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हर देश को अपनी राष्ट्रीयता का अधिकार के लिए लड़ने को तैयार, उन्हें विनम्र बनने के उपदेश देना गलत

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31 मई 2022 | यूक्रेन पर रूस का हमला अब चौथे महीने में पहुंच चुका है। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि युद्ध इतने दिन जारी रहेगा। उलझन अभी भी बनी हुई है। लेकिन देखें कि दुनियाभर के बुद्धिमान लोग आज यूक्रेन को क्या सलाह दे रहे हैं। 99 साल के हो चुके अनुभवी और ज्ञानी हेनरी किसिंजर का कहना है कि यूक्रेन कड़वाहट पीकर समझौता कर ले, शक्तिशाली रूस को अपनी जमीन और संप्रभुता सौंप दे।

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ का सम्मानित संपादक मंडल कह रहा है कि रूस को हराना मुश्किल है, अमेरिका पुतिन पर कटाक्ष बंद करे और यूक्रेन जितनी रियायतें ले सकता है उतनी लेकर एक बुरा सौदा कर ले। शिकागो यूनिवर्सिटी के जॉन मीरशेमर से लेकर नोम चोम्स्की और सिंगापुर के किशोर महबूबानी तक तमाम दूसरे विद्वान अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। ये सब वैश्विक विमर्श जगत के भारी-भरकम बुद्धिजीवी हैं।

अगर हम भारत में व्यापक जनमत का जायजा लें, तो पता चलेगा कि उसमें भी खास अंतर नहीं है। यहां भी यही विचार सुनने को मिलेंगे कि पश्चिमी देशों ने बेचारे पुतिन पर कटाक्ष कर-करके उन्हें यूक्रेन पर हमला करने पर मजबूर कर दिया। यह भी सुनने को मिलेगा कि अब भी जेलेंस्की को अक्ल आ जाए तो रूस की शर्तों पर समझौता कर लें वरना देश को तबाह होता देखते रहें।

वैसे भी, दोनबास के कई लोग खुद को रूसी मानते हैं। अब हम अपने अंदर झांककर देखें और युद्ध का एक खेल खेलें। पूरी सावधानी बरतते हुए मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि यह खेल पूरी तरह काल्पनिक है। सो, आप मुझसे नाराज भी हों तो कृपया ज्यादा नाराज मत होइएगा। कल्पना कीजिए कि चीन लदाख और अरुणाचल प्रदेश पर हमला कर देता है।

हमला दो सप्ताह तक जारी रहता है और हमारी सेना पूरी बहादुरी से लड़ती है और तभी पाकिस्तान भी चीन के साथ मिलीभगत से कश्मीर में हमला कर देता है। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के मुकाबले छह गुनी बड़ी अर्थव्यवस्था और अपने रक्षा बजट से सात गुना बड़े बजट वाली ताकत से सामना करना पड़ता है। हम कुछ जमीन गंवा देते हैं।

हमारे क्वाड वाले मित्र-देश और फ्रांस, इजरायल आदि हमारी मदद करते हैं लेकिन हमें अपनी लड़ाई तो खुद ही लड़नी पड़ती है। इस मुकाम पर शी जिनपिंग भारत और उसके मित्र-देशों खासकर अमेरिका को युद्ध बंद करने की अपनी शर्तों का एक नोट भेजते हैं। वे कहते हैं कि वे पाकिस्तान की ओर से भी शर्तें रख रहे हैं।

शर्तें ये हैं- भारत अक्साई चीन को उसे सौंप दे, लदाख में चीन की 1959 वाली दावा-रेखा को मंजूर करे, अरुणाचल प्रदेश से हाथ धो ले। साथ ही यह भी शर्त रखे कि भारत कश्मीर घाटी पाकिस्तान को सौंप दे। भारत कह सकता है, जहन्नुम में जाओ! तब परमाणु शक्ति से लैस तीन पड़ोसी देशों के बीच युद्ध पूरी दुनिया को चिंता में डाल देता है।

शहरों पर बरसती मिसाइलों और हजारों लोगों की मौत के बीच तेज-तर्रार लोग भारत को सलाह देने लगते हैं- अपार चुनौतियों से लड़ने का कोई मतलब नहीं है! हिमालय के बंजर इलाकों के लिए अपना वजूद दांव पर लगाने का क्या फायदा? चीन तो वही मांग रहा है जिसे वह ऐतिहासिक दृष्टि से अपना मानता रहा है। वह इतना ताकतवर है कि उसे हराना नामुमकिन है। और पाकिस्तान तो कश्मीर पर हमेशा से दावा करता रहा है।

वैसे भी, घाटी के कई कश्मीरी भारत के साथ रहकर खुश नहीं हैं। तो जाने दीजिए उन्हें। ऐसा करके आप अपने देश को बर्बादी से बचा सकते हैं, दुनिया को महायुद्ध से बचा सकते हैं, स्थायी शांति कायम कर सकते हैं। यह सब कहके मैंने आपको बहुत उत्तेजित तो नहीं कर दिया? आप कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी।

याद कीजिए कि 24 फरवरी की सुबह तक हम रूस और यूक्रेन के बारे में भी यही सोचते थे। आप कहेंगे, लेकिन हमारे साथ तो क्वाड के मित्र देश हैं और परमाणु हथियार भी हैं। तो आपको बता दें कि हमारे पश्चिमी मित्रों में यूक्रेन के जो मित्र-देश हैं वे कहीं ज्यादा ताकतवर हैं। वहीं परमाणु हथियारों के साथ दिक्कत यह है कि कोई इनका इस्तेमाल करने की पहल नहीं कर सकता।

अगर भारत ने पाकिस्तान की परमाणु धौंस को बालाकोट में नाकाम कर दिया, तो पुतिन की इस धौंस को दुनिया कई बार नाकाम कर चुकी है। युद्ध में जब तक कोई देश परमाणु हथियार इस्तेमाल करने के कगार पर पहुंचता है तब तक काफी कुछ गंवा चुका होता है। आप कभी नहीं चाहेंगे कि आपका देश उस कगार तक पहुंचे। मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं यहां युद्ध के काल्पनिक खेल की बात कर रहा हूं।

लेकिन इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि जब यूक्रेन से पुतिन की मांग मानते हुए अपनी जमीन और संप्रभुता गंवाकर चैन से रहने की सलाह दी जाती है तो उसे कैसा महसूस होता होगा। रूस ने वास्तव में अपनी शर्तों की सूची भेज दी है। लेकिन हर देश के लोगों को अपनी राष्ट्रीयता का अधिकार है। और जब तक वे इसकी खातिर लड़ने को तैयार हैं, तब तक उन्हें विनम्र बनने के उपदेश देना गलत है, चाहे उनका दुश्मन कितना भी ताकतवर क्यों न हो।

हम जिस युद्ध की कल्पना कर रहे हैं वह भगवान न करे, अगर सच हो गई तब हम भारत के लोग कहां होंगे? हम अपनी संप्रभुता की खातिर एकजुट होकर लड़ेंगे, चाहे उसकी जो कीमत देनी पड़े। यूक्रेन भी यही कर रहा है। जो लोग कड़वा समझौता करने की सलाह दे रहे हैं उन्हें हम क्या कहेंगे? इन ‘शुभचिंतकों’ को शायद हम एक सुर में उसी तरह जवाब देंगे, जैसे ग्रेटा थनबर्ग ने दिया था- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?

यह भारत के लिए सबसे माकूल स्थिति
भारत के लिए खुशकिस्मती की बात यह है कि वह इस युद्ध से अलग है। हर कोई उसे खुश रखना चाह रहा है। यह संकट जब समाप्त होगा तब कई अवसरों के दरवाजे खुले होंगे। रूस कमजोर हुआ है, शी जिनपिंग अपने तीसरे कार्यकाल को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, पश्चिम एकजुट हुआ है और पाकिस्तान उथल-पुथल से ग्रस्त है। अब यह भारत पर है कि अवसर का लाभ उठाए या नहीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Source;- ‘’दैनिकभास्कर’’


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