ी थी. घुंघराले बालों वाला वैज्ञानिक 20वीं शताब्दी का प्रतीक बन गया था. महान आर्टिस्‍ट चार्ली चैपलिन से उनकी गहरी दोस्‍ती थी. वह उन लोगों में से थे, जो सत्तावाद के रूप में फैल रही नाजी जर्मनी से बच निकले और भौतिकी के नए मॉडल का नेतृत्व किया.

आइंस्टीन उस दौर में इतने सम्मानित व्‍यक्ति थे कि उनकी मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद उनके शव से उनका मस्तिष्क चुरा लिया गया था. फिर उनके दिमाग को एक डॉक्टर के घर में जार में रख दिया गया था. हालांकि, उनके जीवन और उनके कार्यों को सावधानी से संजोया गया. फिर भी आइंस्टीन की मृत्यु और बाद में उनके मस्तिष्क की विचित्र यात्रा आज भी लोगों को चौंकाती है.

सबसे कीमती माना गया आइंस्‍टीन का दिमाग
आइंस्टीन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी में वुर्टेमबर्ग के उल्म में हुआ था. धर्मनिरपेक्ष माता-पिता की संतान आइंस्टीन लंबे समय तक सिर्फ एक लक्ष्यहीन मध्यवर्गीय यहूदी युवा थे. इसके बाद उन्होंने 1915 में सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत विकसित किया. इसके छह साल बाद यानी 1921 में उन्‍हें भौतिकी के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला. इससे पहले पांच साल की उम्र में पहली बार कम्पास से उनकी मुलाकात हुई थी. उन्‍हें कम्‍पास देखकर बहुत आश्‍चर्य हुआ था. हालांकि, इसने उनके मन में ब्रह्मांड की अदृश्य शक्तियों के प्रति आजीवन आकर्षण को जन्म दिया. इसके बाद 12 साल की उम्र में उनकी मुलाकात ज्यामिति की किताब से हुर्द. इसे वह प्यार से अपनी ‘पवित्र छोटी ज्यामिति पुस्तक’ कहते थे.

टीचर ने कहा, तुम्‍हारा जीवन में कुछ नहीं होगा
इसी समय के आसपास आइंस्टीन के शिक्षकों ने उनके बारे में कहा था कि तुम्‍हारा जीवन में कुछ नहीं नहीं हो सकता. इसके सबके बाद भी आइंस्टीन की बिजली और प्रकाश को लेकर जिज्ञासा बढ़ती गई. उन्‍होंने 1900 में स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से ग्रेजुएट की डिग्री ली. अपनी जिज्ञासु प्रकृति और अकादमिक पृष्ठभूमि के बावजूद आइंस्टीन को शोध के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. वर्षों तक बच्चों को ट्यूशन देने के बाद एक दोस्त के पिता ने आइंस्टीन को बर्न में एक पेटेंट कार्यालय में क्लर्क के पद के लिए सिफारिश की. नौकरी मिलने के बाद आइंस्टीन ने बपनी प्रेमिका से शादी की, जिनसे दो बच्चे हुए. इस बीच आइंस्टीन अपने खाली समय में ब्रह्मांड के बारे में सिद्धांत तैयार करते रहे.

आइंस्‍टीन के सवाल और चैपलिन के जवाब
भौतिकी समुदाय ने शुरू में उनकी उपेक्षा की, लेकिन उन्होंने सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भाग लेकर ख्याति हासिल करनी शुरू कर दी. आखिर में उनको सफलता मिली और 1915 में उन्होंने सापेक्षता के अपने सामान्य सिद्धांत को पूरा किया. उन्‍हें दुनियाभर में एक महान विचारक के रूप में सम्‍मान मिलना शुरू हो गया. शिक्षाविदों और हॉलीवुड की मशहूर हस्तियों के साथ उनकी गहरी मित्रता होने लगी थी. चार्ली चैपलिन ने एक बार उनसे कहा था, ‘लोग मेरी सराहना करते हैं, क्योंकि हर कोई मुझे समझता है. वहीं, लोग आपकी सराहना करते हैं, क्योंकि कोई भी आपको समझ नहीं पाता है.’ आइंस्टीन ने उनसे पूछा कि लोग मुझ पर इतना ज्‍यादा ध्‍यान दे रहे हैं, इसका क्या मतलब है? चैपलिन ने उत्तर दिया, कुछ नहीं.’

आइंस्‍टीन को क्‍यों छोड़ना पड़ा था जर्मनी
प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो आइंस्टीन ने जर्मनी के राष्‍ट्रवाद का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया. जैसे ही दूसरा विश्‍व युद्ध शुरू हुआ तो आइंस्टीन नाजियों के उत्पीड़न से बचने के लिए अपनी दूसरी पत्‍नी एल्सा आइंस्टीन के साथ अमेरिका चले गए. साल 1932 तक मजबूत होते नाजी आंदोलन ने आइंस्टीन के सिद्धांतों को ‘यहूदी भौतिकी’ के तौर पर ब्रांडेड कर दिया था. वहीं, जर्मनी ने उनके काम की निंदा करनी शुरू कर दी थी. हालांकि, न्यू जर्सी में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में इंस्‍टीट्यूट फॉर एडवांस स्‍टटडी ने आइंस्टीन का स्वागत किया. यहां उन्होंने काम किया और दो दशक बाद अपनी मृत्यु तक दुनिया के रहस्यों पर चिंतन किया.

अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन का निधन कैसे हुआ?
अपने अंतिम दिन आइंस्टीन इजरायल की सातवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक टेलीविजन कार्यक्रम के लिए भाषण लिखने में व्यस्त थे. इसी दौरान उन्‍हें पेट में किसी गंभीर समस्‍या का अनुभव हुआ. उन्‍हें एएए नाम की पेट की गंभीर समस्‍या हुई थी. इसमें शरीर की मुख्य रक्त वाहिका भी फूलकर फट जाती हैं. आइंस्टीन ने पहले भी इस तरह की स्थिति का अनुभव किया था और 1948 में इसे ऑपरेशन कराकर ठीक करा लिया था. इस बार उन्होंने ऑपरेशन कराने से इनकार कर दिया.

विवादों में क्‍यों रही आइंस्‍टीन की मौत?
जब अल्बर्ट आइंस्टीन की मृत्यु हुई तो कुछ लोगों ने अनुमान लगाया कि उनके निधन का कारण सिफलिस से जुड़ा हो सकता है. आइंस्‍टीन के मित्र रहे एक डॉक्टर के अनुसार, एएए सिफलिस के कारण ही बढ़ी थी. हालांकि, आइंस्टीन के शरीर या मस्तिष्क में उनकी मृत्यु के बाद की गई अटॉप्‍सी में सिफलिस का कोई सबूत नहीं मिला था. कुछ लोगों का मानना था कि उनकी बहुत ज्‍यादा धूमपान करने की आदत के कारण उनकी मृत्‍यु हुई. एक अध्‍ययन के मुताबिक, धूमपान करने वाले पुरुषों में एएए की आशंका साढ़ सात गुना ज्‍यादा हो जाती है.

लाइफ पत्रिका ने क्‍यों नहीं छापीं तस्‍वीरें
लाइफ पत्रिका के पत्रकार राल्‍फ मॉर्स याद करते हैं कि उनकी मृत्‍यु के बाद उनके घर के बाहर आम लोगों और मीडिया की भीड़ लग गई थी. फिर भी वह उनके घर के अंदर कुछ खास तस्‍वीरें लेने में कामयाब हो गए थे. उन्‍होंने किताबों से भरी उनकी अलमारियों की तस्‍वीरें लीं. फिर एक बोर्ड पर लिखे समीकरणों और मेज पर बिखरे नोट्स की तस्‍वीरें भी खींचीं. हालांकि, लाइफ पत्रिका को मॉर्स की ली गई तस्वीरों को रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा. दरअसल, अल्‍बर्ट के बेटे हांस अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने परिवार की गोपनीयता का सम्मान बनाए रखने के लिए पत्रिका से अनुरोध किया था. लाइफ पत्रिका ने आइंस्‍टीन के परिवार की इच्छाओं का सम्मान किया और तस्‍वीरों को प्रकाशित नहीं किया.

निधन के बाद चुराया गया उनका दिमाग
आइंस्‍टीन के निधन के कुछ घंटों बाद पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर डॉ. थॉमस हार्वे ने परिवार की मंजूरी के बिना उनका दिमाग निकाल लिया और अपने घर ले गए. डॉ. हार्वे का कहना था कि दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली व्‍यक्ति के मस्तिष्क का अध्ययन करना जरूरी है. आइंस्‍टीन की अपने शरीर के किसी भी परीक्षण की मनाही के बाद भी उनके बेटे हांस ने डॉ. हार्वे को उनका काम करने दिया. दरअसल, हांस का मानना था कि डॉ. हार्वे जो करना चाहते हैं, वो दुनिया की भलाई के लिए जरूरी है. हार्वे ने आइंस्‍टीन के दिमाग की दर्जनों तस्वीर खींची.

दिमाग के क्‍यों किए गए थे 240 टुकड़े?
डॉ. हार्वे ने तस्‍वीरें लेने के बाद आइंस्‍टीन के दिमाग को 240 टुकड़ों में काट दिया. इनमें से कुछ को उन्‍होंने अन्य शोधकर्ताओं को भेजा. डॉ. हार्वे ने 90 के दशक में आइंस्टीन की पोती को आइंस्‍टीन के दिमाग का एक हिस्‍सा उपहार में देने की कोशिश की. हालांकि, उनकी पोती ने ये तोहफा लेने से इनकार कर दिया. कहा जाता है कि डॉ. हार्वे ने उनके मस्तिष्क के कुछ हिस्सों को एक साइडर बॉक्स में दूसरे शोधकर्ताओं तक पहुंचाया था, जिसे उन्होंने बीयर कूलर के नीचे रखा था. डॉ. हार्वे ने 1985 में आइंस्‍टीन के दिमाग पर एक पेपर प्रकाशित किया. इसमें उन्‍होंने लिखा कि ये दिमाग औसत मस्तिष्‍क से अलग दिखता है. इसीलिए अलग से तरह से काम भी करता है.

डॉ. हार्वे के काम पर उठते रहे सवाल
आइंस्‍टीन के दिमाग पर बाद के अध्ययनों ने इन सिद्धांतों का खंडन किया. वहीं, कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि डॉ. हार्वे का काम सही था. इस बीच, हार्वे ने 1988 में अक्षमता के लिए अपना मेडिकल लाइसेंस खो दिया. आइंस्टीन के मस्तिष्क को इस उदाहरण से समझने की कोशिश की जा सकती है कि उन्होंने एक बार प्रिंसटन विश्‍वविद्यालय के कार्यालय के ब्लैकबोर्ड पर लिखा था, ‘नॉट एवरीथिंग दैट काउंट्स कैन बी काउंटेड एंड नॉट एवरीथिंग दैट कैन बी काउंटेड काउंट्स.’ आइंस्टीन के दिमाग को फिलाडेल्फिया के म्यूटर म्यूजियम में देखा जा सकता है.

सोर्स :-“न्यूज़ 18 हिंदी|”   


Share More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *